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आर्थिक नीति को चाहिए अवधारणात्मक ढांचा

अजय शाह /  June 07, 2019

शासकीय संस्थान निर्माण की व्यावहारिक समस्याओं के अलावा हमें आर्थिक नीति को लेकर एक अवधारणात्मक ढांचे की भी आवश्यकता है। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजय शाह

 
देश में आर्थिक नीति के अगले पांच वर्ष शुरू हो चुके हैं। ऐसे में शासकीय क्षमता का निर्माण करना आवश्यक है जहां विभिन्न संस्थान समस्याओं का पता लगाएं और जरूरी प्रतिक्रिया दें। इसके अलावा आर्थिक नीति का एक बौद्घिक ढांचा भी आवश्यक है। यह लंबी अवधि की योजना बनाने में सहायक सिद्घ होता है। राज्य का प्रभाव नियमों से बढ़ता है, न कि विशेषाधिकारों से। मौद्रिक नीति के क्षेत्र में हम ऐसा देख भी चुके हैं। ढांचे की मौजूदगी सरकार के विभिन्न असंबद्घ अंगों द्वारा उठाए जाने वाले व्यावहारिक कदमों में सामंजस्य कायम करने में सहायता करता है। 
 
अब आर्थिक नीति का परिदृश्य पांच वर्ष का है। 2014 और 2015 की तरह यह लंबी अवधि की परियोजनाओं को प्रोत्साहन देगा। पिछली अवधि की तीन सबसे बड़ी उपलब्धियां थीं वस्तु एवं सेवा कर, मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाना और दिवालिया संहिता। इन तीनों की शुरुआत एकदम आरंभिक दौर में हो गई थी। उसी तर्ज पर कुछ अन्य बड़ी बदलावकारी परियोजनाओं की शुरुआत 2019-20 में होनी चाहिए।  देश में जो सबसे बड़े अवरोध हैं उनमें राज्य क्षमता सबसे बड़ा अवरोध है। एक आदर्श सरकारी ढांचा वह है जो रोज बदलती दुनिया की समझ रखता हो, उन समस्याओं के बारे में समझ रखता हो जो सामने आती हैं, मूलभूत हल को पहचान सकता हो, वैकल्पिक उपायों पर बहस-मुबाहिसा कर सर्वाधिक कम दबाव वाले विकल्प की तलाश कर सके और चुने गए उपाय का प्रभावी क्रियान्वयन कर सके। बात चाहे कर नीति की हो, कर प्रशासन की, खाद्य सुरक्षा की, वायु गुणवत्ता की या दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर की, बुनियादी चुनौती है ऐसी सांस्थानिक क्षमता की स्थापना करना।
 
वक्त का तकाजा है कि ऐसे तार्किक उपायों पर काम करने और समस्या निवारण करने में सक्षम संस्थान बनाने पर जोर दिया जाए। इसके अलावा एक और काम करने की आवश्यकता है: आर्थिक नीति को लेकर एक अवधारणात्मक ढांचा तैयार करना होगा। बाजार अर्थव्यवस्था में भारत सरकार की क्या भूमिका है? किस प्रकार की संस्थागत मशीनरी निर्मित करने की आवश्यकता है? समय के साथ इन संस्थानों और राज्य का जो हस्तक्षेप हुआ उनका लक्ष्य क्या होगा? सन 1990 के दशक में जो कुछ किया जा रहा था, उसे लेकर स्पष्टïता थी। तब से अब तक हालात बहुत बदल चुके हैं। ऐसे में नए ढांचे की आवश्यकता है।
 
यह कई स्तरों पर काम करता है। सबसे सहज तरीके से देखें तो यह आर्थिक नीति को लेकर दीर्घ लक्ष्य तय करता है। आंकड़े कमजोर होने पर नीति नियोजन को दिशा देता है। कई कदमों के राजनीतिक निहितार्थ से संचालित होने का जोखिम भी हमेशा रहता है। विशेषाधिकार के स्थान पर नियमों को तरजीह मिलनी चाहिए। सारे फैसले सरकार द्वारा लेने से उसका प्रभाव बढ़ता है, ऐसा विचार सही नहीं है। बानगी के तौर पर पुराने जमाने में मौद्रिक नीति विशेषाधिकार थी।  केंद्रीय बैंक को जो ठीक लगता वह करता। परंतु अब वह अधिक प्रभावी हो गई है क्योंकि केंद्रीय बैंक के हाथ मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाने से बंधे हैं। अब आरबीआई खुदरा महंगाई को चार फीसदी रखने संबंधी कदम उठाता है। निजी तौर पर लोगों को पता है कि भविष्य में कुछ खास परिदृश्य में आरबीआई किस प्रकार काम करेगा। विशेषाधिकार समाप्त करने से मौद्रिक नीति की क्षमता में इजाफा हुआ है।
 
