बिजनेस स्टैंडर्ड - देश की नई वित्त मंत्री के लिए 6 सुझाव
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देश की नई वित्त मंत्री के लिए 6 सुझाव

तमाल बंद्योपाध्याय /  June 03, 2019

प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार और नई वित्त मंत्री को सलाह दे रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
देश में आगामी पांच वर्ष के लिए एक अत्यंत मजबूत सरकार बन चुकी है। केंद्रीय बैंक में भी एक व्यावहारिक गवर्नर है। यही कारण है कि मैं देश की नई वित्त मंत्री के समक्ष छह अनचाही सलाह प्रस्तुत करने का उत्साह जुटा सका हूं। उनमें से कुछ सलाह कठोर प्रतीत हो सकती हैं लेकिन भाजपा की यह सरकार भी निर्णय लेने में सक्षम और मिशन मोड पर काम करने वाली है।
 
सरकारी बैंकों का निजीकरण: बैंकिंग अधिनियम के अधीन सरकार को ऐसे बैंकों में 51 फीसदी चुकता पूंजी रखना अनिवार्य है। सरकार के अलावा ऐसे बैंकों तथा अन्य सरकारी उपक्रमों में भारतीय जीवन बीमा निगम भी अच्छी खासी हिस्सेदारी रखता है। कुछ बैंकों की आपस में क्रॉस होल्डिंग भी है, यानी सरकार का पूरा नियंत्रण सुनिश्चित है। इसमें बदलाव करने की आवश्यकता है। बीते दो वर्ष में सरकार ने सरकारी बैंकों में करीब 2 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डाली है। सरकार 2009 से करीब 3.3 लाख करोड़ रुपये की पूंजी इनमें डाल चुकी है।अगर उसने इतना पैसा बैंक निफ्टी में निवेश किया होता तो उसकी काफी आय हुई होती। एक पैनल ने सभी सरकारी बैंकों के संचालन के लिए एक होल्डिंग कंपनी की बात कही थी और कहा था कि उनको किफायती तरीके से चलाने के लिए सरकारी हिस्सेदारी उसमें स्थानांतरित कर दी जाए। यह मुश्किल हो सकता है क्योंकि सरकार के लिए नियंत्रण छोडऩा आसान नहीं। इससे समस्या हल नहीं होगी। सरकारी बैंकों में 70 फीसदी हिस्सेदारी आवश्यक नहीं है। कुछ छोटे सरकारी बैंकों के निजीकरण से शुरुआत हो सकती है। 
 
प्राथमिकता क्षेत्र के ऋण मानक का समापन: देश में संचालित विदेशी बैंकों समेत सभी वाणिज्यिक बैंकों को अपने कुल ऋण का 40 फीसदी तथाकथित प्राथमिकता वाले क्षेत्र को देना होता है। इसमें छोटे उपक्रम, किसान आदि शामिल हैं। यहां क्षेत्र की परिभाषा समय-समय पर बदलती रहती है। अधिकांश बैंक लक्ष्य पूरा नहीं कर पाते। वे सूक्ष्म वित्त संस्थानों को पैसा देते हैं या चुनिंदा बॉन्ड में निवेश करते हैं। यकीनन इन क्षेत्रों को ऋण की आवश्यकता है लेकिन नाबार्ड, सिडबी या राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी) के माध्यम से यह काम सीधे भी हो सकता है। उपरोक्त तीन में से दो पुनर्वित्त एजेंसियां हैं और उन पर कुछ नियामकीय दायित्व भी है। उन्हें किसानों, छोटे उद्यमियों, सस्ते आवास आदि की वित्तीय जरूरत पूरी करने देनी चाहिए।
 
एनएचबी को विराम: एनएचबी को बंद क्यों किया जाना चाहिए? केवल इसलिए क्योंकि कुछ बड़ी मॉर्गेज कंपनियां संकट में हैं? अगर यह कारण है तो आरबीआई को भी बंद कर दिया जाना चाहिए क्योंकि गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी आईएलऐंडएफएस तथा एक बड़े सरकारी बैंक (पंजाब नैशनल बैंक) में धोखाधड़ी सामने आई? सन 1988 में एनएचबी की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि देश में मॉर्गेज बाजार बन सके। उस वक्त देश में बैंक आवास ऋण नहीं देते थे। इससे परिसंपत्ति और देनदारी का असंतुलन हो गया था। एनएचबी का काम था आवास ऋण के लिए लंबी अवधि का ऋण मुहैया कराना और इसका बाजार तैयार करना। यह अपने उद्देश्य में सफल रहा और अब वक्त है इसे आराम देने का। आरबीआई ने एनएचबी में 1,450 करोड़ रुपये की संपूर्ण पूंजी डाली थी, उसने मार्च में अपनी हिस्सेदारी समाप्त कर दी। समय के साथ कुछ प्रमुख आवास वित्त कंपनियों ने एनएचबी की नियामकीय भूमिका अख्तियार कर ली और यह केवल रीफाइनैंस एजेंसी बन गई। मामला जटिल इसलिए हो गया क्योंकि लाइसेंस देने में उदारता बरती गई। अब देश में 98 एचएफसी कंपनियां हैं जो तीन साल पहले की तुलना में दोगुना है। 
 
