बिजनेस स्टैंडर्ड - दरों में कटौती और गवर्नर की भूमिका
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दरों में कटौती और गवर्नर की भूमिका

सौम्यकांति घोष /  May 28, 2019

आरबीआई ने फरवरी और अप्रैल में दो बार दरों में कटौती की लेकिन यह सरकार के लिए कोई चुनावी तोहफा नहीं था। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं सौम्यकांति घोष

 
कई बार टिप्पणियां अवांछित भी होती हैं। वे विषय की संकीर्ण समझ से ताल्लुक रखती हैं। द इकनॉमिस्ट पत्रिका के 13 अप्रैल के अंक में भी ऐसी ही एक टिप्पणी है। इस टिप्पणी में कहा गया है कि भारत सरकार ने केंद्रीय बैंक के एक सक्षम प्रमुख को हटाकर एक ऐसे व्यक्ति को पद पर बिठा दिया जो आसानी से वश में आ जाता है और जिसने चुनाव से पहले दरों में कटौती की। ऐसे वक्तव्य हकीकत से दूर होते हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फरवरी और अप्रैल में दरों में कटौती की थी। दोनों कटौतियां अनुकूल वृहद आर्थिक स्थिति के चलते की गई थीं। मुद्रास्फीति नरम थी और वृद्घि में गिरावट को लेकर चिंता बढ़ रही थी। जाहिर है ऐसा किसी नरम मिजाज गवर्नर की वजह से नहीं हुआ था। इन कदमों ने मौद्रिक नीति समिति की सक्रियता भरी निर्णय प्रक्रिया को दर्शाया। गवर्नर इस समिति के एक सदस्य हैं और इन निर्णयों का चुनावों से कोई संबंध नहीं। 
 
आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2019 में औसत खुदरा महंगाई 3.4 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्रों में यह केवल 3 फीसदी रही। इस अवधि में औसत खाद्य महंगाई 0.7 फीसदी रही और सब्जियों की कीमत 4.4 फीसदी कम हुई। पिछली बार मुद्रास्फीति के आंकड़े जनवरी 2018 में 5 फीसदी से ऊपर गए थे। वित्त वर्ष 2019 में औसत मूल खुदरा महंगाई 5.8 फीसदी रही। आरबीआई ने मुद्रास्फीति के दबाव के चलते जून और अगस्त 2018 में दरों में इजाफा किया। अगर हम मुद्रास्फीति के आंकड़ों को देखें तो दरों में कटौती का निर्णय पूरी तरह डेटा आधारित था। बल्कि बाजार का एक रुख यह भी है कि चूंकि मुद्रास्फीति में निरंतर कमी आ रही है इसलिए दरें मौजूदा स्तर से भी कम रह सकती थीं। 
 
हमारे लिए भारत के संदर्भ में केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का मुद्दा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। परंतु इकनॉमिस्ट में यह जितने पूर्वग्रह पूर्ण ढंग से सामने आया है, वैसा भी नहीं है।  केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता मोटे तौर पर तीन चीजों से संबंधित है: पहला व्यक्तिगत मामले, दूसरा वित्तीय पहलू और तीसरा नीतिगत आचरण। व्यक्तिगत स्वतंत्रता इस बात से संबंधित है कि सरकार केंद्रीय बैंक के शीर्ष अधिकारियों और संचालन बोर्ड की नियुक्तियों, उनके कार्यकाल और अन्य प्रक्रियाओं से खुद को कितना दूर रखती है। इतना ही नहीं केंद्रीय बैंक के संचालन बोर्ड में सरकार के प्रतिनिधित्व की प्रकृति और उसके दखल की सीमा भी इसी से संबंधित है। 
 
वित्तीय स्वतंत्रता का संबंध केंद्रीय बैंक की इस स्वायत्तता से है कि वह केंद्रीय बैंक के ऋण से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी व्यय की भरपाई की सीमा का निर्धारण कर सके। केंद्रीय बैंक के ऋण तक सरकार की सीधी पहुंच का सीधा अर्थ यही होगा कि मौद्रिक नीति, राजकोषीय नीति की अधीनस्थ है। केंद्रीय बैंक की नीतिगत स्वायत्तता का अर्थ लक्ष्य की स्वायत्तता और उपायों की स्वायत्तता है। लक्ष्य की स्वायत्तता वह स्थिति है जब केंद्रीय बैंक उत्पादन या कीमतों को स्थिर बनाने के लिए खुद नीतिगत प्राथमिकताओं का चयन करता है और मौद्रिक नीति का लक्ष्य निर्धारित करता है। उपायों की स्वायत्तता में कहा गया है कि केंद्रीय बैंक सरकार द्वारा तय लक्ष्य को हासिल करने के लिए ब्याज दर तथा अन्य उपाय अपना सके।
 
