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मोदी की दूसरी पारी में अहम 'एक चीज'

देवाशिष बसु /  June 05, 2019

नरेंद्र मोदी जैसा दिग्गज राजनीतिक नेता अपने कार्यकाल को असाधारण आर्थिक सफलता दिलाने के लिए क्या कदम उठा सकता है? मौजूद विकल्पों पर रोशनी डाल रहे हैं देवाशिष बसु

 
गत 23 मई की दोपहर में ही यह साफ हो गया था कि नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक बड़ी चुनावी जीत की ओर अग्रसर है। उसके बाद से ही पत्रकारों और संपादकों के ईमेल बॉक्स में उद्योगपतियों, उद्योग संगठनों एवं वित्तीय विशेषज्ञों के संदेशों की भरमार हो गई है। सरकार की तरफ से तत्काल उठाए जाने वाले इन कदमों की सूची काफी लंबी है। पिछले कई दशकों में कई समस्याएं खड़ी हो चुकी हैं। भाजपा को मिले जबरदस्त जनादेश के बाद उसे मत देने वाले व्यक्ति से लेकर आर्थिक टिप्पणीकार भी आगे किए जाने वाले कार्यों की सूची दे रहे हैं।
 
हालांकि इन सूचियों का कोई मतलब नहीं है। मोदी शायद उन्हें पढ़ते नहीं हैं, उन्हें किसी की सलाह की जरूरत भी नहीं है, मेरे जैसे स्तंभ लेखकों की तो कतई नहीं। अच्छा हो या बुरा, सही हो या गलत, वह अपने फैसले खुद करते हैं और उन पर डटे रहते हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक जीतें जहां अपने-आप में पूर्ण रही हैं, वहीं आर्थिक मोर्चे पर उनकी जीतों को लेकर बहस हो सकती है, खासकर यह देखते हुए कि सरकार ने अपने प्रदर्शन को बेहतर दिखाने के लिए लगातार आंकड़ों में फेरबदल किए हैं। हो सकता है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के भारी शोरशराबे और आम नागरिक के अंध आशावाद के मौजूदा परिवेश में इसे कुछ समय के लिए भुला दिया जाए।
 
मोदी जैसा दिग्गज नेता अपने शासनकाल में असाधारण आर्थिक कामयाबी हासिल करने के लिए क्या कदम उठा सकता है? गैरी डब्ल्यू केलर और जेय पपासन की चर्चित किताब 'दी वन थिंग: द सरप्राइजिंग्ली सिंपल ट्रुथ बिहाइंड एक्सट्राऑर्डिनरी रिजल्ट्स' में इस सवाल का जवाब मिल सकता है। लेखक-द्वय यह सरल सवाल पूछने की सलाह देते हैं कि 'वह कौन सी एक चीज है जिसे अंजाम देने के बाद बाकी कुछ भी करना अधिक आसान हो जाता है?' अगर भारत को अपने करोड़ों नागरिकों को गरीबी से बाहर निकालने का मुख्य लक्ष्य तेजी से हासिल करना है तो वह कम मात्रा में मौजूद पूंजी को व्यर्थ नहीं गंवा सकता है। भारत को पूंजी के कारगर आवंटन की जरूरत है जो कि अर्थव्यवस्था की जीवनशक्ति होती है। 
 
