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संगीत में लाइसेंस की जंग से प्रकाशन, वीडियो उद्योग को लाभ

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  June 07, 2019

क्या कंटेंट के लिए लाइसेंस लेना वैधानिक या स्वैच्छिक होना चाहिए? यह सवाल इस साल मई में बंबई उच्च न्यायालय के फैसले से पैदा हुआ है। रमेश तौरानी की टिप्स इंडस्ट्रीज द्वारा एयरटेल के म्यूजिक ऐप विंक के खिलाफ दायर किए गए मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि विंक टिप्स की सहमति के बिना उसके संगीत को स्टोर या उसका उपयोग नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति एस जे कथावाला ने कहा कि कॉपीराइट अधिनियम की धारा 31डी इंटरनेट प्रसारण पर लागू नहीं होती है। इस धारा के दायरे में केवल रेडियो या टेलीविजन प्रसारण आता है। इसका मतलब है कि अगर कोई ओवर-दी-टॉप (ओटीटी) स्ट्रीमिंग सेवा प्रदाता या म्यूजिक ऐप सारेगामा के संगीत का इस्तेमाल करना चाहता है तो उसे उससे (सारेगामा से) मंजूरी या लाइसेंस लेना होगा। 

 
यह सामान्य फैसला होना चाहिए था। लेकिन इस सामान्य नियम के अपवाद के रूप में वर्ष 2012 में धारा 31डी बनाई गई ताकि म्यूजिक कंपनियों और संगीत के रेडियो/टीवी प्रसारकों के बीच वैधानिक लाइसेंस की व्यवस्था स्थापित की जा सके। इसका मकसद उन कलाकारों का संरक्षण था, जो संदिग्ध समझौतों पर हस्ताक्षर कर अपने अधिकार बेच दे रहे थे। इसलिए वर्तमान नियमों के तहत एक रेडियो स्टेशन अपने विज्ञापन राजस्व का दो फीसदी हिस्सा रॉयल्टी के रूप में चुकाकर टिप्स या टी-सीरीज या अन्य म्यूजिक कंपनी के संगीत का इस्तेमाल कर सकता है। 
 
इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री के अध्यक्ष एवं सीईओ ब्लाइज फर्नांडिस ने कहा, 'धारा 31डी उस समय लाई गई, जब प्रसारण रेडियो बुनियादी ढांचे की लागत और लाइसेंस फीस के बोझ तले दबा हुआ था। आज यह 3,000 करोड़ रुपये का उद्योग है, लेकिन रॉयल्टी के रूप में केवल 60 करोड़ रुपये का भुगतान करता है। यह रॉयल्टी म्यूजिक कंपनी, लेखकों, कंपोजरों और प्रकाशकों के बीच वितरित होती है। यह अप्रचलित और अप्रासंगिक है।' उन्होंने कहा कि संगीत के लगभग हर बड़े बाजार- अमेरिका, पश्चिमी यूरोप के ज्यादातर हिस्से, दक्षिण कोरिया आदि में इंटरेक्टिव सेवाओं के लिए संगीत का लाइसेंस स्वैच्छिक है। इनमें से बहुत से देशों में वैधानिक लाइसेंस की भी व्यवस्था है, लेकिन यह रेडियो जैसी लिनियर प्रसारण सेवाओं के लिए है। स्वैच्छिक लाइसेंसिंग का मतलब है कि खरीदार और विक्रेता बातचीत करते हैं और एक कीमत पर सहमति जताते हैं। यह एक प्रतिस्पर्धी बाजार है। भारत का 1,400 करोड़ रुपये का संगीत उद्योग अत्यधिक बिखरा और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। दूसरी ओर यहां ऐसी कुछेक दूरसंचार कंपनियां हैं, जिनके पास खुद के संगीत ऐप हैं। भारती एयरटेल के पास विंक और जियो के पास सावन है। गाना भारत के सबसे बड़े मीडिया समूहों में से एक टाइम्स समूह का हिस्सा है। इनके अलावा ऐपल का आईट्यून्स और स्पॉटीफाई है। भारत की सबसे बड़ी म्यूजिक कंपनियां भी इन अरबों डॉलर की तकनीक, दूरसंचार या मीडिया कंपनियों के एक छोटे से हिस्से के बराबर हैं। यह खरीदारों का बाजार है। यह इस बात का सबूत है कि क्यों टिप्स और विंक के बीच एक नियमित सौदेबाजी अदालत तक पहुंच गई। इसमें असमानता एक और कारक जोड़ देती है। 
 
औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग ने सितंबर, 2016 में कॉरीराइट पंजीयक को एक मेमो भेजा था। इसमें कहा गया था कि धारा 31डी के प्रावधान इंटरनेट प्रसारण पर भी लागू होते हैं। यह महज एक मेमो है, लेकिन इसने बहुत सी समस्याओं का पिटारा खोल दिया। ऐसा लग रहा था कि कोई भी ऐप रेडियो प्रसारकों की तरह कोई भी संगीत इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे में अदालत यह कहने को आगे आई कि वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। भारतीय संगीत उद्योग को करीब 70 फीसदी राजस्व डिजिटल या स्ट्रीमिंग/ डाउनलोडेड म्यूजिक  से प्राप्त होता है। डिजिटल विज्ञापन लगातार 28 फीसदी की ऊंची दर से बढ़ रहा है। हालांकि सबस्क्रिप्शन राजस्व भी इजाफा हो रहा है। खरीदार के बाजार में अगर इंटरेक्टिव सेवाओं को 2 फीसदी की वैधानिक लाइसेंस फीस पर मंजूरी दी जाती है तो संगीत के लिए डिजिटिल वृद्धि का पूरा फायदा चला जाता है। पारदर्शिता के लिए या तो लाइसेंस स्वैच्छिक होना चाहिए या वैधानिक लाइसेंसिंग के तहत रॉयल्टी की दरें 2 फीसदी से बढ़ाकर 10 से 15 फीसदी की जाएं। वैधानिक बनाम स्वैच्छिक लाइसेंसिंग से संबंधित तर्क-वितर्कों के अलावा इसमें एक बड़ा बिंदु है। इंटरनेट से मीडिया में जो बदलाव आ रहे हैं, उनका सबसे पहले असर संगीत पर दिख रहा है। यह सबसे नाजुक मनोरंजन उत्पाद है, जो किसी भी बदलाव से सबसे पहले प्रभावित होता है। सबसे बड़ा बदलाव 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में कंप्रेशन तकनीक थी। उपभोक्ताओं को अपराधी करार देने से लेकर नैपस्टर जैसी फाइल साझा करने वाली कंपनियों पर मुकदमेबाजी तक के संगीत कारोबार के प्रत्येक प्रयोग से शेष मनोरंजन उद्योग ने अहम सबक सीखे हैं। वैश्विक संगीत उद्योग का राजस्व 1999 में 225 अरब डॉलर था। यह 2014 में घटकर 14.1 अरब डॉलर पर आ गया। हालांकि उसके बाद इसमें सुधार आया है। तब से यह उद्योग वृद्धि की राह पर अग्रसर और उसे अपने राजस्व का आधे से अधिक हिस्सा डिजिटल से प्राप्त हो रहा है। भारत में ओटीटी सेवाओं से फिल्म एवं टेलीविजन उसी तरह के बदलाव के चरण में प्रवेश कर गए हैं, इसलिए संगीत क्षेत्र के घटनाक्रम को देखने से इसे समझने में मदद मिलेगी। 
Keyword: media,, video, music, OTT,,
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