बिजनेस स्टैंडर्ड - नई सरकार और पर्यावरण से जुड़े हुए मसले
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नई सरकार और पर्यावरण से जुड़े हुए मसले

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  June 03, 2019

वर्ष 2019 के आम चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और पुरानी सरकार एक बार फिर चुनी गई है। ऐसे में पर्यावरण और विकास का एजेंडा क्या होना चाहिए? कृषि क्षेत्र का संकट ऐसी अहम समस्या है जिससे तत्काल निपटने की आवश्यकता है। सच तो यह है कि खेती तेजी से अलाभकारी व्यवसाय बनती जा रही है और इससे लाखों लोगों की आजीविका को लेकर संकट उत्पन्न हो गया है। इससे निराशा फैल रही है और उनके पास शहरी इलाकों की अवैध बस्तियों में भीड़ बढ़ाने के अलावा अन्य विकल्प शेष नहीं रह गया है। मौसम का उतार-चढ़ाव किसानों के संकट में और अधिक इजाफा कर रहा है और वे कभी अधिशेष उपज के कारण कीमत में गिरावट का सामना करते हैं तो कभी ऐसा संकट उत्पन्न हो जाता है कि आयात करना पड़ता है।

 
बीते पांच वर्ष में सरकार ने दो अहम पहलुओं पर काम किया। पहला, फसल के नुकसान से परेशान किसानों को बीमा सुरक्षा और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सबसे गरीब परिवारों को आवास, शौचालय तथा गैस सिलिंडर के रूप में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना। परंतु किसानों की खेती की लागत उनके उपज मूल्य से अधिक न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए अभी काफी कुछ किया जाना है। उन्हें उपज बढ़ाने के लिए सिंचाई की समुचित सुविधा मुहैया करानी होगी और उनकी फसल को आवारा और जंगली पशुओं द्वारा नष्ट किए जाने से भी बचाना होगा। बीमा योजना में ऐसे बदलाव होने चाहिए कि किसानों के हाथ में नकद राशि आए और वे जलवायु परिवर्तन के जोखिम के समय से निपट सकें।
 
दूसरा, वानिकी को लेकर नीतियों में तत्काल बदलाव की आवश्यकता है। बीते पांच वर्ष में इस क्षेत्र को लेकर सरकार की नीतियां किसी काम की नहीं थीं। गरीब आदिवासियों को वानिकी से किस प्रकार जीविका मुहैया कराई जानी चाहिए इसे लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। एक ओर सरकार ने बांस को घास घोषित कर उसे उगाने की इजाजत देने वाला नियम बनाया और उसने लघु वन उपज के लिए मूल्य समर्थन भी बेहतर किया तो वहीं दूसरी ओर उसने एक मसौदा वन नीति प्रस्तुत की जो वानिकी और उससे जुड़े कारोबार का पूरा नियंत्रण विभाग के हाथ में सौंपता है। उसने वन अधिकार अधिनियम 2006 के क्रियान्वयन की दिशा में कोई पहलकदमी नहीं की। अगर ऐसा किया जाता तो उन गरीब समुदायों को आर्थिक मदद मिलती जो इन संसाधनों पर निर्भर हैं।
 
यह भी सच है कि पिछली सरकारों की तरह इस सरकार ने भी वन्यजीव संरक्षण के लिए खुलकर कोई दिक्कत नहीं पैदा की। उसने वन्यजीवों के संरक्षण के लिए आवाज उठाना जारी रखा लेकिन दूसरी सरकारों की तरह इस दौरान वह भी वनों को सड़क, खनन और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए खोलती रही। कुल मिलाकर वानिकी और आजीविका के लिए उसका विकास कभी सरकार की प्राथमिकता में नहीं रहा। अब इसमें बदलाव का वक्त आ चुका है। इसके बाद स्थानीय प्रदूषण यानी जल एवं वायु प्रदूषण का मसला आता है। ये दोनों स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं। इसमें दो राय नहीं कि वायु प्रदूषण संकट एकदम आसन्न है और साफ नजर आ रहा है। बीते कुछ वर्षों में सरकार ने ईंधन की गुणवत्ता पर काम किया है और वाहन प्रौद्योगिकी मानकों में सुधार किया है। किसानों को उपकरण खरीद पर सब्सिडी दी जा रही है ताकि वे फसल अवशेष जलाएं नहीं। परंतु ये कदम उठाने में देर हो चुकी है। सरकार स्वच्छ हवा चाहती है लेकिन इसके लिए वह कोई कड़ा कदम उठाना नहीं चाहती। आवागमन प्रणाली में बदलाव, निजी कारों पर रोक या स्वच्छ ईंधन की सस्ती और बेहतर उपलब्धता पर ध्यान नहीं है।
 
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए कुछ खास नहीं किया है। हमें प्रभावी प्रतिरोध की आवश्यकता है लेकिन बीते पांच वर्ष में हमारे पर्यावरण संस्थानों में गड़बड़ी बढ़ती गई है। आज देश के पर्यावरण संस्थानों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकांश अधिकारी यह मानते हैं कि उनका काम पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण कायम करना नहीं बल्कि औद्योगिक हितों का संरक्षण करना है। न तो उनके पास क्षमता है, न निगरानी और न ही कोई नेतृत्व। वे केवल अदालती आदेशों से गति पाते हैं जो अक्सर तत्कालीन सरकार की इच्छा के विपरीत होते हैं। अगर हम एक स्वच्छ पर्यावरण चाहते हैं तो इसमें बदलाव लाना होगा। इसलिए क्योंकि यह मसला हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा है। नदियों, जल प्रदूषण और जल संकट की बात करें तो यह सब शौचालय निर्माण और नदी सौंदर्यीकरण की दौड़ में कहीं पीछे छूट गया है। यही वजह है कि हमें देश के अधिकांश हिस्सों में सूखे का सामना करना पड़ रहा है। यह मुद्दा 2019 के चुनाव में नजर नहीं आया तो इसका मतलब यह नहीं कि ये मौजूद ही नहीं है। यह संकट निरंतर बढ़ता जाएगा। हर बार बाढ़ और सूखा देश के लोगों को और अधिक गरीबी और मुसीबत में डालते हैं।
 
आप कह सकते हैं कि यह केंद्र सरकार के एजेंडे में नहीं है। लोग आगामी विधानसभा चुनावों के वक्त इन मुद्दों पर मतदान करेंगे। मैं इससे असहमत हूं। ये राष्ट्रीय मुद्दे हैं। सरकार, खासतौर पर इतने भारी बहुमत से आने वाली सरकार को आगे बढऩा होगा और समावेशी और स्थायी भविष्य के लिए नेतृत्व प्रदान करना होगा। लोगों ने बदलाव के विरोध में मतदान किया है। इसका यह मतलब नहीं कि वे बदलाव नहीं चाहते बल्कि वे इस सरकार में भरोसा करते हैं कि यह जरूरी बदलाव ला सकती है। ऐसे में इस सरकार को उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना ही होगा।
Keyword: narendra modi, BJP, environment,,
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