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बैंकों की बारी

संपादकीय /  June 09, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फंसी हुई परिसंपत्तियों के निस्तारण के लिए नए मानक निर्धारित किए हैं। गत शुक्रवार को जारी किए गए इन नए मानकों के मुताबिक बैंकों को यह अधिकार है कि वे निस्तारण को अंजाम दे सकें। इसके साथ ही उन्हें इस दृष्टि से भी तैयार किया गया है कि संकटग्रस्त खातों को लगातार मदद के इरादे पर अंकुश लग सके। ऐसे कर्जदारों को कठोर कदमों का सामना करना होगा जिनमें उच्च प्रोविजनिंग और मौद्रिक जुर्माना भी शामिल हैं। आरबीआई ने अपने इस नवीनतम खाके में कहा है कि निस्तारण योजनाओं में असहमत कर्जदार के बकाये के नकदीकृत मूल्य के बराबर भुगतान की व्यवस्था होनी चाहिए।

 
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरबीआई के 12 फरवरी के परिपत्र को खारिज किए जाने के बाद आए दबावग्रस्त परिसंपत्ति निस्तारण मानकों में सबसे अहम बात यह है कि अब बैंकों को यह निर्धारित करने के लिए 30 दिन की अवधि दी जा रही है कि कोई खाता गैर निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) है या नहीं। पहले एक दिन की देरी पर डिफॉल्ट घोषित करने का कठिन और अव्यावहारिक मानक था। संशोधित परिपत्र गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, सूक्ष्म वित्त बैंकों, नाबार्ड, एक्जिम बैंक और सिडबी को निस्तारण का मंच देता है।
 
मूल विचार यह सुनिश्चित करना है कि अधिकांश मामलों को नए तय मानकों के अधीन निपटाना चाहिए और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) को अंतिम विकल्प के तौर पर अपनाया जाना चाहिए। एक ओर जहां कर्जदारों को सक्रिय रहना होगा वहीं आरबीआई बैंकों को विशिष्ट डिफॉल्टरों के मामले में ऋणशोधन प्रक्रिया शुरू करने के लिए निर्देशित करता रहेगा। कुल मिलाकर बैंकों पर दबाव बढ़ा दिया गया है। अब उन्हें अनिवार्य तौर पर इंटर क्रेडिटर एग्रीमेंट (आईसीए) पर हस्ताक्षर करने होंगे। आईसीए का कोई भी निर्णय मान्य होगा अगर वोटिंग अधिकार के मुताबिक 75 फीसदी या कुल तादाद के आधार पर 60 कर्जदार उस पर सहमत हों। बैंकों को अब अपनी आंतरिक नौकरशाही में बहुत तेजी से काम करना होगा।
 
अगर निस्तारण योजना बनाने में विफलता हाथ लगती है तो प्रोविजनिंग में 35 फीसदी का इजाफा हो जाएगा, अगर 180 दिन की तय अवधि में यह काम नहीं कर पाती तो 20 फीसदी प्रोविजनिंग और अगर एक साल के भीतर कोई निस्तारण नहीं हो पाता तो 13 फीसदी की अतिरिक्त प्रोविजनिंग की जाएगी। अतिरिक्त प्रोविजनिंग के रूप में जो कीमत चुकानी होगी वह उन सरकारी बैंकों के लिए चिंता का विषय होगी जिनमें हाल ही में पूंजी डाली गई है। यह उन बैंकों के लिए भी समस्या बनी रहेगी जो आरबीआई की त्वरित सुधार कार्रवाई योजना के अधीन हैं। परंतु इस बात की संभावना नहीं है कि अधिक विवेक से काम करने वाले बैंक इस बढ़ी हुई प्रोविजनिंग से बिना वजह परेशान होंगे क्योंकि वे तो पहले ही अपने जोखिम के लिए उचित कदम उठा चुके होंगे। एक ओर जहां केंद्रीय बैंक के मानक 2,000 करोड़ रुपये की देनदारी चूकने वालों पर तत्काल लागू होंगे वहीं 1,500 करोड़ रुपये से 2,000 करोड़ रुपये तक के लिए इसकी शुरुआत एक जनवरी 2020 से होगी। ऐसे रुख ने बैंकों के बीच कई तरह की चिंताओं को जन्म दिया है। ये बैंक 2,000 करोड़ रुपये से कम के ऋण के लिए किस तरह की पहल करेंगे इसे देखना होगा। छोटे बैंक इस पहलू को लेकर काफी चिंतित हैं। नए मानकों की सबसे बेहतर बात यह है कि वे 12 फरवरी के परिपत्र की मूल भावना को बरकरार रखते हैं और एक ऐसी व्यवस्था की पेशकश करते हैं जो निस्तारण को बहुमत का आधार देती है। अब यह दायित्व बैंकों पर है कि वे निस्तारण की प्रक्रिया को तेज करें क्योंकि पिछले परिपत्र ने 70 बड़े कर्जदारों के करीब 3.8 लाख करोड़ रुपये मूल्य के ऋण को प्रभावित किया। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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