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कागजी काम से आजादी दिलाती नोपेपरवक्र्स

शमीन अलाउद्दीन /  June 09, 2019

डिजिटल क्रांति के इस युग में भी लाखों विद्यार्थी और बहुत से माता-पिता आवेदन पत्र जमा करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों के बाहर लंबी लाइन में खड़े रहकर प्रतीक्षा करते रहते हैं। पिछले साल दसवीं की परीक्षा पास कर चुके हर्ष रूंगटा कहते हैं, 'मैंने डिजिटल मार्केटिंग कोर्स के लिए आवेदन किया है लेकिन अभी एक पीडीएफ डाउनलोड करना बाकी है।' हालांकि अब दिल्ली की स्टार्टअप नोपेपरवक्र्स सैस आधारित तकनीक लेकर आ रही है जो संस्थानों के लिए प्रवेश प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल तथा कागज रहित बनाएगी। इसके जरिये फॉर्म भरने से लेकर कागजात अपलोड करने, प्रवेश पत्र डाउनलोड करने और अंत में स्वीकृति पत्र प्राप्त करने तक की सारी प्रक्रिया डिजिटल हो जाएगी। 

 
नोपेपरवक्र्स के संस्थापक नवीन जिंदल ने कहा, 'कक्षा 12 और स्नातक के विद्यार्थियों द्वारा हर साल करीब 50 करोड़ आवेदन फॉर्म भरे जाते हैं जिसमें से 80 प्रतिशत अभी भी पूरी तरह से ऑफलाइन हैं।' वर्ष 2017 में स्थापित स्टार्टअप ने कुछ समय पहले सीरीज-बी की फंडिंग में इन्फोएज से 28 करोड़ रुपये जुटाए हैं। इससे कंपनी का मूल्यांकन 100 करोड़ रुपये हो गया है। इससे पहले स्टार्टअप ने सीरीज-ए के दौर में 5.66 करोड़ रुपये जुटाए थे। आवेदन प्रक्रिया को ऑनलाइन करने के साथ ही स्टार्टअप इधर-उधर बिखरे डेटा को एक साथ लाकर रियल टाइम में विभिन्न उपाय उपलब्ध करा रही है जिससे विभिन्न विभागों के बीच पारदर्शिता को बढ़ावा मिले। जिंदल कहते हैं, 'अधिकांश संस्थान इस बात से अनभिज्ञ होते हैं कि उन्हें सर्वाधिक लाभ कहां से होगा और इसलिए मांग पूरी नहीं कर पाते।'
 
स्टार्टअप का मॉडल कुछ इसी तरह है जैसे आप पॉलिसीबाजार पर बीमा संबंधित फॉर्म भर रहे हों, जोमेटो पर खाना ऑर्डर कर रहे हों या ओला पर कैब बुक कर रहे हों। कंपनी ने अमृता यूनिवर्सिटी, एफएमएस, आईएमआई और डीपीएस स्कूल जैसे कुल 192 संस्थानों से साझेदारी की है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार सुलभ स्मार्टफोन और सस्ते डेटा पैक के चलते भारत की 81.23 प्रतिशत शहरी जनसंख्या (36.5 करोड़) और 21.4 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या (19.4 करोड़) तक इंटरनेट पहुंच चुका है। इस क्षेत्र में कम प्रतिस्पर्धा के चलते स्टार्टअप डिजिटल तेजी के पथ पर काफी आगे जा सकता है। 
 
नोपेपरवक्र्स शैक्षणिक संस्थानों से प्रत्येक आवेदन पत्र के लिए 80-90 रुपये शुल्क लेती है। जिंदल कहते हैं, 'इस राशि का 60 प्रतिशत भुगतान संस्थान अपनी जेब से करते हैं और शेष 40 प्रतिशत आगे पास कर देते हैं।' पूरी प्रवेश प्रक्रिया का डिजिटलीकरण करने की शुरुआती लागत 10-12 लाख रुपये सालाना है। फरवरी 2017 में शुरू होने से मार्च 2018 तक कंपनी ने 10 लाख आवेदन पत्रों को डिजिटल बनाया है और इस साल इसे बढ़ाकर 30 लाख करने का लक्ष्य है। हालांकि कंपनी ने अभी तक ब्रेक-ईवन को हासिल नहीं किया है लेकिन कंपनी का अनुमान है कि अगले दो साल में वह 2 करोड़ आवेदन पत्रों को डिजिटल बनाएगी तथा इससे 150-200 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाएगी। दिल्ली, चेन्नई, बेंगलूरु और जयपुर में कंपनी की टीम में 90 सदस्य हैं और स्टार्टअप अपनी पहुंच बढ़ाने पर काम कर रही है। 
Keyword: no paper works, digital, startup,,
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