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समावेशी और बहुलवादी बना रहेगा हमारा भारत

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  June 05, 2019

लुटियन जोन में रहने वाले उदारवादी और विभिन्न 'सिकुलर' विश्लेषक चुनाव नतीजों के सामने आने के बाद एकदम स्तब्ध हैं। चुनाव नतीजों में नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को लोकसभा में अप्रत्याशित बहुमत मिला। तब से बुर्जुआ बौद्घिक वर्ग की बहस चुनाव अभियान की उन्मादी और सांप्रदायिक विषयवस्तु के इर्दगिर्द घूम रही है। कहा जा रहा है कि इन सब ने मिलकर मोदी सरकार के 2014 के अधूरे रह गए वादों की कमियों को ढक दिया। तो क्या हमें बहुलतावादी, समावेशी भारत के अंत की घोषणा कर देनी चाहिए? बीते पांच वर्षों पर नजर डालें तो पता चलता है कि क्यों इस सवाल का जवाब न है। 

 
मोदी के आलोचकों ने अकेले दम पर हासिल की गई इस जीत का श्रेय उनके करिश्मे, पैसे की ताकत, युवा शक्ति के प्रदर्शन और व्यापक राष्ट्रीय प्रसार क्षमता को दिया है। इन सभी मोर्चों पर उन्हें 2014 की तुलना में बढ़त हासिल हुई है। हकीकत में मोदी के अखिल भारतीय रेडियो टॉक शो मन की बात को भी एक सक्षम चुनावी उपाय माना गया। इसके बावजूद बीते पांच साल में लोकसभा उपचुनावों में उनकी पार्टी को आठ सीटों पर हार का सामना करना पड़ा तथा कई अहम राज्यों के चुनाव भी वह हारी। तब से अब तक हुए 20 के करीब विधानसभा चुनावों में जितनी बार भाजपा जीती है, करीब उतनी ही बार गैर भाजपा दलों की भी जीत हुई है। हालांकि सत्ता की राजनीति की अनिवार्यताओं ने उनमें से दो को भगवा दल के साथ जुडऩे पर मजबूर किया और पार्टी ने पूर्वोत्तर में अपना खाता खोला।
 
प्रमाण के लिए हम दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव (2015), ओडिशा (2014 और 2019), पश्चिम बंगाल (2016) और छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के 2018 के विधानसभा चुनावों को याद कर सकते हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर के लोकसभा उपचुनाव भी। उस वक्त भी हिंदुत्व की लहर आज से कमजोर नहीं थी लेकिन उक्त तमाम चुनाव परिणाम रोजी-रोटी के मसलों पर लड़े गए। दिल्ली में चुनाव शहरी गरीबों के लिए बिजली, पानी, स्कूल और स्वास्थ्य के मुद्दे पर लड़ा गया, बिहार और ओडिशा में विकास के मुद्दे पर, पश्चिम बंगाल में भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए (बाद में ममता बनर्जी ने सांप्रदायिक तुष्टीकरण की राह अपनाई) और छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में किसानों के असंतोष के मुद्दे पर।
 
मोदी को 2014 में मिला बहुमत जातीय राजनीति से परे रोजगार और विकास के मुद्दे पर था। उन्होंने बहुत ऊर्जा के साथ प्रचार किया था। वह लालफीताशाही और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात करते, सक्षम प्रशासन, तेज अर्थव्यवस्था और ढेरों रोजगार की बात किया करते थे। ये सारी बातें तत्कालीन सरकार के प्रदर्शन से उलट थीं। इन बातों ने कई मतदाताओं को भाजपा को वोट देने के लिए प्रोत्साहित किया। विकास का ऊर्जावान, विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी दृष्टि जो अनिवार्य तौर पर धर्म और राष्ट्रवाद पर आधारित न हो, उसका मतदाताओं को आकर्षित करना स्वाभाविक था। 
 
