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झुनझुनवाला और एलआईसी के निवेश को पहुंची चोट

पुनीत वाधवा /  June 09, 2019

कभी-कभी अनुभवी निवेशक बाजार की दिशा समझने के लिए अपने 'निवेश गुरु' की सलाह लेते हैं। निर्णय सही साबित होता है तो पोर्टफोलियो का मूल्यांकन खासा बढ़ जाता है, लेकिन कभी-कभी बड़े-बड़े पंडित भी हालात भांपने में असफल हो जाते हैं।  दीवान हाउसिंग फाइनैंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डीएचएफएल) में नकदी संकट ने धुरंधर निवेशक राकेश झुनझुनवाला को भी सकते में डाल दिया है। झुनझुनवाला ने मार्च 2019 तिमाही में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा दी थी। एस इक्विटी से प्राप्त शेयरधारिता प्रारूप के अनुसार राकेश झुनझुनवाला ने मार्च तिमाही के अंत में अपनी हिस्सेदारी 73 आधार अंक बढ़ाकर 3.19 प्रतिशत कर दी थी। 29 मार्च (वित्त वर्ष 2018-19 का अंतिम कारोबारी सत्र) को डीएचएफएल के शेयरों की कीमतों के अनुसार हिस्सेदारी का मूल्यांकन करीब 150.25 करोड़ रुपये था। 

 
डीएचएफएल में निवेश कर भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) को भी नुकसान उठाना पड़ा है। मार्च 2019 के अंत तक कंपनी में एलआईसी की 3.44 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, जिसका मूल्यांकन 162.2 करोड़ रुपये था। अगर यह मान लें कि झुनझुनवाला और एलआईसी दोनों की हिस्सेदारी डीएचएफएल में बरकरार है तो कंपनी में उनकी हिस्सेदारी मार्च 2019 के आखिरी कारोबारी दिवस से 38 प्रतिशत तक कम हो गई है। कंपनी का शेयर 29 मार्च को 150 रुपये पर था, जो 6 जून को कम होकर 93 रुपये रह गया। गुरुवार को एनएसई पर बंद कीमतों के अनुसार डीएचएफल में झुनझुनवाला के शेयरों का मूल्य 94 रुपये और एलआईसी के शेयरों का मूल्य 101.40 रुपये था। झुनझुनवाला और एलआईसी दोनों डीएचएफएल में सबसे बड़े सार्वजनिक साझेदार हैं और मार्च 2019 तक इनकी हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से अधिक थी। इस बीच, 1,000 करोड़ रुपये ब्याज पर डीएचएफएल के डिफॉल्ट करने के बाद इसका असर वित्तीय क्षेत्र पर भी दिख सकता है। वैश्विक शोध एवं ब्रोकरेज कंपनी सीएलएसए की हालिया रिपोर्ट के अनुसार 1 लाख करोड़ रुपये के उधार पर भुगतान में चूक/नुकसान का जोमिख मंडरा रहा है। ब्रोकरेज कंपनी के अनुसार इस घटना का वित्तीय क्षेत्र पर दूरगामी असर हो सकता है, खासकर एनबीएफसी/आवास वित्त, रियल एस्टेट, आवासीय, वाहन और छोटे एवं मझोले उद्यम क्षेत्र की कंपनियां इसकी जद में आ सकती हैं। सीएलएसए के अनुमानों के  दीवान हाउसिंग फाइनैंस कंपनी (एचएससी) ने करीब 1 लाख करोड़ रुपये की उधारी दे रखी है, जिनमें आधी रकम बैंकों से शेष बीमा कंपनियां, म्युचुअल फंड से आई है। इनमें करीब 10 प्रतिशत उधारी (10,000 करोड़ रुपये) जमा के माध्यम से ली गई है। 
 
हालांकि कुछ विश्लेषक इन सबों के बीच कुछ खास भी देख रहे हैं। इक्विनॉमिक्स रिसर्च के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक जी चोकालिंगम का मानना है कि अगर कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ तो एनबीएफसी और आवास वित्त कंपनियों की समस्याएं अगली कुछ तिमाहियों में दूर हो सकती हैं। उन्होंने कहा, 'यह संकट नकदी से जुड़ा है न कि परिसंपत्ति से संबंधित है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पेश आने वाली दिक्कतों (एनपीए से जुड़ी मुश्किलें) और नकदी संकट (एचएफसी के सामने) में विभेद को अवश्य समझा जाना चाहिए।' एचएफसी के मामले में परिसंपत्तियों की बिक्री से मुश्किलों से निकला जा सकता है। सीएलएसए के विश्लेषक भी डीएचएफएल के बारे में यही विचार व्यक्त कर रहे हैं। इसके विश्लेषकों का मानना है कि परिसंपत्तियों की बिक्री कर डीएचएफएल डिफॉल्ट से बच सकती है। इसकी वजह यह है कि अगले दो महीनों में 6,000 करोड़ रुपये चुकाने हैं जबकि संग्रह 4,000 करोड़ रुपये ही रहने की उम्मीद है। 
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