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नई सरकार में पूरक मंत्रालयों और विभागों का होगा विलय?

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 28, 2019

इस सप्ताह के अंत में नरेंद्र मोदी की अगुआई में नई सरकार शपथ ले लेगी। इसे लेकर मंत्रिपरिषद में शामिल होने वाले नामों को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई नेताओं की किस्मत इससे तय हो सकती है। लेकिन यह सवाल भी खड़ा होता है कि नई सरकार का संभावित आकार क्या हो सकता है?  भाजपा ने मतदान की प्रक्रिया शुरू होने के थोड़ा पहले अपना चुनाव घोषणापत्र जारी किया था। उस घोषणापत्र में यह वादा भी शामिल था, 'नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन और समन्वय को सुनिश्चित करने के लिए हम एक ही तरह के कार्यों में संलग्न विभागों को क्षेत्रीय  मंत्रालयों में मिला देंगे। इससे नीति-निर्माताओं को सर्वांगीण एवं समग्र नीतियां बनाने के साथ ही उनके बेहतर क्रियान्वयन में भी सहूलियत होगी।' वह वादा काफी हद तक स्पष्ट है। अगर इस वादे को पूरा किया जाना है तो सरकार के कार्यकाल की शुरुआत में ही कदम उठाए जा सकते हैं। अगर मंत्री शपथ लेते हैं और उसी समय पूरक विभागों को बड़े संभागीय मंत्रालयों में मिलाने का फैसला नहीं लिया जाता है तो इस वादे के बाद में पूरा हो पाने की संभावना कम ही रहेगी। जब कोई अपने मंत्रालय का कार्यभार संभाल लेता है तो उस मंत्रालय का आकार एवं दायित्व छोटा करना मुश्किल हो जाता है। उस समय प्रशासनिक सुधार एवं मंत्रालयों के पुनर्गठन की जरूरत पर क्षेत्राधिकार संबंधी दुर्गम मसले भारी पडऩे लगते हैं। 

 
पूरक कार्यों को अंजाम देने वाले विभागों का उस क्षेत्र से संबंधित मंत्रालयों में विलय करना कोई नया विचार नहीं है लेकिन अपने राजनीतिक पहलू के चलते इसे लागू कर पाना खासा मुश्किल है। राजीव गांधी ने परिवहन से संबंधित सभी मंत्रालयों को एक साथ मिला दिया था। इस तरह जहाजरानी, रेलवे, नागरिक उड्डयन और सड़क परिवहन एक व्यापक परिवहन मंत्रालय के मातहत विभाग बन गए। लेकिन राजीव सरकार का वह प्रयोग अधिक देर तक नहीं चला। इसकी एक वजह तो तत्कालीन प्रधानमंत्री की तरफ से प्रतिबद्धता की कमी और दूसरी वजह बड़े मंत्रालय में राजनीतिक सत्ता से जुड़ी समस्याएं थीं। 
 
सवाल यह है कि हाल के चुनाव में बड़ी जीत के बाद सत्ता में लौट रहे प्रधानमंत्री मोदी क्या लोगों से किए गए भाजपा के इस वादे को पूरा कर सकते हैं? क्या रेलवे, नागरिक उड्डयन, सड़क, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्रालयों को एक विशाल परिवहन मंत्रालय में समाहित किया जा सकता है? केवल परिवहन मंत्रालय के ही बारे में ऐसी चर्चा क्यों हो? ऊर्जा क्षेत्र में भी पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, बिजली एवं नवीकरणीय ऊर्जा को मिलाकर एक समेकित मंत्रालय क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए? 
 
इसी तरह उद्योग जगत से संबंधित कामकाज देखने के लिए करीब आधे दर्जन मंत्रालय क्यों होने चाहिए? उद्योग मंत्रालय के अलावा भारी उद्योग एवं लोक उपक्रम के लिए अलग मंत्रालय, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों के लिए अलग मंत्रालय, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए अलग मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक के लिए अलग मंत्रालय, कपड़ा के लिए अलग मंत्रालय और इस्पात के लिए अलग मंत्रालय है। उद्योग संबंधित गतिविधियों के लिए एक समेकित मंत्रालय बनाकर इन सभी को उनका विभाग बना देने से उद्योग जगत में नई जान फूंकने के लिए सरकारी प्रयासों में एकरूपता आएगी। 
 
इसी तरह, खनन क्षेत्र के लिए दो मंत्रालय क्यों होने चाहिए? कोयला के लिए अलग और खनन के लिए अलग मंत्रालय। इन्हें एक मंत्रालय में समाहित कर उन्हें दो अलग विभागों के रूप में रखा जा सकता है। भाजपा के घोषणापत्र में पानी के लिए भी एक समेकित मंत्रालय बनाने का वादा किया गया है। इसके मुताबिक 'जल प्रबंधन गतिविधियों को संपूर्णतावादी तरीके से देखने पर ही बेहतर समन्वय एवं प्रयास सुनिश्चित किए जा सकते हैं।' पानी के लिए प्रस्तावित नए मंत्रालय में पेयजल एवं स्वच्छता और जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालयों के कार्यों को समाहित किया जा सकता है। मोदी के लिए चुनौती यह है कि संबद्ध गतिविधियों वाले विभागों एवं मंत्रालयों को मिला देने से केंद्रीय मंत्रिमंडल और उसमें शामिल मंत्रियों की संख्या में कटौती हो जाएगी। ऐसा नहीं है कि ऐसी कोशिश पहले नहीं की गई हैं। वर्ष 2014 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और जहाजरानी मंत्रालय को एक ही मंत्री नितिन गडकरी के मातहत ला दिया गया था। लेकिन वह आधे मन से की गई कोशिश थी क्योंकि परिवहन से संबंधित अन्य मंत्रालयों- नागरिक उड्डयन और रेलवे को अलग ही रखा गया। अगर सरकार को अधिक असरदार एवं दुबला बनना है तो उसे पहले कदम के तौर पर कम संख्या में कैबिनेट मंत्री एवं स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्रियों की नियुक्ति करनी चाहिए। कुल मंत्रियों की संख्या घटने से पूरक कार्यों वाले मंत्रालयों एवं विभागों का विलय जरूरी हो जाएगा। 
 
फिलहाल केंद्र सरकार में 25 कैबिनेट मंत्री और 11 राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के अलावा 34 राज्य मंत्री भी हैं। प्रधानमंत्री मोदी को जोड़ते हुए मंत्रिपरिषद की कुल संख्या 71 तक हो जाती है। पूरक मंत्रालयों एवं िवभागों के विलय के बारे में भाजपा घोषणापत्र में किए गए वादे को पूरा करने में मोदी सरकार की प्रतिबद्धता का पता 30 मई को साफ तौर पर चल जाएगा। अगर उस दिन घोषित मंत्रालयों का ढांचा लगभग अपरिवर्तित ही रहता है तो इस बात की संभावना कम ही रह जाएगी कि बाद में ऐसे व्यापक बदलाव लागू हो पाएंगे। 
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