इन एचएफसी ने एनएचबी से लंबी अवधि के लिए सस्ता पुनर्वित्त लिया और उसे अचल संपत्ति कारोबारियों को कर्ज के रूप में दे दिया। एनएचबी अधिनियम कहता है कि एक एचएफसी का आवास ऋण संपत्ति की पुनर्वित्त में अहम भूमिका है लेकिन यह नहीं बताया गया है कि कितनी? इससे आरबीआई द्वारा विनियमित एनबीएफसी और एनएचबी द्वारा नियमित एचएफसी के बीच की रेखा कमजोर पड़ी। दोनों नियामक एक साथ इन कंपनियों के बहीखाते की निगरानी नहीं कर सकते। एनएचबी की वेबसाइट बताती है कि कैसे वह मानक उल्लंघन करने पर एचएफसी को दंडित करती है। उसने 9 अगस्त, 2018 को जमा लेने वाली एचएफसी दीवान हाउसिंग फाइनैंस कॉर्प लिमिटेड पर 6,500 रुपये का जुर्माना लगाया क्योंकि उसने एनएचबी के एक नियम का पालन नहीं किया था। दरअसल यह अधिनियम एचएफसी को केवल एक बार फंसी परिसंपत्ति के पुनर्गठन की इजाजत देता है लेकिन बोर्ड की इजाजत से। इस मामले में ऐसा बिना बोर्ड की मंजूरी के किया गया था। इन तमाम बातों के बीच जब तक एनएचबी और आरबीआई ने मिलकर बहीखातों की जांच का निर्णय किया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 100 से भी कम एनएचबी कर्मियां को एचएफसी की 6 लाख करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों की निगरानी का काम दिया गया। हमें अलग मॉर्गेज नियामक नहीं चाहिए। एनएचबी और आरबीआई का विलय करके भी एचएफसी के नियमन के लिए नई शाखा बनाई जा सकती है। 
 
दिवालिया संहिता में सुधार: देश का दिवालिया कानून अन्य देशों की तुलना में आक्रामक है। बीते कुछ वर्षों के दौरान नया कानून आने के बाद बैंकरों और कॉर्पोरेट दोनों की भंगिमा बदली है। प्रवर्तक अब अपने साम्राज्य को हल्के में नहीं ले रहे और न ही बैंक। परंतु जमीन पर बदलाव नहीं आ रहा। बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते भी ऐसे मामले तय अवधि में नहीं निपट पा रहे।  राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट और अपील पंचाट के पास अनेक मामले लंबित हैं क्योंकि प्रवर्तक अपना वर्चस्व त्यागना नहीं चाहते। अगर यह रुझान बना रहा तो दिवालिया कानून मजाक बन जाएगा। 
 
राजकोषीय निगरानी परिषद का गठन: राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन समिति के राजकोषीय निगरानी समिति गठन के प्रस्ताव पर विचार करना श्रेयस्कर होगा। ताकि किसी भी वर्ष सरकार की राजकोषीय घोषणओं की निगरानी कर विश्लेषण किया जा सके। अमेरिका में सन 1975 से ही कांग्रेस का बजट कार्यालय बजट और आर्थिक मसलों का स्वतंत्र विश्लेषण करता आया है। यह नीतिगत अनुशंसाएं नहीं करता लेकिन इसकी रिपोर्ट में समुचित विश्लेषण रहता है। घाटे के आंकड़े और सरकारी उधारी से पूरी तस्वीर नहीं नजर आती। आधिकारिक सरकारी उधारी के अलावा सरकारी एजेंसियां मसलन नाबार्ड, एफसीआई, पॉवर फाइनैंस कॉर्पोरेशन, रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण आदि ने सरकार के समर्थन से निरंतर ऋण लिया है। ऐसी राशि लाखों करोड़ रुपये में है। आरबीआई बीते दो साल से सरकार को अंतरिम लाभांश का भुगतान भी कर रही है। पारदर्शिता के लिए हमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के तर्ज पर राजकोषीय निगरानी करनी होगी। 
 
आरबीआई की स्वायत्तता: शक्तिकांत दास के गवर्नर पद संभालने के पहले आरबीआई की बीती कुछ बोर्ड बैठकों से केंद्रीय बैंक के कामकाज का बहुत अच्छा चित्रण नहीं हुआ। जवाबदेही भी स्वायत्तता के साथ आती है। क्या सभी निदेशक बैंकिंग में विशेषज्ञ हैं? क्या ऐसे निदेशक भी हो सकते हैं जिनकी कंपनियां हों और उनके हितों में टकराव हो? व्यापक प्रबंधन वाला आरबीआई अच्छा है बशर्ते कि उसमें सक्षम पूर्णकालिक निदेशक हों। ऐसा करने की तत्काल आवश्यकता है। 
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