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ढांचागत निवेश में जादुई ताकत लाने की क्षमता

विनायक चटर्जी /  May 30, 2019

ढांचागत परियोजनाओं में निवेश के लिए निजी पूंजी को दोबारा प्रोत्साहित करना मौजूदा वक्त की जरूरत है। ढांचागत निवेश परिदृश्य का विश्लेषण कर रहे हैं विनायक चटर्जी

 
किसी भी नई सरकार की ढांचागत क्षेत्र के लिए क्या नीति होनी चाहिए? फासला कहां पर है? और इस फासले को दूर करने के लिए किन सुधारों की जरूरत है? आज के समय में ये सवाल काफी अहम हैं। ढांचागत क्षेत्र में निवेश वर्ष 2007 और 2012 के बीच सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब सात फीसदी बढ़ा जबकि उससे पहले के पांच वर्षों में पांच फीसदी वृद्धि हुई थी। ढांचागत निवेश में आई इस उछाल की प्रमुख वजह निजी क्षेत्र की भूमिका थी। पांच साल पहले की अवधि के मुकाबले ढांचागत निवेश में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 15 फीसदी तक बढ़ गई।
 
लेकिन अगर पीछे की तरफ नजर डालें तो एक गंभीर मसले के चलते वह वृद्धि टिकाऊ नहीं थी। वह ढांचागत 'बूम' बड़ी नीतिगत एवं संरचनात्मक खामियों के बावजूद आया था। इस वजह से ऐसी वृद्धि का धीरे-धीरे लुप्त होना अपरिहार्य था। भूमि अधिग्रहण में मुश्किल होने, जोखिम आवंटन बढऩे, विभिन्न एजेंसियों से अनगिनत अनापत्तियां लेने और ढांचागत परियोजनाओं में वाणिज्यिक बैंकों की प्रभावी भूमिका होने से लेकर ईंधन एवं वितरण संबंधी अड़चनें तक ऐसी कमजोरियां रहीं जिनसे पार पाना मुश्किल था।
 
इस तरह वर्ष 2013 के बाद जीडीपी प्रतिशत के तौर पर ढांचागत निवेश की हिस्सेदारी खिसकते हुए केवल पांच फीसदी ही रह गई। ढांचागत निवेश में निजी क्षेत्र का अंशदान वर्ष 2013-18 के बीच 48 फीसदी रहने का आकलन किया गया था लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र ने इस कमी की भरपाई की है। आगे चलें तो मौजूदा राजकोषीय स्थिति देखते हुए इसकी काफी कम गुंजाइश नजर आती है। दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों ने अगले पांच वर्षों में ढांचागत क्षेत्र में काफी खर्च करने की बात कही है। भाजपा ने वर्ष 2024 तक एक लाख करोड़ रुपये का निवेश करने का वादा किया है। अगर आर्थिक वृद्धि को रफ्तार देने वाले ऐसे महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करना है तो निजी क्षेत्र को फिर से बड़ी भूमिका निभानी होगी। और इसका मतलब है कि पहले निजी क्षेत्र को पीछे हटने के लिए मजबूर करने वाली संरचनात्मक कमजोरियों को दूर करना होगा। 
 
संयोग से किसी भी नई सरकार को फिर से कमजोरियों की पहचान या नए समाधान तलाशने की जरूरत नहीं है। वर्ष 2015 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने ढांचागत क्षेत्र में सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी में नई जान फूंकने के लिए अध्ययन का काम विजय केलकर को सौंपा था। वर्ष 2015 में जारी उस रिपोर्ट में की गई कई सिफारिशें आज भी प्रासंगिक हैं। केलकर समिति ने परियोजना समीक्षा समिति (पीपीपी) बनाने के साथ ही ढांचागत पीपीपी निर्णयन अधिकरण (आईपीएटी) के गठन की भी सिफारिश की थी। ये दोनों निकाय मिलकर आर्थिक संदर्भ या हालत बदलने की स्थिति में किसी परियोजना की शर्तों में बदलाव की जरूरत पर गौर करेंगे। ऐसा होने पर कई परियोजनाओं को पेश आ रही अहम समस्या दूर की जा सकेगी। स्पष्ट संस्थागत प्रक्रियाओं का अभाव होने से अनुबंधों पर नए सिरे से विचार किया जा सकता है। ढांचागत क्षेत्र में यह समस्या खास रही है जहां रियायती समझौते 30 साल और उससे आगे भी जा सकते हैं और समझौते पर हस्ताक्षर के संदर्भ पहचान से परे तक बदल चुके हैं।
 
