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नई सरकार के लिए निकट भविष्य का नीतिगत एजेंडा

साजिद चिनॉय /  June 06, 2019

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की शानदार चुनावी जीत ने बाजारों में उत्साह भरा है और तेज वृद्धि के अगले चरण के लिए बड़े सुधारों (भूमि, श्रम, पूंजी) की उम्मीदें जगाई हैं। लेकिन नीति-निर्माताओं को बिना तैयारी के हड़बड़ी में कदम नहीं उठाने चाहिए। सबसे पहला काम मुश्किल दौर से गुजरती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना होना चाहिए। 

पिछली कुछ तिमाहियों में वृद्धि धीमी हुई है। कुछ दबाव अल्पावधि के हैं। उदाहरण के लिए 2018-19 के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकारी खर्च में भारी कटौती, चुनाव से संबंधित अनिश्चितता और वाहन क्षेत्र में एकबारगी कीमत बढ़ोतरी। ये दबाव आने वाले महीनों में खत्म हो जाएंगे। लेकिन वृद्धि का रुझान कमजोर हो गया है। 

भारतीय वृद्धि केवल उपभोग रूपी एक इंजन पर उड़ान भर रही है। अब यह इंजन भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगा है। ग्रामीण उपभोग इसलिए प्रभावित हो रहा है क्योंकि कृषि क्षेत्र पर असर डालने वाली वैश्विक कारोबार की स्थितियां 2018-19 में और बदतर हुई हैं। शहरी मांग में सुस्ती से एनबीएफसी, वाहन और आवास क्षेत्र में दिक्कतों का पता चलता है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आय में वृद्धि धीमी पडऩे पर उपभोग के लिए बचत का इस्तेमाल किया जा रहा है। निर्यात का परिदृश्य भी बदतर हुआ है क्योंकि वैश्विक व्यापार युद्ध और तेज हुआ है। निर्यात और उपभोग दोनों में कमजोरी से अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों पर असर पडऩे की चिंताएं पैदा हो जाती हैं। 

राजकोषीय प्रोत्साहनों की मांग गैर-जिम्मेदाराना लगती हैं। क्योंकि भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की ऋण की कुल जरूरत जीडीपी की करीब 9 फीसदी है। इसमें सभी घरेलू वित्तीय बचत खप जा रही हैं। इससे बाजार में ब्याज दरें ऊंची बनी हुई हैं और ग्राहकों तक दरों में कटौती का लाभ नहीं पहुंच रहा है। किसी तरह का प्रोत्साहन देना अनुत्पादक साबित होगा। इसे ब्याज दरें और बढ़ जाएंगी, निजी निवेश में कमी आएगी और एनबीएफसी क्षेत्र में वित्तीय संकट गहराएगा। ऐसे में नीति निर्माता मंदी को थामने के लिए क्या कर सकते हैं? हालांकि बाजार मांग पर केंद्रित हैं, लेकिन सही कदम आपूर्ति पक्ष पर ध्यान देना होगा। लघु अवधि के नीतिगत एजेंडे में तीन क्षेत्रों के अवरोधों को दूर करना शामिल होना चाहिए : 

