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वृद्धि को महत्त्व

संपादकीय /  June 06, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति ने वही किया जिसकी अपेक्षा थी। उसने लगातार तीसरी बार मानक रीपो दर में 25 आधार अंकों की कमी की। पिछले दो नीतिगत निर्णयों के उलट यह एकमत से लिया गया निर्णय था क्योंकि समिति के सभी छह सदस्यों ने कटौती की वकालत की। 5.75 फीसदी की मानक दर अब बीते नौ वर्षों की न्यूनतम है। गुरुवार को रीपो दर में की गई कटौती कुछ बातों को रेखांकित करती है। वृद्धि में उल्लेखनीय कमी आई है और निवेश कमजोर पड़ा है। निजी खपत व्यय का लगातार कम होना भी चिंता का विषय है। 

आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने नीतिगत समीक्षा के बाद आयोजित सम्मेलन में यह कहकर परिदृश्य स्पष्ट कर दिया कि यह निर्णय वृद्धि और मुद्रास्फीति की चिंता को ध्यान में रखकर लिया गया है। चिंता की वजह स्वाभाविक है। आर्थिक वृद्धि अपनी गति खो चुकी है और लगातार चौथी तिमाही में धीमापन आया है। इससे मौद्रिक नीति समिति को चालू वित्त वर्ष में वृद्धि का अनुमान घटाकर 7 फीसदी करना पड़ा है। पहले यह 7.2 फीसदी था।

दरों में कटौती के अलावा भी बाजार की नजर समिति के कदमों पर थी। बाजार को उन मोर्चों पर भी प्रसन्नता ही मिली। समिति ने एकमत से अपने रुख को निष्पक्ष से समायोजन वाला कर दिया। इससे इस बात का गहरा संदेश गया कि उसकी प्राथमिकता वृद्धि की ओर है क्योंकि मुद्रास्फीति के संकेतकों के तयशुदा सीमा में रहने का अनुमान है। ऐसे में गवर्नर शक्तिकांत दास की बातों से यह भी स्पष्ट है कि दरों में कटौती का सिलसिला थमा नहीं है।

दास तथा समिति के अन्य सदस्यों ने जहां अधिकांश कदम सही उठाए हैं, वहीं इकलौती निराशा की बात यह है कि नीति में ब्याज दर के कमजोर पारेषण की समस्या का हल नहीं किया गया है। केंद्रीय बैंक स्वयं स्वीकार कर चुका है कि 50 आधार अंक की पिछली दो कटौतियों में से केवल 21 आधार अंक की कटौती का लाभ नए कर्ज लेने वालों तक पहुंचा है। ऐसे में अगर चालू वर्ष के संशोधित वृद्धि अनुमानों को भी हासिल करना है तो मौद्रिक पारेषण की प्रक्रिया का तेज होना बहुत आवश्यक है। उस संदर्भ में देखें तो बाजार को बैंकिंग व्यवस्था में नकदी की उपलब्धता को लेकर आश्वस्ति से इतर किसी बड़े कदम की अपेक्षा थी। नकदी प्रबंधन ढांचे की समीक्षा के लिए आंतरिक कार्य समूह की घोषणा अच्छा कदम है लेकिन इससे अल्पावधि में भरोसा बढ़ता नहीं दिखता।

यकीनन सरकार को यहां अहम भूमिका निभानी होगी। आरबीआई के कदमों और बैंकों द्वारा इससे होने वाले लाभ को कर्जदारों तक नहीं पहुंचा पाना एक बड़ी समस्या है। ऐसा काफी हद तक इसलिए है क्योंकि बैंक छोटी बचत योजनाओं से प्रतिस्पर्धा करते हैं जो करीब 7.7 फीसदी की ब्याज दर मुहैया कराती हैं। कई धड़ों से यह सुझाव भी आ रहा है कि अल्प बचत दरों को 10 वर्ष के बॉन्ड के बजाय रीपो दर से जोड़ दिया जाना चाहिए। बाजार में निराशा की एक अन्य वजह रही संकट के दौर से गुजर रहे गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र को लेकर किसी विशिष्ट घोषणा का नहीं होना। 

दास ने केवल यह कहा कि केंद्रीय बैंक वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव कदम उठाएगा। यह भी अच्छा कदम है क्योंकि केंद्रीय बैंक को ढेरों कंपनियों को संकट से उबारने वाला नहीं माना जाना चाहिए। वह भी ऐसी कंपनियां जो जोखिम कम करने के तयशुदा मानकों में क्रियान्वयन के कारण दिक्कत में हैं।

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