भारतीय संदर्भ में इन मुद्दों पर चर्चा करते हैं। आरबीआई की लंबा और विस्तृत इतिहास रहा है। अब तक के कुल गवर्नरों में से 66 फीसदी भारतीय प्रशासनिक सेवा से चुने गए हैं। आईएएस से चुने जाने वाले अतीत के कुछ गवर्नरों ने अपने इर्दगिर्द ऐसी छवि बनाई जो आज भी बरकरार है। स्पष्ट है कि किसी भी संस्थान को चलाने के लिए जमीनी हकीकतों की समझ होना आवश्यक है। यही वजह है कि ये नियुक्तियां प्राय: स्वामित्त्व निरपेक्ष रही हैं। भारत की बात करें तो आरबीआई के पास लक्ष्य की स्वायत्तता मुद्रास्फीति के निर्धारण के रूप में है। मुद्रास्फीति का स्तर वित्त मंत्रालय द्वारा निर्धारित किया जाता है जो वह आरबीआई से मिली जानकारी के आधार पर निर्धारित करता है। आरबीआई के पास रीपो दर के रूप में उपाय या उपकरण की स्वायत्तता भी है। मौद्रिक नीति समिति इसका निर्धारण मतदान के आधार पर करती है। वैश्विक स्तर पर देखें तो अमेरिका के फेडरल रिजर्व और यूरोपीय केंद्रीय बैंक समेत अधिकांश केंद्रीय बैंकों को उपाय की पूरी स्वायत्तता है लेकिन लक्ष्य की नहीं। आरबीआई शायद इकलौता ऐसा केंद्रीय बैंक है जिसके पास दोनों हैं। 
 
तीसर बिंदु की बात करें तो यह सच है कि भारतीय संदर्भ में राजकोषीय नीति मौद्रिक नीति पर हावी रही है। बहरहाल सन 1998 में आरबीआई ने सरकार के घाटे की भरपाई के लिए नकदी छापना रोक दिया। तब से आरबीआई ने सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में हिस्सा लेना भी बंद कर दिया। बहरहाल, ईमानदारी से कहा जाए तो हमारे देश में राजकोषीय नीति की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान हैं। सन 2008 के वित्तीय संकट के बाद से केंद्रीय बैंकिंग में तब्दीली आई है। आसान मौद्रिक नीति और निरंतर कम ब्याज दर ने परिसंपत्ति कीमतों में इजाफा किया है। इससे अमीर और अधिक अमीर हुए हैं तथा बचत पर प्रतिफल कम हुआ है। इसका असर पेंशन पाने वालों और उन परिवारों पर हुआ है जो अमीर तो नहीं हैं लेकिन अपने बैंक जमा पर मिलने वाले ब्याज की आय पर निर्भर हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि राजनीतिक कारणों ने केंद्रीय बैंकिंग में अहम भूमिका निभाई है। 
 
दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता की आलोचना करने वाले अक्सर यह दलील देते हैं कि एक स्वतंत्र केंद्रीय बैंक के पास लोकतांत्रिक वैधता नहीं होती। परंतु ऐसे आलोचकों को नोबेल पुरस्कार विजेता मिल्टन फ्रीडमेन के वक्तव्य से बढ़ावा मिलता है। उन्होंने कहा था कि पैसा इतना महत्त्वपूर्ण मुद्दा है कि उसे केवल केंद्रीय बैंक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। इस लिहाज से देखा जाए तो अगर आरबीआई और सरकार मशविरे की प्रक्रिया के साथ सुसंगत तरीके से आगे बढ़ें तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा। आखिरकार, आरबीआई अधिनियम की संशोधित भूमिका में वृद्घि का जिक्र मुद्रास्फीति के साथ किया गया है।  जून में कमजोर वृद्घि और मुद्रास्फीति के बीच दरों में कटौती का शोर था। प्रश्न यह है कि क्या अब आगे होने वाली किसी कटौती को द इकनॉमिस्ट नई सरकार को चुनावी तोहफा करार देगी? यह जानना दिलचस्प रहेगा। 
 
(लेखक एसबीआई के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। )
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