बिजनेस स्टैंडर्ड - महाराष्ट्र को सूखा मुक्त बनाने की योजना विफल
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महाराष्ट्र को सूखा मुक्त बनाने की योजना विफल

अमृता पिल्लई /  June 05, 2019

अप्रैल 2016 में महाराष्ट्र सरकार ने सूखा प्रभावित लातूर में जल की आपूर्ति के लिए बहुचर्चित जल ट्रेन चलाई थी। उसी वर्ष राज्य सरकार ने जलयुक्त शिवार अभियान की शुरुआत की जिसका उद्देश्य साल 2019 तक महाराष्ट्र को सूखा मुक्त करना था। इस महत्त्वाकांक्षी योजना के बावजूद राज्य के 40 फीसदी जगहों पर सूखा पड़ रहा है जिसकी आड़ में पानी टैंकर का कारोबार खूब फल फूल रहा है। जलयुक्त शिवार अभियान का लक्ष्य नहरों को गहरा और चौड़ा कर, सीमेंट व मिट्टी के रुकावट बांध बनाकर, नालों की मरम्मत तथा तालाबों की खुदाई के जरिये 2019 तक राज्य को सूखा मुक्त बनाना था। लेकिन फरवरी 2019 में सरकार ने 358 तालुकों में से 151 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया। इन तालुकों में 28,524 गांव शामिल हैं। इन तालुकों में से 112 को भयंकर सूखा घोषित किया गया है।

 
एक ओर जहां सामाजिक कार्यकर्ता दावा कर रहे हैं कि जलयुक्त योजना पूरे जोर शोर से शुरू होने के बाद अब विफल हो चुकी है, वहीं सरकारी अधिकारी यह कहकर अपने काम का बचाव कर रहे हैं कि पिछले मॉनसून में बारिश में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई थी। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल पश्चिमी क्षेत्र के लिए जलाशय में पिछले साल से कम पानी है। पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात और महाराष्ट्र राज्य शामिल हैं। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है, 'समान अवधि के दौरान जलाशयों में उपलब्ध पानी पिछले 10 साल के औसत से भी कम है।' केंद्रीय जल आयोग महाराष्ट्र में जिन 19 जलाशयों की निगरानी करता है 23 मई को उनमें से पांच पूरी तरह से सूखे पाए गए। वित्त वर्ष 2017 और वित्त वर्ष 2020 के बीच राज्य सरकार के बजट में जलयुक्त शिवार अभियान के लिए 5,200 करोड़ रुपये का कुल आवंटन किया गया। जल संरक्षण और रोजगार गारंटी योजना (ईजीएस) के सचिव एकनाथ डवले ने कहा कि विभिन्न स्रोतों से इस योजना पर किया गया कुल खर्च 8,000 करोड़ रुपये है।
 
इतनी बड़ी रकम के आवंटन के बावजूद राज्य के 40 फीसदी जगहों पर बुनियादी जरूरतों के लिए भी पानी की कमी से जूझना पड़ रहा है। पानी की इस किल्लत की वजह से एक बार फिर टकराहट सतह पर आ गई है। इसी महीने स्थानीय मीडिया ने महाराष्ट्र के मनमाड़ जिले में एक घर के टैंक से पानी चोरी के सिलसिले में प्राथमिकी दर्ज होने की खबर दी थी। जल पुरुष के नाम से प्रसिद्घ जल संरक्षक राजेंद्र सिंह ने कहा, 'इस योजना की शुरुआत अच्छे उद्देश्य से हुई थी, यदि यह अपनी लय को बरकरार रख पाती तो परिणाम कुछ अलग होता। जिस काम को समुदायिक कार्य योजना के रूप शुरू किया गया था वह ठेका से संचालित होने वाला काम बन गया और फिर इसके क्षरण की शुरुआत हो गई।' 
 
