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वितरक चाहे सुनाए डेट फंड का गाना मगर उसके झांसे में न आना

तिनेश भसीन /  June 02, 2019

पिछले कुछ समय से निवेशकों ने डेट फंड से मुंह मोड़ लिया है, जिसे देखकर वितरक ये फंड बेचने के लिए नई बातें गढऩे लगे हैं। ग्राहक पटाने के लिए वे कह रहे हैं कि भुगतान में चूक यानी डिफॉल्ट की वजह से फंड पर चोट क्यों न पड़ जाए, अगर निवेश लंबे समय के लिए इनमें निवेश करता है तो उसे बैंकों की सावधि जमा (एफडी) की तुलना में बेहतर प्रतिफल मिलता है। यह बात कुछ मामलों में तो सही साबित हो सकती है और वितरक का गुणा-भाग देखकर आपको उसकी बात पर यकीन भी हो सकता है, लेकिन प्रतिफल काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि पोर्टफोलियो में शामिल कितने फीसदी शेयरों पर डिफॉल्ट की मार पड़ी है।

 
क्या है वितरकों की दलील
 
वितरक समझाते हैं कि जो फंड 7.5 से 8 फीसदी का प्रतिफल दे रहा है, अगर उसके पोर्टफोलियो के 2.5 से 5 फीसदी हिस्से पर डिफॉल्ट का असर हो रहा है तो भी आयकर की सबसे ऊंची श्रेणी में आने वाले निवेशक को कर चुकाने के बाद 5.7 फीसदी या उससे अधिक प्रतिफल मिल जाएगा। यदि किसी एफडी पर 7 फीसदी प्रतिफल मिलता है तो कर के बाद कुल प्रतिफल 4.9 फीसदी ही रहेगा। इसे ऐसे व्यक्ति के उदाहरण से समझते हैं, जिसने डेट फंड में 1 लाख रुपये तीन साल के लिए लगाए हैं। यदि 7.5 फीसदी सालाना रिटर्न मिलता है तो उसे तीन साल पूरे होने पर कर चुकाने से पहले कुल 1,24,230 रुपये मिलेंगे। मान लीजिए कि निवेश के दौरान फंड को डिफॉल्ट की चपत झेलनी पड़ती है और उसके पोर्टफोलियो का 5 फीसदी हिस्सा साफ हो जाता है। तब निवेशक के पास 1,18,018 रुपये ही आएंगे। इंडेक्सेशन लाभ लेने और कर चुकाने के बाद कुल 1,16,499 रुपये उसके हाथ लगेंगे। यदि उस निवेशक ने इसी रकम को एफडी में डाल दिया होता तो उसे 1,15,483 रुपये मिलते। यदि कर से पहले उसका प्रतिफल 7.5 फीसदी से ऊपर होता तो कर के उपरांत भी उसका प्रतिफल ज्यादा ही होता।
 
मान लीजिए कि उस निवेशक के इसी निवेश पर पोर्टफोलियो का करीब 6 फीसदी हिस्सा डिफॉल्ट के कारण खत्म हो जाता तो कर के उपरांत उसे मिलने वाला प्रतिफल एफडी के प्रतिफल से कम हो जाता। पॉजिटिव वाइब्स कंसल्टिंग ऐंड एडवाइजरी में पार्टनर एवं सलाहकार मल्हार मजूमदार समझाते हैं, 'वितरकों की यह दलील उन फंड पर तो काम कर जाएगी, जिनके पोर्टफोलियो में अच्छी खासी विविधता है। लेकिन क्रेडिट जोखिम वाली सभी योजनाओं पर यह बात काम नहीं करती। पोर्टफोलियो में किसी एक शेयर या कंपनी की हिस्सेदारी 2.5 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए और समूह के स्तर पर भी निवेश 10 फीसदी से अधिक नहीं रहना चाहिए। ऐसी सूरत में तीन साल के भीतर दोनों के ही डिफॉल्ट करने की आशंका कम रहती है।'
 
मजूमदार इसकी बारीकियां भी समझाते हैं। वह बताते हैं कि डिफॉल्ट की सूरत में यानी भुगतान नहीं होने पर पूरे पोर्टफोलियो को बट्टïे खाते में नहीं डाला जाता। चूंकि कर्ज के बदले कुछ न कुछ रेहन रखा जाता है, इसलिए फंड के पास भी कुछ राशि वसूलने का मौका होता है। पिछले कुछ समय में जो भी कंपनियां भुगतान करने से चूक गई हैं, वे जानबूझकर डिफॉल्ट करने वाली नहीं हैं। वे हिस्सेदारी बेचकर या किसी अन्य तरीके से रकम जुटाने की कोशिश करती आ रही हैं ताकि कर्ज देने वालों को उनकी रकम लौटा सकें। हालांकि यह बात भी सच है कि डिफॉल्ट के हालिया मामलों में कई ऐसे फंड थे, जिन्होंने डिफॉल्ट करने वाली कंपनी और उनके समूह में थोड़ा-बहुत नहीं बल्कि अपने पोर्टफोलियो का 25 फीसदी तक निवेश कर रखा था। आम निवेशक के पास यह जानने का कोई जरिया ही नहीं होता कि इस पूरे मामले का नतीजा क्या होगा। मजूमदार कहते हैं, 'डेट फंड में निवेश करना है तो किसी निवेश सलाहकार की राय लेना हमेशा अच्छा रहता है।'
 
निवेश सलाहकार भी इस मामले में सतर्कता बरतने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि कई बार प्रतिफल के ये आंकड़े कागजों पर ही अच्छे लगते हैं। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार और पर्सनलफाइनैंसप्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'डेट फंड में जो धन लगा होता है, उसमें से ज्यादातर कंपनियों का होता है। ऐसी सूरत में अगर डिफॉल्ट होता है तो सबसे पहले कंपनियां ही अपना निवेश लेकर निकल जाती हैं। उस परिस्थिति में वह फंड ऐसे ऋणपत्र बेचता है, जो सबसे ज्यादा तरल होते हैं। अंत में डिफॉल्ट की चोट उन निवेशकों को ही झेलनी पड़ती है, जो हालात से अनभिज्ञ होने के कारण फंड में फंसे रह जाते हैं।' वह एक और मार्के की बात बताते हैं। उनका कहना है कि अगर फंड तरलता वाले यानी फौरन नकदी दिलाने वाले ऋणपत्र बेच देता है तो उसके कुल पोर्टफोलियो में ऐसी कंपनियों के ऋणपत्रों की हिस्सेदारी बढ़ती जाती है, जिन्होंने भुगतान में चूक की है यानी जो डिफॉल्टर हो गई हैं।
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