समिति ने यह साफ किया था कि ढांचागत क्षेत्र के लिए स्वतंत्र नियामक होना निहायत ही जरूरी है। रेलवे जैसे क्षेत्रों में यह एक खास गंभीर मुद्दा है। प्रïभावी सार्वजनिक इकाई भारतीय रेलवे रेल परिवहन का नियामक, डेवलपर एवं नीति-निर्माता तीनों ही है जिससे हितों के टकराव की गंभीर स्थिति बन जाती है। यह सड़कों के लिए भी उतना ही सही है। और नियामक की मौजूदगी वाले क्षेत्रों में भी 'स्वतंत्र' का तमगा अक्सर संदेह के घेरे में होता है। समिति ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में कुछ संशोधन करने का  भी प्रस्ताव रखा था ताकि फैसलों से जुड़ी असली वाणिज्यिक गलतियों के लिए अधिकारियों को दंडित न होना पड़े।
 
केलकर समिति ने अपनी सिफारिशों को महज विवाद निपटान और नियामकीय मुद्दों तक ही सीमित नहीं रखा था। उसने पीपीपी के मुख्य ढांचे पर भी गौर किया था। इस बारे में समिति की प्रमुख सलाह इस समझ की थी कि निजी क्षेत्र कुछ खास तरह के जोखिम तो खुद उठा सकते हैं लेकिन कुछ जोखिम वे नहीं ले सकते हैं। रियायती करारों में 'एक ही ढांचा सबके लिए मुफीद होता है' वाला मॉडल परियोजना-केंद्रित एवं क्षेत्र-केंद्रित संदर्भों का ध्यान नहीं रखता है। मसलन, एक परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण का कार्य ऐसा नहीं है जिसे कोई निजी कंपनी अपनी सामान्य कारोबारी गतिविधियों में अंजाम देती है लिहाजा संबंधित सरकार को ही यह जोखिम उठाना चाहिए। निविदा के दस्तावेजों में यह साफ तौर पर वर्णित होना चाहिए कि किस तरह के हालात में पारदर्शी एवं निष्पक्ष ढंग से पुनर्विचार होगा?
 
केलकर समिति की रिपोर्ट में ढांचागत परिदृश्य के एक और प्रमुख बिंदु को जगह दी गई थी। इंजीनियरिंग, खरीद एवं निर्माण (ईपीसी) ढांचे पर बनी कई परियोजनाएं असल में निर्माण के दौर से आगे बढ़ते हुए परिचालन एवं रखरखाव (ओऐंडएम) के दौर में आ चुकी हैं। ऐसे में उनकी तरफ से उपभोक्ताओं को दी जानी सेवाओं का सटीक एवं पारदर्शी होना निहायत ही जरूरी है। ऐसे ओऐंडएम अनुबंधों का प्रबंधन ऐसी गतिविधियों में अनुभव एवं दक्षता रखने वाली निजी कंपनियों के हवाले कर दिया जाना चाहिए। यह बात परिसंपत्ति-पुनर्चक्रीकरण नीति के तहत सरकारी स्वामित्व वाली इकाइयों में सरकार के पैसे लगाने की स्थिति में भी सही है।
 
समिति की रिपोर्ट आने के चार साल बाद यह साफ हो चुका है कि केलकर रिपोर्ट एक व्यावहारिक एवं बुनियाद खड़ा करने वाला दस्तावेज है। आज भी यह रिपोर्ट अगले कुछ वर्षों के लिए ढांचागत क्षेत्र में निवेश के भविष्य को लेकर एक साफ रोडमैप तैयार करती है। कुछ अन्य बिंदुओं को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। मसलन, बिना सोचे-समझे बोली लगाने से रोकना या एक मान्यता-प्राप्त ढांचे के रूप में स्विस चैलेंज की अनुमति देना या फिर 'प्लग ऐंड प्ले' जैसे अधिक अनुकूल माने जाने वाले पीपीपी ढांचे को बढ़ावा देने जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा। मौजूदा समय में नई सरकार के लिए पीपीपी-पुनर्जीवन प्रक्रिया लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है।
 
(लेखक ढांचागत सलाहकार फर्म फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं) 
Keyword: infrastructure, GDP, PPP, IPAT,,
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