मोटे तौर पर भारत में तीन तरह की इकाइयां पूंजी का इस्तेमाल करती हैं। पहला, केंद्र एवं राज्य सरकारें, दूसरा, सरकार के नियंत्रण वाले वाणिज्यिक संगठन और तीसरा, निजी क्षेत्र। जो भी पूंजी का इस्तेमाल करे, यह बहस से परे है कि पूंजी का इस्तेमाल हरसंभव लाभकारी तरीके से होना चाहिए। भारत में पूंजी खर्च होने के तरीके के बारे में बुनियादी समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति यह बता देगा कि पहली इकाई बड़े पैमाने पर पूंजी का नुकसान करती है। आज से 33 साल पहले राजीव गांधी ने इस अवसर का फायदा उठाने की गरज से शून्य-आधारित बजट (जेडबीबी) लाने की पहल की थी। इस पहल के तहत बजट संबंधी हरेक गतिविधि हरेक साल शून्य आधार से ही शुरू होती है। इसका मतलब है कि हरेक व्यय को हर साल न्यायोचित ठहराना होगा और एक साल पहले किए गए खर्च से उसका कोई नाता नहीं होगा। जहां परंपरागत बजट निर्माण में गत वर्ष की तुलना में हुई क्रमिक वृद्धि का उल्लेख होने के साथ ही अवशिष्ट का आकलन भी किया जाता है, वहीं जेडबीबी व्ययकर्ताओं पर हर बार यह दबाव डालता है कि खर्चों को न्यायोचित ठहराया जाए और लागत कम की जाए। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। सांसद क्षेत्र विकास निधि के तहत हरेक साल अरबों रुपये आवंटित किए जाते हैं। सांसद इस राशि का थोड़ा सा हिस्सा ही खर्च करते हैं और उन्हें बची हुई राशि अगले साल ले जाने की भी अनुमति होती है। लेकिन जेडबीबी में अपनी राशि खर्च नहीं करने वाले सांसदों को रकम नहीं आवंटित की जाएगी और अधिक कारगर ढंग से या अधिक जरूरत वाले क्षेत्रों में वह राशि खर्च की जाएगी। जब सैकड़ों अरब रुपये इकट्ठा हो जाएंगे तो कहीं अधिक फायदे उठाए जा सकेंगे। तमाम विभागों के बीच फालतू खर्चों और नदारद कर्मचारियों के बारे में भी पता कर सकते हैं।
 
पूंजी बरबाद करने वालों में दूसरा स्थान सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) का है। हमें नहीं मालूम है कि मोदी इनके बारे में क्या करना चाहते हैं क्योंकि उनके कार्यकाल में पीएसयू वे तमाम काम कर रहे हैं जिन्हें निजी क्षेत्र की कंपनियां बेहतर ढंग से अंजाम दे रही हैं। यहां तक कि वित्तीय एवं डिजिटल ढांचे जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में भी यह हो रहा है। इसके अलावा होटल, एयरलाइन, टेलीफोन, इस्पात, खाद, इंजीनियरिंग और फोटो फिल्म तक में पीएसयू की खराब हालत को दुरुस्त करने की कोई कोशिश हुई है। राज्यों में भी सक्रिय सैकड़ों पीएसयू की हालत ऐसी ही है। पूंजी आवंटनकर्ता होने के नाते सरकार और पीएसयू दोनों को ही पैसे की बरबादी रोकने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं होता है। अगर इसे अलग तरीके से देखें तो इसमें उनका कुछ भी दांव पर नहीं होता है। उन्हें इस खेल से बाहर करने की जरूरत है क्योंकि वे अरबों रुपये बरबाद कर रहे हैं जिसे उपभोक्ताओं और कारोबारों को मिलना चाहिए।
 
इसके विपरीत, पूंजी आवंटनकर्ताओं की तीसरी किस्म निजी क्षेत्र की उन कंपनियों की होती है जिनका इस खेल में बहुत कुछ दांव पर माना जाता है। चाहे वह टाटा जैसी विशाल कंपनी हो या कोई छोटी कंपनी। अगर उनका इस खेल में दांव नहीं लगा होता है तो इसकी वजह यह है कि राज्य या उसके तमाम अंग (नेता, बाबू और सार्वजनिक बैंक) उन्हें पीएसयू की ही तरह गैरजिम्मेदाराना ढंग से काम करने देते हैं जिसे दोस्ताना पूंजीवाद के रूप में पेश किया जाता है। अगर निजी क्षेत्र को निष्पक्ष ढंग से प्रतिस्पद्र्धा करने की आजादी दी जाती है तो वह पहले दो पूंजी आवंटनकर्ताओं की तुलना में कहीं बेहतर साबित होंगे।
 
अगर एक सरकार कारगर ढंग से पूंजी आवंटन प्राथमिकता तय करती है तो उसका मतलब होगा एक छोटा राज्य, करों में कमी, खर्च योग्य आय में बढ़त और वस्तुओं एवं सेवाओं का सस्ता होना। फिर राज्य अपनी पूंजी को उन इलाकों में आवंटित कर सकता है जो इस संरचनात्मक बदलाव में मदद करते हैं। जीत का जश्न खत्म होने के बाद क्या भाजपा अपने राजनीतिक जनादेश को प्रभावी संरचनात्मक बदलाव लाने वाले जनादेश में बदलेगी? यह 'एक चीज' बाकी प्रयासों को काफी हद तक गैरजरूरी बना देगी।
 
(लेखक वेबसाइट मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं) 
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress, narendra modi, amit shah,,
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