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खजाने की मजबूती का लक्ष्य मगर प्रोत्साहन की गुंजाइश

जयदीप घोष /  June 02, 2019

दोबारा निर्वाचित होकर आई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के सामने चुनौतियां स्पष्ट हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्ती की आहट के बीच यह चर्चा जोर पकडऩे लगी है कि क्या इसे प्रोत्साहन पैकेज दिए जाने की जरूरत है? हालांकि यहां पर संसाधनों का सवाल भी खड़ा होता है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य आशिमा गोयल का कहना है कि सरकारी व्यय बढऩे से कुछ राहत मिल सकती है। उनसे जयदीप घोष ने इन मुद्दों पर बात की। पेश हैं संपादित अंश:

 
पिछले कुछ महीनों में अर्थव्यवस्था में सुस्ती आने को लेकर काफी चर्चाएं हुई हैं। क्या आप इस आकलन से सहमत हैं? 
 
हां, मैं इससे सहमत हूं। वर्ष 2017 के अंत में निवेश की हालत सुधरी थी लेकिन अब इसमें गिरावट आना खास तौर पर चिंताजनक है। नीति-निर्माताओं को यह लग सकता है कि चुनाव संबंधी अनिश्चितता का माहौल खत्म होने के बाद अब निजी निवेश में तेजी आएगी और विदेशी धन की आवक भी बढ़ेगी। लेकिन निजी निवेश वर्ष 2011 से ही स्थिर हालत में है। पिछले चुनाव के बाद आंशिक सुधार आया था लेकिन उच्च वास्तविक ब्याज दरों और परिसंपत्ति गुणवत्ता की समीक्षा ने कंपनियों को दिए जाने वाले बैंक कर्ज को नकारात्मक कर दिया और नई जान नहीं फूंकी जा सकी। इस बार कुछ इसी तरह की गतिविधि नहीं होनी चाहिए। तेजी से उठाए गए कदम ऐसी आशंका को रोक सकते हैं।
 
एफएमसीजी एवं ऑटो क्षेत्र की कंपनियों, खासकर दोपहिया निर्माताओं में मंदी के लक्षण दिख रहे हैं। आपकी राय में इस समस्या के क्या कारण हैं?
 
नवीनतम आंकड़े दिखाते हैं कि निजी निवेश एवं टिकाऊ वस्तुओं के उपभोग में गिरावट आई है क्योंकि वास्तविक ब्याज दरें बढ़ी हैं और तरलता की स्थिति भी डांवाडोल है। सार्वजनिक बैंकों की ऋण वृद्धि में सुस्ती आने से गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) का दखल बढ़ा। लेकिन सितंबर 2018 के बाद एनबीएफसी की ऋण वृद्धि में शिथिलता आई है। बैंक ऋण आवंटन सुधरा है लेकिन आरबीआई की तरफ से प्रक्रिया को सरल बनाने के बावजूद अब बैंक एनबीएफसी का दोबारा वित्तपोषण नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि वे ऋण जोखिम को लेकर भयभीत हैं और उन्हें इसके लिए वित्तीय प्रावधान भी करना होता है। वैश्विक सुस्ती एवं व्यापार युद्ध जैसे बाहरी झटके भी लग रहे हैं। आम तौर पर चुनावों के दौरान का बढ़ा हुआ खर्च उपभोग बढ़ाता है लेकिन लंबे चुनावी मौसम में सरकारी व्यय घटने से इस बार ऐसा नहीं हुआ है।
 
भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन पैकेज की जरूरत होने को लेकर काफी बातें की जा रही हैं। क्या आप इससे सहमत हैं? अगर ऐसा होता भी है तो उसका स्वरूप क्या हो?
 
