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पितृ सत्तात्मक दल की स्वनिर्मित नेत्री

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  June 02, 2019

राष्ट्रपति भवन में जब सुषमा स्वराज नए मंत्रियों के लिए नियत स्थान के बजाय अग्रिम पंक्ति में अन्य गण्यमान्य अतिथियों के साथ बैठीं तो वहां एक किस्म की खामोशी के साथ-साथ फुसफुसाहट भी चल रही थी। उनके प्रशंसकों को अब भी लग रहा था कि नरेंद्र मोदी अपना दूसरा कार्यकाल अपनी इस सर्वाधिक लोकप्रिय मंत्री के बिना शुरू नहीं कर सकते। उनकी स्वास्थ्यगत चुनौतियां किसी से छिपी नहीं हैं। अपने गुर्दा प्रत्यारोपण की खबर ट्विटर पर जारी करके उन्होंने भारतीय सार्वजनिक जीवन की एक वर्जना को ही तोड़ा। शल्य चिकित्सा के बाद उन्होंने अच्छी तरह स्वास्थ्यलाभ भी लिया। उनका प्रतिरक्षा तंत्र अभी नए गुर्दे को अपना ही रहा था और इसी बीच उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान को जवाब दिया, दुनिया भर के समकक्ष विदेश मंत्रियों के साथ चर्चा की और असाधारण शालीनता का परिचय दिया। उन्होंने एक बार भी जुबानी कमजोरी का परिचय नहीं दिया, न ही किसी पर क्रोध करती हुई दिखीं।

 
इसे अपना हथियार बनाकर उन्होंने एकदम नए किस्म की कूटनीति तैयार की और दुनिया भर के नेताओं तक पहुंच बनाई। उनके प्रतिद्वंद्वियों और शंकालु स्वभाव के लोगों ने कहा कि पूरी विदेश नीति तो मोदी चला रहे हैं, ऐसे में उनके पास ट्विटर पर पासपोर्ट-वीजा-आव्रजन के मामले निपटाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं रहा। कई बार उन्हें केवल विदेशों में रह रहे भारतीयों का मददगार बनाकर पेश किया गया लेकिन उन्होंने इसका भी बुरा नहीं माना। मोदी मंत्रिमंडल में किसी भी मंत्री के लिए कुछ खास करने को नहीं था। सुषमा के लिए मामला वाकई कठिन था क्योंकि वैश्विक स्तर पर प्रधानमंत्री के ही चर्चे अधिक थे। सुषमा ने उनका मार्ग प्रशस्त किया। परंतु उनके आकर्षण और मीडिया में उनकी प्रशंसा कतई कम नहीं हुई। उनके पास वह नजर है जो दीवार पर लिखी इबारत पढ़ लेती है। उन्होंने खुद को एक दायरे में रखा और मोदी के बारे में तारीफ के सिवा कभी एक शब्द नहीं कहा।
 
हम दोनों ने अपने-अपने करियर की शुरुआत सन 1977 में चंडीगढ़ से की। वह 25 वर्ष की उम्र में देवी लाल की जनता पार्टी सरकार में सबसे कम उम्र की मंत्री बनीं और मैं इंडियन एक्सप्रेस में सिटी रिपोर्टर बना। मुझे पता है कि उनमें धैर्य और आत्मसम्मान अन्य नेताओं से अधिक है। मैं अब भी समझ नहीं पा रहा हूं कि 42 वर्ष की अपनी राजनीति में उन्होंने इस नई भूमिका को कैसे अंगीकार किया होगा जहां अपनी पार्टी की सरकार के तीसरे शपथग्रहण में वह एक आगंतुक के रूप में पहुंचीं। खासतौर पर तब जबकि उनके उत्तराधिकारी एस जयशंकर बने। जयशंकर उनके कार्यकाल में 2015 से 2018 तक विदेश सचिव और उसके पहले अमेरिका में राजदूत थे। उन्होंने इसे दार्शनिक अंदाज में लिया होगा। वह यह भी जानती हैं कि यह उनके राजनीतिक सफर का मोड़ नहीं बल्कि उपसंहार है।
 
वह अंबाला के एक आरएसएस से जुड़े परिवार में पैदा हुईं। उनके पिता आरएसएस के प्रमुख पदाधिकारी थे लेकिन उनकी पहचान बनी जॉर्ज फर्नांडिस की युवा और तेजतर्रार वकील के रूप में। उन्होंने आपातकाल के दौरान बड़ौदा डायनामाइट कांड में जॉर्ज का मुकदमा लड़ा। फर्नांडिस की तरह सुषमा के साथी अधिवक्ता स्वराज कौशल भी समाजवादी थे। आपातकाल के विरोध के दौर में ही दोनों ने विवाह कर लिया। कुछ समय वह अपने जीवनसाथी के वैचारिक प्रभाव में भी रहीं लेकिन उनकी मूलभूत मान्यताएं तो आरएसएस की ही थीं। उनके समाजवादियों के साथ मेलजोल से एक भ्रम सा बना। सन 1977 में आपातकाल समाप्त हुआ और इंदिरा गांधी की कांग्रेस का पतन हुआ। तब वह 25 वर्ष की उम्र में हरियाणा की श्रम और रोजगार मंत्री बनीं। उन्हें जनता पार्टी का उभरता हुआ सितारा और फर्नांडिस का सहयोगी माना जा रहा था, न कि आरएसएस या जनसंघ का।
 