वृहद आर्थिक और वित्त क्षेत्र में मौद्रिक नीति ढांचा अच्छी स्थिति में है। अब आगे चुनौती मुद्रास्फीति के लक्ष्य पर मजबूती से टिके रहने की है। सन 1992-2011 में वित्तीय बाजारों और अंतरराष्ट्रीयकरण के बीच एक अवधारणात्मक खाका था। अब राजकोषीय और वित्तीय नीति के लिए तुलनात्मक नीतिगत ढांचे आवश्यक हैं। दूसरा बड़ा विचार है विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल। यह तालमेल तब बेहतर होगा जब एक साझा अवधारणात्मक ढांचा हो। उदाहरण के लिए सन 1990 के दशक में सरकार की सभी शाखाओं को पता था कि हमारा देश वैश्विक संबद्धता से घबराता है। यह देश की औपनिवेशिक असुरक्षा की बदौलत था। तमाम नीतिगत निर्णय, सीमा शुल्क में कटौती से लेकर नाभिकीय समझौते तक सारे कदम इस तरह उठाए गए जिससे देश का वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण हो सके। सरकार के कई तत्त्वों के कदम एक ही अवधारणात्मक खाके से उपजे थे। अगर सरकार के सभी अंग अलग-अलग निर्णय लेते तो हालात कहीं अधिक जटिल हो सकते थे।
 
एक निरंतरता भरे अवधारणात्मक ढांचे का तीसरा और सबसे अहम पहलू यह है कि वह निजी क्षेत्र की अपेक्षाओं को किस प्रकार आकार देता है। जब निजी कंपनियां निजी निवेश की लंबी अवधि की प्रतिबद्धता का आकलन करती हैं तो नीतिगत जोखिम प्रमुख चिंता का विषय होता है। अगर सरकारी संस्थानों को नीतिगत निर्णय लेने का विशेषाधिकार हो तो अनिश्चितता की आशंका अधिक रहती है। एक निरंतरता भरा अवधारणात्मक खाका अपने साथ सुसंगतता लाता है। उदाहरण के लिए सन 1991 के बाद से निजी क्षेत्र को पता था कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और आयात के अवरोध कमजोर पड़ेंगे। कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ लेकिन साल दर साल ये अवरोध कम होते गए। इस अवधि में कोई नया अवरोध नहीं सामने आया। इस अवधारणा ने उन निजी कंपनियों को व्यापक तौर पर प्रभावित किया जिन्होंने 10 वर्ष की योजना बनाई थी। सन 1997 से 2004 के बीच कंपनियों को जो भारी उत्पादकता लाभ हुआ, उसका एक बड़ा कारण यह भी था।
 
इसी प्रकार कर नीति में लंबी अवधि की सोच आवश्यक है ताकि दीर्घावधि की निवेश योजनाएं आकार ले सकें। अगर कर नीति में हर वर्ष उतार चढ़ाव आएगा तो अनिश्चितता उत्पन्न होगी और निजी निवेश मुश्किल होगा। इस नजरिये से देखें तो सरकार के लिए 2019 में बेहतर होगा कि वह आने वाले पांच बजटों की रूपरेखा तैयार कर ले। भविष्य में कर नीति में बदलाव की ये प्रतिबद्धताएं निजी कंपनियों के लिए निश्चितता बढ़ाएंगी, जिसका सकारात्मक असर निवेश पर देखने को मिलेगा। अंतिम तौर पर बात करें तो नीति निर्माताओं को समझदारी का परिचय देना होगा और रोजमर्रा की दिक्कतों को हल करने का प्रयास करना होगा। लेकिन इसके साथ-साथ आर्थिक नीति के मोर्चे पर समन्वय भी आवश्यक है। इसके लिए चुनिंदा बड़े विचारों पर काम करना होगा। इससे नीतिगत जोखिम कम होगा और तयशुदा लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में सहायता मिलेगी।
 
(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं।)
Keyword: india, economy, GDP,,
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