एक चक्रीय सुस्ती को स्थिरता देने के लिए मानक नीतिगत उपाय चक्रीय-रोधी राजकोषीय-मौद्रिक प्रोत्साहन देना है। मौद्रिक नीति में ब्याज दरों की कटौती की पर्याप्त गुंजाइश होने के साथ ही प्रमुख मुद्रास्फीति के लक्षित दायरे में होने और वृद्धि में सुस्ती आने से टिकाऊ तरलता का प्रावधान बढ़ाने की भी संभावना है। भले ही सरकार राजकोषीय सशक्तीकरण की दिशा में अग्रसर है लेकिन राजकोषीय प्रोत्साहन की गुंजाइश कम ही नजर आती है। चुनाव से पहले की सरकारी व्यय में शिथिलता को पलटा जा सकता है और इस साल के लिए निर्धारित व्यय में उसे जोड़ा जा सकता है। वर्ष 2014 में सरकार को एक कमजोर वृहद-आर्थिक पर्यावरण विरासत में मिला था जिसमें दोहरे घाटे के चलते निकासी का खतरा था और मुद्रास्फीति भी काफी अधिक थी। इसके प्रतिक्रिया स्वरूप मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियां काफी सख्त कर दी गईं। वृहद-आर्थिक पैमाने अब स्थिर हैं लिहाजा अधिक संतुलित नीतियों की गुंजाइश है।
 
एनबीएफसी संकट को दूर करने के लिए किन -किन कदमों की जरूरत है?
 
एनबीएफसी में जारी तनाव के चलते अल्पावधि में तत्काल कदम उठाना जरूरी है। वहीं दीर्घावधि में नियमों को सशक्त किया जा सकता है। आरबीआई कर्ज जोखिम की वजह से एनबीएफसी को विशेष तरलता सुविधा नहीं देना चाहता है। उसका मानना है कि कमजोर एनबीएफसी को कारोबार से निकल जाने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि उन्हें बचाने के चक्कर में नैतिक समस्याएं खड़ी होंगी। लेकिन वृद्धि में सुस्ती आने से व्यवस्थागत जोखिम कायम रहने का पता चलता है। अभी तक उठाए गए कदम नाकाफी साबित हुए हैं। अपेक्षाकृत मजबूत एनबीएफसी भी मौजूदा समय में कर्ज देने के बजाय अपनी तरलता बनाए रखने को वरीयता दे रहे हैं। अगर आरबीआई कोई अंशकालिक तरलता सुविधा देता है तो भले ही उसका अधिक इस्तेमाल न हो लेकिन उससे तरलता की कमी का डर गायब हो जाएगा जो एनबीएफसी को फिर से कर्ज बांटने के लिए प्रोत्साहित करेगा। दीर्घावधि में परिसंपत्ति-दायित्व असंतुलन दूर करना होगा। एक ही सरकार के फिर से सत्ता में आने से उन सुधारों को भी जल्दी से लागू किया जा सकता है जिनका खाका पहले से तैयार है। इससे निजी गतिविधियों में भी तेजी आएगी।
 
फिलहाल सरकार के वित्त की हालत पतली है। ऐसे में अगर प्रोत्साहन देने पर सहमति बनती भी है तो उसके लिए संसाधन कहां से आएंगे?
 
जीएसटी को सरल बनाने पर ध्यान देना होगा लेकिन इसके एवं संभावित कर कटौतियों के बावजूद जीएसटी से प्राप्त राजस्व बढऩे की ही संभावना है। गत पांच वर्षों में लागू की गईं कुछ सरकारी योजनाएं अब पूरी होने के कगार पर हैं जिसके बाद नई योजनाओं के लिए धन उपलब्ध हो सकेगा। निजीकरण की लंबित योजनाओं पर भी तेजी से काम किया जा सकता है क्योंकि चुनाव के बाद बाजार में जान आई है और विदेशी पोर्टफोलियो प्रवाह भी हो रहा है।
 
आर्थिक वृद्धि में नई जान डालने के लिए सरकार के सामने और क्या विकल्प हैं?
 
सरकार को अपना घोषणापत्र लागू करने के लिए नए जोशोखरोस के साथ काम करना होगा। इस घोषणापत्र में आपूर्ति की हालत सुधारने, लागत में कमी लाने, जीवन जीने एवं कारोबार करने को अधिक सुगम बनाने के साथ ही संकट में फंसे क्षेत्रों को राहत देने की बात कही गई है। क्षमता, ताकत एवं जोखिम उठाने की काबिलियत में सुधार करने पर जोर है। इससे अधिक विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सकेगा क्योंकि चीन फिलहाल व्यापार युद्ध में फंसा हुआ है। कम आय वाले लोगों को भी आवास मुहैया कराने और अन्य ढांचागत परियोजनाओं पर व्यय से अधिक रोजगार अवसर पैदा होंगे। ऐसे मदों में व्यय वैश्विक सुस्ती के दौरान काफी मददगार साबित होगा।
Keyword: india, economy, NDA, BJP, narendra modi,,
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