1. एनबीएफसी : नकदी नहीं, कर्ज चुकाने की क्षमता सुधरे 

एनबीएफसी पिछले एक साल से भारी दबाव से गुजर रही हैं। इससे उनके ऋण बांटने में भारी कमी आई है, जिससे खपत में मंदी आई है। हालांकि ऐसे ऋण देने के लिए अब बैंक आए हैं, लेकिन वे एनबीएफसी की पूरी भरपाई नहीं कर सकते। इसकी वजह यह है कि एनबीएफसी के कारोबारी मॉडल बहुत अलग हैं, जो अलग-अलग ग्राहकों को लक्षित करती हैं। एनबीएफसी में मंदी से अचंभित नहीं होना चाहिए। इस क्षेत्र में वित्तीय स्थितियां बहुत विकट हो गई हैं। एनबीएफसी बॉन्डों में औसत स्प्रेड आईएलएफएस घटनाक्रम से पहले के स्तरों से काफी ऊपर पहुंच गया है। अंतरबैंक प्रणाली में नकदी की स्थिति सुधरी है, मुख्य तरलता अब अधिशेष है और बहुत सी एनबीएफसी के खातों में नकदी का स्तर काफी अधिक है। इसके बावजूद स्प्रेड में कमी नहीं आई है, इसलिए यह पहली नजर में नकदी नहीं बल्कि ऋण जोखिम का संकेत है। म्युचुअल फंडों में निवेश सूख गया है और एनबीएफसी को बैंक ऋण घट गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि बैंक भी ऋण जोखिम को लेकर सतर्क हैं। इसलिए यह नकदी की समस्या नहीं है। यह ऋण चुकाने की क्षमता की समस्या है।  

नदारद मझोली एनबीएफसी?

इसमें किसी नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। ऋणदाता जोखिम का फिर से आकलन कर रहे हैं और ज्यादा प्रीमियम वसूलना बाजार की वह व्यवस्था है, जो अपने आप काम कर रही है। किसी हस्तक्षेप से नैतिकता का जोखिम बढ़ेगा। इस बात की चिंताएं बढ़ रही हैं कि असंतुलित सूचनाएं आवंटन कुशलता को प्रभावित कर रही हैं। सबसे अच्छी एनबीएफसी आसानी से फंड जुटाने में सक्षम हैं और जिन पर जोखिम नजर आ रहा है, उन्हें पर्याप्त पैसा नहीं मिल रहा है। समस्या दोनों के बीच बड़े अंतर की नहीं है। समस्या यह है कि 'मझोली नदारद' हैं। इस बात के आसार हैं कि मझोली एनबीएफसी पूंजी जुटाने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि निवेशक उनकी संपत्ति गुणवत्ता के बारे में सुनिश्चित नहीं हैं। यह असंतुलित सूचना की समस्या का सबसे अच्छा उदाहरण है। एक व्यक्ति खराब और अच्छी एनबीएफसी में अंतर नहीं कर सकता है, इसलिए सभी को ऋण देना बंद कर सकता है। इस वजह से बहुत सी एनबीएफसी नकदी जमा करने और ऋण वितरण कम करने के लिए बाध्य हो रही हैं। वे ऐसा यह दिखाने के लिए कर रही हैं कि वे खराब कंपनियों में शामिल नहीं हैं। संपत्ति गुणवत्ता को लेकर सही जानकारी न होने के कारण आवंटन में अकुशलता आ रही है। इसका ऋण, पूंजी जुटाने, ऋण बांटने और इसलिए जीडीपी वृद्धि पर असर पड़ रहा है। 

सबसे बेहतर तरीका यह हो सकता है कि नियामक एनबीएफसी क्षेत्र की संपत्ति गुणवत्ता समीक्षा करे। ऐसा होने से 'भरोसे की कमी' दूर हो जाएगी। इससे अच्छी एनबीएफसी इक्विट और फंडिंग जुटा पाएंगी। 

2. राजकोषीय-मौद्रिक नीति की जुगलबंदी

जुलाई में विश्वसनीय बजट लाना अहम है। वर्ष 2018-19 में वास्तविक राजस्व संग्रह संशोधित अनुमानों से काफी कम रहने का अनुमान है, जिससे अगले साल अनुमानित राजस्व हासिल करना लगभग नामुमकिन होगा। इसलिए सरकार को राजकोषीय घाटे के लक्ष्य जीडीपी के 3.4 फीसदी को फिर से संशोधित करना चाहिए। लेकिन ऐसा विश्वसनीय रूप से राजस्व एवं खर्च का बजट बनाकर किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एफसीआई जैसे वैध बजट भुगतानों को बैलेंस शीट से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। 