सन 1970 के दशक में एक महिला का महज 27 की उम्र में हरियाणा में जनता पार्टी का अध्यक्ष बन जाना मामूली बात नहीं थी। परंतु सन 1979 में जनता पार्टी के विभाजन के बाद वह जनसंघ की ओर मुड़ गईं। उसके बाद उनका अद्भुत विकास हुआ। उन्होंने हमें यह यकीन दिलाने का प्रयास किया कि वह भाजपा की पारंपरिकता में यकीन करती हैं। उन्होंने अजंता की नृत्यरत अप्सरा को राष्ट्रीय कैलेंडर से बाहर कराने से लेकर एफटीवी पर प्रतिबंध लगाया, कंडोम के विज्ञापनों पर अश्लीलता के आरोप के चलते प्रतिबंध लगाया, स्टूडेंट ऑफ द इयर फिल्म में सेक्सी राधा गाने का विरोध किया और दीपा मेहता की फिल्म फायर में राधा और सीता नामक समलैंगिक किरदार निभाने वाली शबाना आजमी और नंदिता दास के प्रणय दृश्यों पर एतराज किया। हाल ही में सरोगेसी को लेकर अपने विचार और बलात्कार पीडि़ता को जिंदा लाश कहकर उन्होंने अपना नजरिया पेश किया। परंतु ये बातें उन्हें रूढि़वादी भाजपाई नहीं बनातीं।
 
उनके जीवन के अनेक ऐसे पहलू हैं जो बताते हैं कि वह अलग हैं। उन्होंने एक मध्यवर्गीय जीवन जिया और अपनी जिंदगी के फैसले लिए। उस वक्त ऐसा ज्यादा लोग नहीं करते थे। उन्होंने अपनी पार्टी की उन सीमाओं को भी तोड़ा जो पितृसत्ता से पीढिय़ों से थोपी थी। इसमें पार्टी की पुरुष प्रधान पितृ संस्था का भी योगदान रहा। मंगलूरु में जब हिंदुत्व का रूढि़वादी चेहरा समाने आया और अनैतिकता का आरोप लगाते हुए युवतियों को बार से घसीट बाहर किया गया तब उन्होंने चयन की आजादी की बात की और बतौर एक युवती की मां होने के आधुनिक स्वतंत्र स्त्रियों की सुरक्षा की बात कही। उनकी पार्टी में कुछ लोग नाराज हुए लेकिन उन्होंने अपने लगातार बढ़ते प्रशंसकों को जता दिया था कि वह अलग हैं। उन्होंने इस वर्ष लोकसभा चुनाव न लडऩे की घोषणा करके ही यह बता दिया था कि वह सत्ता से अलग रहना चाहती हैं। वह कुल 11 बार विधानसभा और संसद के चुनाव लड़ चुकी हैं और उनकी उम्र महज 66 वर्ष है। परंतु बहुत कम उम्र में मधुमेह होने के चलते स्वास्थ्य उनके सामने चुनौती बन गया है। उनकी यह विदाई सुनियोजित और गरिमापूर्ण है। मेरा मानना केवल यह है कि उन्हें थोड़ा और पहले एक वक्तव्य जारी करके इसकी औपचारिक सूचना देनी थी कि वह नए मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होंगी।
 
उनके विरोधी भी मानेंगे कि उनका करियर एक विजेता का रहा है और वह हमेशा अपने दल की वफादार रही हैं। वह आडवाणी की समर्थक थीं लेकिन 2009 के बाद जब वह नई पीढ़ी के लिए रास्ता खाली करने को तैयार नहीं थे तब वह वेंकैया नायडू, अनंत कुमार और अरुण जेटली के साथ उन चार प्रमुख नेताओं में थीं जिन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से हस्तक्षेप कर युवा पार्टी अध्यक्ष चुनने को कहा। तब नितिन गडकरी अध्यक्ष बने। जेटली के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता जाहिर है लेकिन पार्टी के लिए वे साथ आए। बीते पांच वर्ष के दौरान भी ऐसे अवसर आए जब उन्हें लगा कि उनकी अनेदखी हुई या पीएमओ ने उनको दरकिनार किया लेकिन उनकी महत्ता तो इसी बात से जाहिर होती है कि जब मोदी विदेश यात्रा पर थे और उनके नंबर दो राजनाथ सिंह चीन की यात्रा पर, तब मोदी ने जेटली पर सुषमा स्वराज को तरजीह दी और कहा कि वह दुबई की यात्रा रद्द कर दिल्ली में बनी रहें। यह उनकी वफादारी और उनकी निर्णय क्षमता पर मोदी के भरोसे की स्वीकारोक्ति थी। यह उनके राजनीतिक जीवन का शिखर भी था। आप इस बात पर बहस कर सकते हैं कि अगर भाजपा या आरएसएस ने आडवाणी के पश्चात उन्हें भाजपा का युवा नेतृत्वकर्ता चुना होता तो क्या होता? आखिरकार वह मोदी से युवा हैं। तब भाजपा कैसी होती? शायद तब पार्टी वैचारिक तौर पर इतनी रूढि़वादी नहीं होती जितनी कि वह अभी है लेकिन वह शायद इतनी एकजुट भी नहीं होती।
 
यह अकादमिक लेकिन बेहतर चर्चा है। क्रिकेट की तरह राजनीति में भी हर सितारे का करियर कपिल देव सचिन तेंडुलकर जैसा नहीं हो सकता। किसी न किसी को राहुल द्रविड़ की भूमिका भी निभानी पड़ती है। जो भरोसेमंद तो होता है लेकिन उसे वह प्रसिद्धि और ताकत नहीं मिलती। सुषमा स्वराज को इसी प्रकार परिभाषित किया जा सकता है।
Keyword: parliament, sushma swaraj,,
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