बिजनेस स्टैंडर्ड - जेटली की विदाई
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जेटली की विदाई

संपादकीय /  May 29, 2019

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आखिरकार अपने स्वास्थ्य और मंत्रिमंडल में बने रहने से जुड़ी तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में जेटली ने कहा है कि वह स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चुनौतियों के कारण फिलहाल अगली कैबिनेट का हिस्सा नहीं बनना चाहते। हालांकि उनके करीबी लोग पिछले कुछ दिनों से साहस का परिचय दे रहे थे लेकिन उनका यह कदम प्रतीक्षित था। वर्ष 2014 में वित्त मंत्रालय संभालने के बाद जेटली कई बार शल्य चिकित्सा से गुजरे और बीते 13 महीनों में वह दो बार अवकाश पर गए। वह वर्ष 2019-20 का अंतरिम बजट भी पेश नहीं कर सके। पिछले दिनों चुनाव नतीजे पेश किए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जीत का जो जश्न मनाया, उसमें भी वह शामिल नहीं हुए थे। 

 
उनके उत्तराधिकारी को लेकर गहन अटकलों का दौर पहले से ही जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार उन्हें कीमती हीरा कहा था। जाहिर तौर पर वह उनकी कमी महसूस करेंगे। जेटली ने कई भूमिकाओं का निर्वहन किया। वह संकट मोचक भी रहे और भाजपा के प्रमुख राजनीतिक रणनीतिकारों में से भी एक रहे। यह भूमिका तो वह अभी भी निभा सकते हैं। इनके अलावा उन्होंने मंत्रिमंडल का संभवत: सबसे अहम और संवेदनशील विभाग भी संभाला। इनमें से अधिकांश भूमिकाओं में वह सफल रहे। 
 
जेटली पीछे मुड़कर देखें तो वह न केवल राहत की सांस ले सकते हैं बल्कि उन्हें गौरव भी हो सकता है। उन्होंने उस वक्त वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाला जब अधिकांश वृहद आर्थिक मानक मसलन, मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटा, रुपये-डॉलर की विनिमय दर और आर्थिक वृद्घि आदि निराशाजनक स्तर पर थे। जेटली इन सभी पर नियंत्रण पाने में कामयाब रहे और उन्होंने काफी हद तक राजकोषीय अनुशासन कायम किया। मुद्रास्फीति दो अंकों में थी, वह भी काफी कम हो गई। अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में जेटली ने कुछ बड़े आर्थिक सुधारों को गति दी। इनमें से पहला था वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था जिसने एक जटिल और अक्षम अप्रत्यक्ष कर ढांचे को खत्म किया। जीएसटी के बारे में अहम बात यह है कि उन्होंने राजकोषीय संघवाद की भावना का अनुपालन किया और जीएसटी परिषद को सहमति से निर्णय लेने दिए। उन्होंने इसके लिए मतदान आदि का सहारा नहीं लेने दिया। व्यापक तौर पर देखें तो इसका श्रेय जेटली की उन क्षमताओं को जाता है जिनके तहत वह सार्वजनिक बहस में तार्किकता और सभ्यता बरकरार रखते आए। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता एक अन्य बड़ा सुधार है जो कर्जदारों, प्रवर्तकों तथा ऋणदाताओं के व्यवहार में तब्दीली लाई है। 
 
बहरहाल, सबकुछ हमेशा बेहतर ही नहीं रहा। जेटली के वित्त मंत्रालय से निकलने के बीच कई गहन आर्थिक चुनौतियां बरकरार हैं। निवेश और खपत के मोर्चे पर देश की वृद्घि को गतिशील बनाना, नई सरकार के लिए एक अहम चुनौती होगी। देश के सकल घरेलू उत्पाद में खपत की हिस्सेदारी 60 फीसदी से अधिक है। नए निवेश में कमी के कारण पिछले कुछ समय में इसमें काफी गिरावट आई है। तयशुदा निवेश भी बीते चार वर्ष से जीडीपी के 30 फीसदी के आसपास ठहरा हुआ है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात करें तो छह वर्ष में पहली बार उसमें गिरावट दर्ज की गई है। जेटली ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में संकेत दिया है कि वह पार्टी अथवा सरकार की सहायता के लिए अनौपचारिक तौर पर कोई भी काम करने को तैयार हैं। नए वित्त मंत्री अगर जेटली की बुद्घिमता का लाभ उठाएं तो बेहतर होगा। 
Keyword: arun jaitley, FM, BJP, narendra modi,,
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