हालांकि डवले इस बात को खारिज करते हैं कि योजना विफल हो गई। उन्होंने कहा, 'योजना में कुछ भी गलत नहीं हुआ है। सितंबर माह में बारिश 26 प्रतिशत रही थी जो कि इस महीने में दर्ज होने वाली बारिश में ऐतिहासिक गिरावट को दर्शाता है। इसकी वजह से भंडारण की पूर्ति नहीं हो पाई। इससे जुड़े केवल बड़े कामों को ही ठेकेदार के हवाले किया गया है जबकि छोटे काम सामुदायिक स्तर पर हो रहे हैं।' पेयजल की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार राज्य प्राधिकरणों ने दावा किया कि प्रभावित इलाकों में टैंकर के जरिये पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। राज्य सरकार के जल आपूर्ति और स्वच्छता विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव गोयल ने कहा कि 216 सरकारी टैंकरों और 5,643 दूसरे निजी टैंकरों का इस्तेमाल पेयजल की आपूर्ति के लिए किया जा रहा है। गोयल ने सरकार के लिए निजी टैंकरों के इस्तेमाल पर 4,000 रुपये प्रति टैंकर प्रतिदिन का खर्च आने का अनुमान जताया है। हालांकि, जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने इस दौरान फल फूल रहे टैंकर लॉबी की ओर इशारा किया है। लातूर के स्थानीय नागरिक और एक सामाजिक कार्यकर्ता रंजीत आचार्य ने कहा, 'चार आदमी के परिवार को अपनी जरूरत के पानी के इंतजाम के लिए 3,000 रुपये या उससे अधिक का भुगतान करना होगा।' यह रकम मुंबई जैसे शहर में एक औसत परिवार के मासिक बिजली बिल के बराबर है। उनका कहना है कि निजी टैंकरों से पानी की आपूर्ति मुफ्त में करने की उम्मीद की जाती है लेकिन इस प्रक्रिया में दलाल और बिचौलिए आ जाते हैं जिन्हें राज्य के कुछ हिस्सों में ग्रामीणों को भुगतान करने की जरूरत पड़ती है।
 
आचार्य इशारा करते हैं कि लातूर जैसे जिलों में चुनाव अभियान के दौरान पानी एक बड़ा मुद्दा था। उन्होंने कहा, 'यह पिछले दो वर्ष से चुनावी मुद्दा है। वे पानी की पूर्वावस्था बहाल करने वाली परियोजनाओं की चर्चा करते हैं और जल ट्रेनों का वादा करते हैं। हालांकि पिछली बार जल ट्रेन से केवल शहर को फायदा पहुंचा न कि जिले को। यदि लोगों को कोई बदलाव लाना है तो यह उन्हें अपने स्तर से ही करना होगा।' बहुत से लोग यह मानते हैं कि परिवर्तन केवल सामुदायकि स्तर पर होने वाले प्रयासों से ही आएगा। उन्होंने कहा, 'जलयुक्त शिवार ने सांगली जैसी जगहों पर अच्छा काम किया जहां के लोगों ने पूर्वावस्था बहाल करने वाली परियोजनाओं के विकास में अपना सहयोग दिया। जब लोग इसके निर्माण में सहयोग देते हैं तो वे इसके टिकाऊ उपयोग के लिए भी खड़े होते हैं।' टैंकर अर्थव्यवस्था के समानांतर कुछ सूखाग्रस्त इलाकों में मिनरल वाटर का कारोबार भी जोर पकड़ रहा है। औरंगाबाद के सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष लोम्टे ने कहा, 'इन कंपनियों ने बोर वेल लगाए हैं जहां से पानी निकाल कर प्लास्टिक के जारों में भरकर बेचते हैं। जल की गुणवत्ता की कोई जांच नहीं होती और इसे औरंगाबाद शहर में पानी की कीमत से दोगुनी कीमत पर बेचा जाता है।' लोम्टे ने 2014 में आम आदमी पार्टी (आप) के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़ा था। 
Keyword: drought, water crisis, maharashtra,,
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