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बदलाव या यथास्थिति?

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  June 07, 2019

चुनाव समाप्त हो गए हैं और अब वक्त है नतीजों का विश्लेषण करने का। कहा जा रहा है कि लोगों ने बुर्जुआवाद के खिलाफ मतदान किया है और मोदी सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों ने अपना समर्थन जताते हुए अपनी आकांक्षाओं को वोट के रूप में प्रकट किया है। यह भी कहा गया कि यह उन लोगों की जीत है जिनकी सांस्कृतिक जड़ें गहरी हैं जबकि उथले लोगों की हार हुई है। हो सकता है ये सब सच हों लेकिन बुनियादी बदलाव की इस कथा में यह देखना जानकारीपरक होगा कि विजेता किसे निशाना बनाते हैं और किसे नहीं?

 
हम वाम बनाम दक्षिण की बहस को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं। वाम जड़ से उखड़ चुका है और इसकी जगह लेने का कोई गंभीर बाजारोन्मुखी प्रयास भी नहीं हो रहा। बल्कि कमजोर प्रदर्शन वाले, असमान तंत्र पर काबिज लोग पराजितों को और अधिक कल्याण योजनाओं की मदद से मनाना चाहते हैं। नवनिर्वाचित लोकसभा के सदस्यों की संपत्ति का माध्य 5 करोड़ रुपये है। उनकी औसत संपत्ति 20.9 करोड़ रुपये है। चुने गए नेताओं में से अधिकांश सबसे अमीर 0.1 फीसदी तबके से ताल्लुक रखते हैं। इन संपन्न लोगों की दृष्टि से देखें तो धर्म के आधार पर लोगों की लामबंदी के साथ लोक कल्याण का मिश्रण तात्कालिक बदलाव को अंजाम देता है, न कि ढांचागत। 
 
सामंतवाद और वंशवाद का क्या: नामदार बनाम कामदार? यह जुमला नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी के कारण चल निकला लेकिन वरुण गांधी भी तो हैं, हरसिमरत कौर (घोषित परिसंपत्ति: 40 करोड़ रुपये), दुष्यंत सिंह (पता: सिटी पैलेस धौलपुर), राजकुमारी दियाकुमारी (पता: सिटी पैलेस जयपुर) और तमाम अन्य लोग जो सत्ताधारी गठबंधन की ओर से जीतने में सफल रहे हैं। सकारात्मक पहलुओं की बात करें तो आकांक्षी कामदार का विचार कारोबार तक जाता है जहां हजारों स्टार्टअप का उत्सव है। नया भारत तंग श्याओ फिंग की तरह इस बात पर यकीन करता है कि अमीर होना अच्छा है। यही कारण है कि नोटबंदी के बाद भी कारोबारी, मोदी के साथ सुरक्षित महसूस करते हैं। जिन नामदारों को निशाना बनाया जाना है वे केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। माल्या और नीरव मोदी जैसे दूर बैठे लक्ष्य भी सुरक्षित निशाना हैं।
 
इसका क्या अर्थ हुआ? दरअसल बदलाव की बातों के बीच भी हम अत्यंत रूढि़वादी अंदाज में यथास्थिति के शिकार हैं। महत्त्वपूर्ण बदलाव लुटियन की दिल्ली में रहने वालों के नए अवतार के लिए आरक्षित हैं। यह नया अवतार खान मार्केट गैंग का है। यह जुमला भी उन सांसदों के लिए था जो संसद की साधारण कैंटीन के बजाय महंगे रेस्तरां में बैठना पसंद करते हैं। परंतु नरेंद्र मोदी ने इसका इस्तेमाल उपनिवेशवाद के बाद की ऐसी पीढ़ी के लिए कर दिया जो नेहरू-गांधी के युग में फलीफूली। तब आरएसएस के एक विचारक ने कहा था कि मीडिया, संस्कृति और अकादमी से इस गैंग को खत्म किया जाएगा। 
 
खुद ब खुद खत्म हो रहा यह समूह जो लड़ाई के लिए तैयार तक नहीं है, वह इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि यह अभी भी भारत के पुराने विचार की बात करता है। यह विभिन्न  प्रकार की आस्थाओं और मान्यताओं की रक्षा करने वाली ऐसी सहिष्णु सभ्यता की बात करता है जो कमजोरों की रक्षा करना चाहती है, न कि मजबूती का जश्न मनाना। इस भावना को नष्ट किया जाना है। साथ ही अंग्रेजों के यहां पढ़े बैरिस्टरों द्वारा बनाए संविधान और उनके द्वारा थोपी औपनिवेशिक व्यवस्था को इस्लाम और उपनिवेश काल के पहले की देसी व्यवस्था से बदलना होगा। बाबर की अवैध संतानें खुद पर हुए हमले के बाद खामोश हैं। मैकाले के परपोतों में से कुछ आर्थर कसलर की किताब डार्कनेस ऐट नून के जेल में बंद चरित्र रुबाशोव की तरह हो गए हैं जो अपने विरोधी विचार को खत्म करने को तैयार था और अपनी गलतियों की सार्वजनिक आलोचना करता था। सबसे बड़ी आशंका अप्रासंगिकता की है। दिल्ली में बिना किसी मकसद के रहना दांते के नर्क के छठे चरण में रहने जैसा है जो धर्म विरोधियों के लिए आरक्षित था। अगर मोदी की अप्रत्याशित लोकप्रियता, भारत में ताकतवर और रसूखदार के शासन की बुनियाद बन रही है (सिंगापुर की तरह हम नेताओं का मजाक उड़ाने वालों को जेल में डाल ही रहे हैं), आलोचना करने वालों को गाली देने वाले ट्रोल आड़े हाथ ले रहे हैं, देसी मिथकों और वैज्ञानिक तथ्यों में घालमेल और भ्रम हो रहा है, इतिहास की किताबों में आरएसएस का नजरिया पढ़ाया जा रहा है, मजबूत संस्थान राजनीति के सामने घुटने टेक रहे हैं। इन बातों के बीच जोखिम उत्पन्न हो गया है कि कहीं हम ऐसी गलती न कर बैठें जिससे बचा जा सकता था।
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