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विविध चुनौतियां

संपादकीय /  June 04, 2019

आम चुनाव समाप्त हो चुके हैं और अब जुलाई में पेश होने वाले वर्ष 2019-20 के आम बजट पर ध्यान देने की आवश्यकता है। फरवरी में पेश किए गए अंतरिम बजट में पूरे वर्ष के राजस्व रुझान और व्यय को लेकर कुछ अनुमान प्रस्तुत किए गए थे। परंतु अब यह स्पष्ट है कि हालात कहीं अधिक खराब हो चुके हैं। बीती तीन तिमाहियों में वृद्घि में जो धीमापन आया है वह राजस्व को प्रभावित कर सकता है। अंतरिम बजट में जो लक्ष्य तय किए गए थे वे इस परिदृश्य में महत्त्वाकांक्षी नजर आते हैं। अंतरिम बजट में कहा गया था कि कॉर्पोरेट टैक्स संग्रह 16 फीसदी से अधिक होगा और व्यक्तिगत आय कर संग्रह में इससे भी अधिक करीब 32 फीसदी का इजाफा होगा। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने लक्ष्य में कमी करने की मांग की है क्योंकि वृद्घि घट रही है। वस्तु एवं सेवा कर संग्रह का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था की सेहत से है। अंतरिम बजट में उसमें 18 फीसदी की दर से इजाफा होने की आशा व्यक्त की गई थी। परंतु बीते कुछ महीनों को देखें तो जीएसटी प्राप्तियां निरंतर कमजोर बनी हुई हैं। 

 
अगर राजस्व का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता है तो बजट की वित्त व्यवस्था के गणित में भारी दिक्कत उत्पन्न हो सकती है। अगर बदलते हालात के मद्देनजर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अंतरिम बजट के कुछ अनुमानों पर नए सिरे से विचार नहीं करती हैं तो सवाल उठने लाजिमी हैं। राजस्व के मोर्चे पर तंगी का अनुमान तमाम क्षेत्रों को प्रभावित करेगा। उदाहरण के लिए सरकार के पास वृद्घि को गति देने के लिए व्यय बढ़ाने की गुंजाइश बहुत सीमित रहेगी। अगर मंदी में रुकावट आती है तो भी ऐसा होना तय है। राजकोषीय समावेशन का मार्ग इस सरकार की प्रमुख प्रतिबद्घताओं में से एक रहा है। भले ही अप्रत्याशित लोकलुभावन व्यय के चलते इसमें एक या दो बार संशोधन करना पड़ा। भविष्य में इस मार्ग से किसी भी तरह का विचलन सरकार की वित्तीय समझदारी की अर्जित प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाएगा। सरकार ऐसी कीमत शायद ही चुकाना चाहेगी। इसके अतिरिक्त चूंकि वृद्घि में धीमेपन का संबंध निजी निवेश के संकट से भी है इसलिए सरकार को राजकोषीय घाटे या बढ़ते ऋण प्रोफाइल को लेकर किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए। अगर निजी निवेश बाहर होता है या इसके बहिर्गमन की गति बढ़ती है तो यह मौजूदा हालात में अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी पड़ेगा। 
 
यह भी स्पष्ट है कि वर्ष के बचे हुए महीनों में लोकलुभावन कदमों की कोई गुंजाइश नहीं है। सरकार पहले ही कुछ अतिरिक्त व्यय कर चुकी है। किसानों के लिए पीएम-किसान योजना का विस्तार किया जा चुका है। इसकी घोषणा चुनाव के पश्चात पहली कैबिनेट बैठक में किया जा चुका है। इस विस्तार के बाद पहले नियोजित 75,000 करोड़ रुपये की राशि के अलावा 12,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। ऐसे में नई वित्त मंत्री को विभिन्न मतदाता वर्ग के लिए रियायती घोषणाओं के आकर्षण से बचना होगा। बल्कि नया बजट उनके लिए कई चुनौतियां लेकर आाएगा। उन्हें न केवल वृद्घि में नई जान फूंकनी होगी बल्कि साथ ही साथ राजकोषीय विवेक को भी बरकरार रखने होंगे। घटते और तनावग्रस्त राजस्व के बावजूद सरकार को कंपनियों के आकार से परे सभी कंपनियों के लिए 25 फीसदी की निगमित कर दर तय करनी चाहिए। सीतारमण के लिए सबसे बेहतर यही होगा कि वह एक राजकोषीय विवेक संपन्न बजट प्रस्तुत करें जिसमें सुर्खियों और लोकलुभावन कदमों के लिए जगह नहीं हो। 
Keyword: parliament, election, budget, economy,,
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