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कर्नाटक: पूजा-पाठ से बारिश की आस

देवाशिष महापात्र /  June 05, 2019

कर्नाटक में सूखा पडऩे की बात कोई नई नहीं है। 2001-2018 के बीच 14 साल में सरकार ने राज्य के कई हिस्सों में सूखा पडऩे की घोषणा की। केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट कहती है कि देश के जिन 24 जिलों में भयंकर सूखा पडऩे का खतरा मंडरा रहा है उनमें से 16 जिले कर्नाटक के हैं। इनमें हासन, कोलार, दावणगेरे, बेलगाम, बगलकोट और बेंगलूरु ग्रामीण जिले शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि 2018-19 के फसल वर्ष में पिछले वर्षों के मुकाबले और भी अधिक सूखा पड़ा। राज्य के अधिकारी बताते हैं कि  इसकी वजह लगातार दो वर्ष में कम बारिश का होना है। कमजोर आर्थिक हालात से गुजर रहे राज्य में कृषि उपज में कमी आने तथा पीने के पानी के संकट से दोहरी मार पड़ रही है। 

 
कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र के निदेशक जीएस श्रीनिवास रेड्डी ने कहा, 'अगस्त 2018 तक तक हमने 45 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया था। लेकिन अगस्त के बाद राज्य के आंतरिक हिस्सों के साथ ही जलग्रहण क्षेत्र में भी पर्याप्त बारिश नहीं हुई। लिहाजा खरीफ सीजन में हमें कुल 100 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित करना पड़ा था।' उन्होंने कहा, 'रबी सीजन में 56 और तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है जिसके बाद राज्य के 176 में से कुल 156 तालुके सूखे की चपेट में आ चुके हैं।' ऐसे समय पर जब राज्य के 90 फीसदी तालुके सूखे की चपेट में हैं, इसका असर बांधों के जलस्तर पर भी दिखाई पड़ रहा है। कुल 12 बांधों में से नौ बांधों में कुल क्षमता का 20 फीसदी तक ही पानी बचा है जो सूखा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को पीने का पानी मुहैया कराने भर के लिए ही पर्याप्त है। तकरीबन 800 टीएमसी की भंडारण क्षमता के मुकाबले फिलहाल कुल भंडारण 41 टीएमसी के आसपास ही है।
 
जल स्तर का इतने गंभीर स्तर पर नीचे जाने से राज्य के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के आंतरिक इलाकों में पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया है। ये इलाके पीने के पानी के लिए सबसे अधिक भूजल पर ही निर्भर हैं। रेड्डी ने कहा, 'चूंकि 60 फीसदी से अधिक पीने का पानी भूजल संसाधनों से मिलता है, ऐसे में बारिश कम होने की वजह से जलस्तर घटने से राज्य में लोगों के लिए पीने के पानी की समस्या खड़ी हो रही है। फिलहाल करीब 45 तालुकों में पीने के पानी की किल्लत अति गंभीर स्थिति में है जबकि अन्य 100 जिलों में स्थिति अद्र्घ गंभीर और गंभीर श्रेणी की है।'  अधिकारियों के मुताबिक कृषि विभाग में बांधों के पानी को पीने के लिए सुरक्षित रखा जा रहा है जबकि राज्य में कृषि के लिए सिंचाई पर लगभग रोक लगा दी गई है। कृषि विभाग के एक अधिकारी ने पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, 'पिछले वर्ष नवंबर में राज्य सरकार ने बांधों से कृषि के लिए की जा रही पानी की आपूर्ति को नियंत्रित करने का निर्णय लिया। इसका नतीजा रहा कि किसान सिंचित क्षेत्रों में रबी के फसलों की बुआई नहीं कर सके।' सिंचाई के लिए पानी की कमी और बोरवेलों में घटते जल स्तर की वजह से रबी की बड़ी फसलों की पैदावार में भारी गिरावट हुई है। उत्तरी कर्नाटक के भीतरी इलाकों में पैदावार के लिए बड़े पैमाने पर बोरवेल का इस्तेमाल किया जाता है। अधिकारी ने कहा, 'इस साल सूखे की वजह से रबी ज्वार और चना जैसी फसलों के साथ ही धान की पैदावार पर भी बहुत बुरा असर हुआ है।' राज्य के कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक रबी सीजन में करीब 6 लाख हेक्टेयर जमीन पर बुआई नहीं हो सकी और खरीफ सीजन में करीब 8 लाख हेक्टेयर जमीन परती पड़े रहे। अधिकारी ने कहा, '60 लाख हेक्टेयर खरीफ फसल में से 50 फीसदी बर्बाद हो रहा है जबकि 20 लाख हेक्टेयर रबी फसल भी प्रभावित हुआ था।' 
 
सरकार फिलहाल राज्य के 2,000 गांवों में टैंकरों की मदद से पानी की आपूर्ति कर रही है। अधिकारियों ने कहा कि कृष्णा नदी पर सभी बराजों के सूख जाने पर राज्य सरकार ने महाराष्ट्र सरकार से भी 4 टीएमसी पानी छोडऩे का अनुरोध किया है।कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र के रेड्डी ने कहा, 'प्रभावित गावों को पानी की आपूर्ति करने के लिए हमने किराये पर अच्छे जल स्तर वाले बोरवेल भी लिए हैं। राज्य सरकार इन निजी बोरवेलों के मालिकों को 20,000 रुपये प्रति महीने का भुगतान कर रही है।' राज्य सरकार ने मवेशियों की देखभाल के लिए 21 गोशालाएं शुरू करने के साथ ही राज्य से बाहर चारे के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। राज्य सरकार के अधिकारियों ने कहा, 'मवेशियों और अन्य पालतू जानवरों के लिए चारा बैंक बनाए गए हैं। हम किसानों को 5 करोड़ चारा किट वितरित कर रहे हैं।' इसके अलावा राज्य सरकार इस साल महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत 12 करोड़ कार्य दिवस मुहैया कराने का लक्ष्य बना रही है जबकि पिछले वर्ष 8 करोड़ कार्य दिवस मुहैया कराए गए थे।  जोखिम को कम करने के लिए इन उपायों को लागू करने के साथ ही सरकार आगामी वर्षा ऋतु में बारिश को बढ़ाने के लिए बादल का बीजरोपण (क्लाउड सीडिंग) को अपनाने पर भी विचार कर रही है। रिपोर्टों की मानें तो सरकार इसके लिए 91 करोड़ रुपये की राशि मंजूर कर चुकी है। इस काम पर जुलाई के मध्य में काम शुरू हो सकता है। सूखे की स्थिति से निपटने के लिए सरकार के एजेंडे में जहां बढ़ चढ़ कर विज्ञान के इस्तेमाल की बात तो है ही, सरकार दैवीय हस्तक्षेप की उम्मीद भी लगा रही है। तमिलनाडु के रास्ते पर चलते हुए राज्य सरकार ने पिछले हफ्ते एक आदेश जारी किया जिसमें भरपूर बारिश के लिए वर्षा के देवता को मनाने की खातिर मंदिरों को विशेष पूजा आयोजित करने के लिए कहा गया है। अच्छी वित्तीय स्थिति वाले मंदिरों को 6 जून की सुबह से अभिषेक, होम आदि जैसे अनुष्ठान करने को कहा गया है। 
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