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मोदीजी, अबकी बारसूटबूट की सरकार

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  June 02, 2019

जुलाई 2014 में राहुल गांधी के एक बेतुके से वाक्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पूरी तरह हिलाकर रख दिया था। गांधी ने कहा था कि मोदी सरकार सूटबूट की सरकार है और वह अमीरों की सरकार है जो केवल अमीरों के हित में काम करती है। अगले पांच वर्ष तक प्रधानमंत्री यह सुनिश्चित करने में लगे रहे कि उनकी सरकार, अमीरों की सरकार न नजर आए।  परंतु अब मोदी ने भारतीय जनता पार्टी को एक शानदार जीत दिलाई है और वह देश के निर्विवाद नेता के रूप में उभरे हैं। परंतु एक चुनौती अब भी उनके सामने है: उन्हें अपने मस्तिष्क से वाम रुझान का दबाव निकालना होगा। 

 
यह दुखद है और जिस प्रकार उन्होंने कांग्रेस की छद्म धर्मनिरपेक्षता को उजागर किया वैसे ही अब उन्हें उसके छद्म समाजवाद को उघारना चाहिए, जिसने उन्हें भी प्रभावित किया है। उन्हें खुद को इस धारणा से मुक्त करना होगा कि सरकार को पूंजी का समर्थन करते हुए नहीं नजर आना चाहिए।  हर कोई जानता है कि भारत को गरीबी हटाने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है। अब तक तो हम यह भी जान गए हैं कि निजी निवेश के माध्यम से ही ऐसा करना संभव है क्योंकि पूंजी की कमी से जूझ रहे देश में चंद धोखेबाजों को छोड़ दें तो आज भी निजी क्षेत्र पूंजी का कहीं अधिक किफायती इस्तेमाल करता है। 
 
यह भी एक बड़ी वजह है कि अगर वह गरीबों की मदद करना चाहते हैं और उसका श्रेय भी चाहते हैं तो उन्हें चीन की तरह खुलकर पूंजी समर्थक नीतियों को अपनाना होगा। उन्हें यह भी याद रखना होगा कि पूंजी समर्थक होने का मतलब पूंजीवाद समर्थक होना नहीं है। वह कांग्रेस का तरीका था जहां सरकारी निवेश के पक्ष में निजी पूंजी को नकारा गया और सरकारी क्षेत्र पर तरजीह देकर मनोनुकूल निजी पूंजीपतियों को बढ़ावा दिया गया।
 
क्या किया जाना चाहिए
 
विश्व का आर्थिक इतिहास बताता है कि जिन सरकारों ने निजी पूंजी का सहयोग किया उनकी वृद्घि दर बेहतर रही। इस तरह देखें तो ऐसे कानूनों की आवश्यकता है जो पूंजी में भेद नहीं करते, उन्हें व्यापक और गहरा बनाने की दृष्टि से भी यह अनिवार्य हैं। चीन ने ऐसा ही किया है।  सन 1970 से ही भारत इस दिशा में विफल रहा है। उसके पहले हमें इसमें काफी सफलता मिलती रही है। सन 1970 के बाद नीतिगत ध्यान राजनीति प्रेरित और वाम प्रेरित पुनर्वितरण नीतियों की ओर हो गया। इसकी कीमत निवेश और वृद्घि के मोर्चे पर चुकानी पड़ी। ईशर आहलूवालिया की सन 1983 में आई किताब इसे सही तरीके से परिभाषित करती है। 
 
मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में इसे नहीं समाप्त किया क्योंकि वह दोबारा चुनाव जीतना चाहते थे। वह नहीं चाहते थे कि उनके साथ वह दोहराया जाए जो अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हुआ।  अब जबकि दोबारा उनकी सरकार बन चुकी है, उन्हें देश को दोबारा नेहरू की तरह निवेश बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। नेहरू को सरकारी नेतृत्व वाले निवेश का रुख इसलिए करना पड़ा क्योंकि निजी क्षेत्र ने अपने हाथ खड़े कर दिए थे। परंतु अब वैसी कोई बात नहीं है और मोदी को इस दिशा में आगे बढऩा चाहिए। 
 
यह नेहरूवादी मॉडल से उचित प्रस्थान होगा। तमाम नीतियां, कर, आयात, ब्याज दर और विनिमय दर आदि को निजी क्षेत्र के अनुकूल बनाया जाना चाहिए। सरकारी क्षेत्र की भूमिका सीमित होनी चाहिए। यह एक अभिशाप की तरह है। ऐसा नहीं है कि सार्वजनिक निवेश नहीं होना चाहिए। होना चाहिए लेकिन उसे परिवहन और सामाजिक बुनियादी क्षमताएं विकसित करने तक सीमित रखा जाना चाहिए, चीन की तरह। यहां तक कि बिजली क्षेत्र, जिसे कांग्रेस अधोसंरचना क्षेत्र मानती रही है, उसका भी निजीकरण किए जाने की आवश्यकता है। यह राज्य सरकारों के राजकोष पर बोझ बन चुका है। एक बार फिर ठीक चीन के तर्ज पर हमें सरकारी जमीन को बड़े निजी कारोबारियों को बेचना चाहिए ताकि वे वहां कार्यालय और आवास बना सकें। यह ऐसा क्षेत्र है जिसकी मांग हमेशा बनी रहती है। यह निवेश में कई गुना इजाफा करने वाली बात होगी। 
 
साहब, दाएं मुडि़ए
 
लब्बोलुआब यह कि मोदी को अब कांग्रेस का अनुकरण करना बंद कर देना चाहिए। अब बहुत हो गया। उन्हें उस मॉडल से निजात पाकर निजी पूंजी का समर्थन करना चाहिए।  वह भारी बहुमत से जीतकर पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि आरएसएस के साथ रिश्ते में वह भारी रहेंगे। आरएसएस भी उतना ही यथास्थितिवादी है जितने कि कांग्रेस और माकपा। अब उन्हें भारत को सही मायने में निजी उद्यमों के नेतृत्व वाली अर्थव्यवस्था बनाना चाहिए। वर्ष 2014 में उन्होंने विकास को अपने प्रचार का केंद्र बनाया था लेकिन वह समाजवादी विचार से बाहर नहीं निकल पाए। उन्होंने पूंजी का निहायत गैर किफायती इस्तेमाल किया। 2019 के आम चुनाव में उन्होंने राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाया।
 
अगर इस बार भी वह रोजगार और काम के मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रहे तो 2024 का चुनाव किस मुद्दे पर लड़ेंगे। वह मतदाताओं को दोबार बेवकूफ नहीं बना सकते। ऐसे में उन्हें निजी क्षेत्र का समुचित इस्तेमाल करना होगा। उनके पास यह कौशल है कि वे अपने विचारों का क्रियान्वयन करवा पाएं। एक बार अगर उन्होंने ऐसा करने का मन बना लिया तो बाकी सब हो जाएगा। मुझे यकीन है कि सैम पित्रोदा यह कहते हुए उनकी सहायता करके प्रसन्न होंगे, किया तो किया। 
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