बॉन्ड बाजारों की फिर से चिंता बढऩे के आसार हैं। बॉन्ड प्रतिफल बढ़ेगा, जिससे आगे पूंजी की लागत और बढ़ेगी। हालांकि एक भरोसेमंद बजट जीएसटी राजस्व में अहम बढ़ोतरी पर निर्भर करता है। इससे जीएसटी को और आसान बनाने और कड़ी अनुपालना व्यवस्था बनाने की जरूरत होगी। 

एक भरोसेमंद बजट मौद्रिक नीति का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाने में मदद करेगा। पहला, यह बॉन्ड प्रतिफल को कम करेगा और वित्तीय स्थितियों को आसान बनाएगा। दूसरा, अगर बॉन्ड प्रतिफल घट जाता है तो बॉन्ड प्रतिफल से जुड़ी लघु बचत दरें भी नीचे आएंगी। इससे बैंक जमाएं और आकर्षक हो जाएंगी, जमा वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा और बैंकिंग प्रणाली में मौद्रिक नीति का लाभ ग्राहकों को मिलेगा।

तीसरा, जीएसटी की गैर-अनुपालना से 2018-19 में प्रचलन में मौजूद मुद्रा (सीआईसी) में बढ़ोतरी हुई है। अगर जीएसटी की अनुपालना को सख्त बनाया जाता है तो सीआईसी की वृद्धि घटेगी, जमा वृद्धि बढ़ेगी और मौद्रिक नीति के लाभ को ग्राहकों तक पहुंचाने में सहारा मिलेगा। चौथा, वृद्धि के लिए यह बहुत मायने रखता है कि राजकोषीय घाटे को कैसे पूरा किया जाता है। सार्वजनिक निवेश घटाकर घाटे को पूरा करना बनाम अप्रत्यक्ष कर संग्रह को सख्त बनाने कावृद्धि पर महत्त्वपूर्ण असर पड़ेगा। 

इसके विपरीत अगर बाजार राजकोषीय विश्वसनीयता को लेकर चिंतित होते हैं और मौद्रिक नीति में ढील दी जाती है तो अल्पावधि और दीर्घावधि की ब्याज दरों में अंतर बढ़ेगा। इससे वित्तीय क्षेत्र को अल्पावधि के लिए ऋण लेने और लंबी अवधि के लिए ऋण देने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा, लेकिन इससे वित्तीय क्षेत्र पर खतरा बढ़ेगा। 

3. आयात-निर्यात के समीकरण पलटना 

निकट भविष्य की तीसरी प्राथमिकता कृषि संकट से निपटना होनी चाहिए। आयात-निर्यात के समीकरण को सही बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। देश में मांग के लिए बहुत कम गुंजाइश है। पीएम किसान योजना से खाद्य की मांग बढ़ेगी, लेकिन कुल खर्च जीडीपी का महज 0.4 फीसदी है और इसके अलावा राजकोषीय गुंजाइश नहीं है। इसके बजाय जवाब आपूर्ति पक्ष में छिपा है। इस बात के शुरुआती संकेत मिल रहे हैं कि कुछ खाद्य उत्पादों की थोक कीमतें बढऩे लगी हैं। स्टॉक रखने की सीमा, समय-समय पर निर्यात पर प्रतिबंध और आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसी हस्तक्षेपकारी नीतियों से बचा जाना चाहिए ताकि खाद्य कीमतें सामान्य स्तर पर आएं।

नई सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि घरेलू स्तर पर जरूरत से अधिक आपूर्ति की स्थिति से बचने के लिए सरप्लस उत्पादन का तुरंत निर्यात किया जाना चाहिए। बाजार प्रोत्साहनों की मांग कर रहे हैं और बड़े सुधारों को लेकर उत्साहित हैं। लेकिन नई सरकार की तात्कालिक प्राथमिकता बुनियादी चीजों को दुरुस्त कर आर्थिक नाव को स्थिर करना होना चाहिए। 

(लेखक जेपी मॉर्गन में चीफ इंडिया इकॉनमिस्ट हैं)
Keyword: भूमि, श्रम, पूंजी, NDA, GDP, Growth Rate, Fiscal Deficit, Economy, NBFC,
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