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डिफॉल्ट पर बदले नियम से कंपनी जगत को मिली बड़ी राहत

ईशिता आयान दत्त और देव चटर्जी / कोलकाता/मुंबई June 07, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक ने एक दिन के डिफॉल्ट के नियम को दरकिनार कर दिया है और उधार लेने वाले के खाते की समीक्षा के लिए लेनदारों को 30 दिन का वक्त दे दिया है। आरबीआई की तरफ से दबाव वाली परिसंपत्तियों पर जारी संशोधित नियमों के मुताबिक, लेनदार अब उधार लेने वालों के खाते की समीक्षा डिफॉल्ट के 30 दिन के भीतर कर सकेंगे। इससे पहले बैंकों को डिफॉल्ट के एक दिन के भीतर समाधान प्रक्रिया शुरू करनी होती थी। एक ईपीसी कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी ने कहा कि एक दिन के डिफॉल्ट का नियम कंपनियों के लिए परेशानी भरा था क्योंकि इससे रेटिंग में गिरावट का जोखिम होता था, जिसकी वजह से उधारी की लागत पर असर पड़ता और कंपनी की छवि पर भी। एक दिन से 30 दिन की अवधि काफी अहम है।

 
12 फरवरी 2018 को आरबीआई ने एक परिपत्र जारी किया था, जिसके तहत बैंकों को 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा वाले कर्ज के समाधान या पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू करनी होती थी अगर कंपनी की तरफ से एक दिन का डिफॉल्ट होता था। सर्वोच्च न्यायालय ने हालांकि इस परिपत्र को सही नहीं ठहराया था। परिपत्र के मुताबिक, अगर समाधान योजना 180 दिन के भीतर तैयार नहीं होती तो बैंकों को दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए कहा जाएगा। नए नियम के मुताबिक, अगर समाधान योजना 180 दिन के भीतर क्रियान्वित नहीं होती तो बैंकों को अतिरिक्त 20 फीसदी का प्रावधान करना होगा और अगर यह 365 दिन मेंं नहीं होता है तो अतिरिक्त 35 फीसदी प्रावधान करना होगा।
 
ईपीसी के एक अधिकारी ने कहा, यह मौजूदा प्रवर्तकों के लिए राहत है क्योंंकि दिवालिया संहिता की तलवार उनके सिर पर तत्काल नहीं लटकेगी। साथ ही समाधान योजना को कीमत के लिहाज से 75 फीसदी लेनदारों की मंजूरी की दरकार होगी, जबकि पहले 100 फीसदी लेनदारों की मंजूरी चाहिए होती थी। एक दूरसंचार कंपनी के मुख्य कार्याधिकारी ने कहा, जहां समाधान योजना का क्रियान्वयन होना है वहां सबी लेनदारों को समीक्षा अवधि में इंटर-क्रेडिटर एग्रीमेंट करना होगा।
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