बिजनेस स्टैंडर्ड - एनबीएफसी में अनुशासन
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एनबीएफसी में अनुशासन

संपादकीय /  May 30, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए लिक्विडिटी बफर (एक खास राशि संरक्षित रखना) का प्रस्ताव रखा है। ऐसा करने से उनकी ऋण देने की क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है लेकिन यह अल्पकालिक कष्टï इस क्षेत्र को अधिक जिम्मेदार बनाने के लिए जरूरी है। संकटग्रस्त सरकारी बैंकों के कारण उपजी दिक्कत की भरपाई करने में एनबीएफसी की अहम भूमिका रही है। नई तकनीक को सहजता से अपनाने के कारण इनका भौगोलिक दायरा भी तेजी से बढ़ा है। इसके परिणामस्वरूप कुल ऋण में एनबीएफसी की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2012 के 13 फीसदी से बढ़कर 2019 में 23 फीसदी हो गई। जबकि इस अवधि में सरकारी बैंकों के ऋण में भारी कमी आई। 

 
बहरहाल, बेतहाशा ऋण देने, अल्पकालिक ऋण के कारण परिसंपत्ति जवाबदेही में व्यापक अंतराल और लंबी अवधि की उधारी ने इस क्षेत्र में नकदी की भारी कमी पैदा कर दी। नियम कायदे सख्त होने से एनबीएफसी में नकदी प्रबंधन बेहतर होगा और यह उनको परिसंपत्ति-जवाबदेही के अंतर के संकट से बचाएगा। ऐसा संकट जो हमें आईएलऐंडएफएस मामले में देखने को मिला, खासतौर पर बैंकों और म्युचुअल फंड के मामले में। डेट म्युचुअल फंड की बात करें तो पुनर्भुगतान में देनदारी चूकने वालों की शुद्घ परिसंपत्ति मूल्य में भारी कमी आई है। 1.3 लाख करोड़ रुपये मूल्य के एनबीएफसी पेपर अगले कुछ महीनों में परिपक्व हो रहे हैं। ऐसे में म्युचुअल फंड इस क्षेत्र में अपना जोखिम काफी कम कर सकते हैं। इस परिदृश्य में देखें तो बही खातों की साफ-सफाई और परिसंपत्ति-जवाबदेही को स्पष्टï करने का विचार कर्जदाताओं को भी अधिक भरोसेमंद बनाएगा और लंबी अवधि में इस क्षेत्र को अधिक मजबूत बनाएगा।
 
आरबीआई के प्रस्ताव में नकदी कवरेज अनुपात (एलसीआर) को सभी प्रमुख एनबीएफसी के 30 दिन के शुद्घ नकदी बहिर्गमन के अनुरूप होना चाहिए। एलसीआर, जिसे उच्च गुणवत्ता वाले परिसंपत्ति वर्ग में रखा जाता है, वह यह सुनिश्चित करती है कि अगर किसी तरह का तनाव उत्पन्न होता है तब भी इन वित्तीय संस्थानों के पास कम से कम 30 दिनों की अवधि के लिए पर्याप्त पूंजी रहे। अगर इसका क्रियान्वयन हुआ तो 2020 से प्रक्रिया की शुरुआत होगी और एलसीआर 60 फीसदी रहेगा। 2024 में 100 प्रतिशत के साथ इसका अंत होगा। केंद्रीय बैंक ने 30 दिन की परिपक्वता को एक से सात दिन, 8 से 14 दिन और 15 से 30 दिन की अवधि में भी बांटा है। अधिकतम एएलएम को 10 से 20 फीसदी रखने की बात कही गई है। यह अपने आप में एक राहत है क्योंकि माना जा रहा था कि इसे सख्त बनाकर मौजूदा 15 फीसदी से 5 फीसदी कर दिया जाएगा। 
 
इस कदम की आलोचना करने वालों का कहना है कि केंद्रीय बैंक ऐसे समय में नकदी प्रबंधन की बात कर रहा है जबकि नकदी है ही नहीं। इतना ही नहीं एलसीआर की जरूरत का मार्जिन उन एनबीएफसी पर असर डालेगा जिनकी योजनाएं दीर्घावधि की हैं। उदाहरण के लिए उन वाणिज्यिक और अन्य वाहन फाइनैंस करने वालों को दिक्कत होगी जिनकी योजनाओं की अवधि तीन से पांच वर्ष है। आवास वित्त कंपनियों पर सबसे अधिक असर होगा क्योंकि उनकी परिसंपत्ति परिपक्वता सात से आठ वर्ष की अवधि के साथ सर्वाधिक है। उनकी एक दलील यह भी है कि मध्यम अवधि में ऋण धीमा पड़ सकता है और कम प्रतिफल वाली परिसंपत्तियों में निवेश के चलते मार्जिन पर असर हो सकता है। यह मुनाफे को प्रभावित करेगा। संभव है आरबीआई के मानकों को पूरा करने के लिए कमजोर एनबीएफसी मजबूत एनबीएफसी में मिल जाएं। इसमें भी कोई बुराई नहीं क्योंकि इस क्षेत्र में अनावश्यक रूप से ज्यादा कंपनियां हैं जबकि दायरा उतना व्यापक नहीं है। 
Keyword: NBFC, bank, micro finance, RBI,
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