अब यह भुलाना आसान है कि सन 2019 के आरंभ में आर्थिक मोर्चे पर मोदी के कमजोर प्रदर्शन के कारण लगने लगा था कि वह सत्ता में वापसी तो करेंगे लेकिन निहायत घटी हुई सीटों के साथ। कांग्रेस मतदाताओं को देशव्यापी स्तर पर बेहतर विकल्प देने में नाकाम रही तो इसके लिए उसके प्रचार अभियान की कमजोरी भी वजह रही जो अमित शाह और नरेंद्र मोदी की तरह स्पष्ट संदेश देने में नाकाम रही। आम आदमी की सोच प्रक्रिया से राहुल गांधी की दूरी के कारण वह ऐसे मसलों पर केंद्रित रहे जो व्यापक तौर पर बेमानी साबित हुए। मोदी ने राफेल सौदे में पैसे बनाए या नहीं यह बात उस समय बेमानी है जबकि लोग आजीविका के लिए परेशान हैं। भाजपा के घृणा अभियान के उलट राहुल गांधी ने प्रेम का जो संदेश प्रसारित किया वह बेतुका साबित हुआ। कांग्रेस द्वारा भाजपा के सत्ता में आने पर मुस्लिमों की बड़े पैमाने पर हत्या होने और मंदिरों की यात्राओं ने मतदाताओं को भ्रमित कर दिया। कांग्रेस की आय समर्थन योजना न्याय के पीछे की समझ पर बात की जा सकती है लेकिन यह योजना बहुत देर से आई और इसका ठीक से प्रचार नहीं हो सका। विडंबना यह है कि कांग्रेस के पास जमीनी संगठन और राज्यों में सक्षम क्षत्रप भी हैं लेकिन राहुल गांधी ने उनको उचित छूट नहीं दी।
 
इसके विपरीत, उम्र में राहुल गांधी से दो दशक बड़े मोदी और शाह ने वह किया जो गांधी नहीं कर सके। उन्होंने लोगों को जोड़ा और एक ऐसी दलील तैयार की जो बुरे दौर में उनकी पार्टी के काम आई। उन्होंने पाकिस्तान, इस्लामिक आतंकवादियों आदि का भय उत्पन्न किया। जम्मू कश्मीर में एक दशक की अपेक्षाकृत शांति के बाद ये सारे मुद्दे पुनर्जीवित हो चुके हैं। जाहिर है जिस समय अर्थव्यवस्था ठहरी हुई और विदेशी निवेशक अन्य ठिकाने खोज रहे हों तो ये मुद्दे काम आएंगे। मोदी की आलोचना करने वाले उनकी तुलना इंदिरा गांधी से करते हुए कहते हैं कि वह अधिनायकवादी हैं और संस्थानों और संवैधानिक मूल्यों की इज्जत नहीं करते। पश्चिम बंगाल में नाकारा साबित हुए वाम मोर्चे की सरकार के साथ भी मोदी सरकार की समानताएं चौंकाने वाली हैं। जिस तरह जमीन के पुनर्वितरण ने वाम मोर्चे को तीन दशक तक सत्ता में बनाए रखा, उसी तरह मोदी की शुरुआती सफलताओं मसलन जन धन और उज्ज्वला योजना ने गुजरात के बाहर आम लोगों को मोदी की क्षमताओं से वाकिफ कराया। वाम मोर्चे की औद्योगिक नीतियों की नाकामी ने वाम मोर्चे को काडर उपलब्ध कराया था, बेरोजगारी ने मोदी को बड़ी तादाद में राजनैतिक सिपाही मुहैया कराए। हमेशा प्रचार के मिजाज में रहने वाले मोदी 2020 के विभिन्न चुनावों के लिए नीतियां बना रहे हैं। उनके धर्मनिरपेक्ष विरोधियों के लिए जल्द से जल्द एकजुट होने का वक्त आ चुका है।
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