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एनबीएफसी को उबारने, ऋण वृद्धि पर होगा जोर

अनूप रॉय /  May 27, 2019

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार का प्रचंड बहुमत से दोबारा सत्ता में लौटना नीतियों की निरंतरता का संकेत है और यह निवेशक समुदाय के लिए बड़ी राहत है। पिछली सरकार के बचे हुए कामों को देखते हुए ज्यादातर अहम नीतियां वित्तीय क्षेत्र से संबंधित होंगी। सरकार के लिए सबसे बड़ा एजेंडा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एकीकरण करना है। राजग सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के सहयोगी बैंकों का पैतृक बैंक में विलय किया है। इसके अलावा भारतीय महिला बैंक का भी एसबीआई में विलय किया गया है। बैंक ऑफ बड़ौदा में विजया बैंक और देना बैंक का विलय अप्रैल में ही हुआ है। 

 
आगे और बैंकों का विलय होगा क्योंकि सरकार देश में बड़े बैंक बनाना चाहती है। बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नैशनल बैंक में त्वरित सुधार कार्रवाई (पीसीए) में शामिल बैंकों का विलय किया जा सकता है। हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों का निजीकरण एक संवेदनशील मुद्दा है, जिसके लिए बड़े स्तर पर सहमति बनानी होगी। लेकिन इन दो एजेंडों को मोदी सरकार के अगले पांच साल के कार्यकाल के दौरान हकीकत में तब्दील किया जा सकता है। सरकार अगले 100 दिनों में उन लंबित कार्यों को हल करने में व्यस्त रहेगी, जो चुनावों से पहले आचार संहिता के कारण अटक गए थे। केंद्र सरकार जुलाई में पूर्ण केंद्रीय बजट पेश करेगी। कुछ मुद्दों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत होगी। इनमें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) क्षेत्र के संकट को दूर करना, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में नई पूंजी डालना, नई पूंजी डालकर कुछ बैंकों को पीसीए से बाहर लाने की कोशिश करना आदि शामिल हो सकते हैं। इनके अलावा आरबीआई के आर्थिक पूंजी ढांचे का समाधान करना, दरों में भारी कटौती कर आरबीआई को मौद्रिक प्रोत्साहनों के लिए बढ़ावा देने की संभावना है। सरकार बैंकिंग तंत्र में नकदी सुधारने पर ध्यान दे सकती है ताकि बैंकों को ज्यादा ऋण देने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में संशोधन कर समाधान प्रक्रिया में तेजी लाना, भारतीय संपत्तियों में निवेश के लिए आने वाली पोर्टफोलियो निवेश की संभावित बाढ़ को संभालना भी जोर हो सकता है। इसके अलावा सरकार कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को मजबूत बनाने की कोशिश करेगी ताकि कंपनियों और एनबीएफसी को ऋण जुटाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। सत्तारूढ़ पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में कहा गया है कि उसका आगे भी जनधन, आधार और वित्तीय क्षेत्र का दायरा बढ़ाने पर जोर बना रहेगा। सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र को भी साफ-सुथरा बनाने की बात कही है। सरकार के बैंक बोर्डों में तत्काल सुधार करने की संभावना नहीं है। हालांकि यह एक अहम सुधार एजेंडा है, जिसका समाधान किया जाना चाहिए। 
 
इनमें से कोई भी आसान काम नहीं है। यहां हम उनमें से कुछ के बारे में चर्चा कर रहे हैं। एनबीएफसी क्षेत्र में भरोसा बहाल करना तात्कालिक और सबसे बड़ी चुनौती है। एनबीएफसी बाजारों से ऋण नहीं ले पा रहे हैं। वहीं दूसरी सबसे बड़ी हाउसिंग फाइनैंस कंपनी डीएचएफएल लिमिटेड द्वारा जमा निकासी बंद किए जाने के बाद खुदरा निवेशकों का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ है। वहीं दो बड़ी एनबीएफसी- आईएलऐंडएफएस और रिलायंस कैपिटल ने डिफॉल्ट किया है।  आरबीआई के बोर्ड ने क्रेडिट लाइन के विचार को खारिज कर दिया है। लेकिन यह केंद्रीय बैंक पिछले सप्ताह ने इस बारे में प्रारूप नियम बनाए हैं कि कैसे एनबीएफसी के पास नकदी की मात्रा में सुधार किया जाए। विश्लेषकों का कहना है कि इस अस्थायी संकट को नियंत्रित किया जाएगा ताकि यह बड़ा संकट न बने और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करे। 
 
मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज लिमिटेड के संस्थागत अनुसंधान के उपप्रमुख और बैंकिंग विश्लेषक अल्पेश मेहता ने कहा, 'हर चार-पांच साल में नकदी की किल्लत के कारण एनबीएफसी में संकट देखने को मिलता है। नई सरकार की प्राथमिकता विभिन्न प्रोत्साहनों के जरिये डेट बाजार को मजबूत बनाना होना चाहिए।' अल्पेश ने कहा, 'इससे न केवल बैंकिंग तंत्र में जोखिम कम होगा, बल्कि एनबीएफसी समेत कॉरपोरेट कर्जदारों के लिए फंड की लागत भी घटेगी। एक विशेष आकार से बड़ी एनबीएफसी/एचएफसी को नकदी की भारी किल्लत की स्थिति में आरबीआई की सुविधा इस्तेमाल करने की मंजूरी दी जाए। हमारा मानना है कि निकट भविष्य में आरबीआई आर्थिक तंत्र में नकदी बढ़ाएगा क्योंकि जमाओं की वृद्धि सामान्य है, ऋण की वृद्धि सुधर रही है और एनबीएफसी/एचएफसी के लिए नकदी का संकट लगातार बरकरार है।'
 
उत्पाद एवं उपभोक्ता क्षेत्र को ऋण देने का काम एनबीएफसी बखूबी करता है। ऐसे में इन क्षेत्रों को ऋण न मिलने से वास्तविक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। लेकिन इस क्षेत्र की कर्ज की मांग बैंक पूरी कर सकते हैं।  बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के कंट्री ट्रेजरर जयेश मेहता ने कहा, 'नई सरकार को ऋण बाजार को सही स्थिति में लाना चाहिए और बैंकों को ज्यादा ऋण देने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। अन्य मुद्दे स्वत: ही हल हो जाएंगे।' जयेश मेहता ने कहा, 'सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय होना चाहिए। हालांकि सरकार को बैंकिंग क्षेत्र को खोलना चाहिए और छोटे बैंकों को आने देना चाहिए। निवेशकों को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को खरीदने की मंजूरी देनी चाहिए। एनबीएफसी को आसानी से बैंकों में तब्दील करने की मंजूरी दी जानी चाहिए। हम अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए केवल 'शैडो बैंकिंग' प्रणाली नहीं चाहते हैं।' 
 
इस समय पीसीए में छह बैंक हैं। सरकार ने फरवरी में इन बैंकों से अपने अहम अनुपात सुधारने को कहा था ताकि वे पीसीए से बाहर आ सकें। इन बैंकों में इतनी नई पूंजी डाली गई है कि वह उनकी न्यूनतम पूंजी की जरूरत के लिए पर्याप्त है। लेकिन उन्हें अपनी बैलेंस शीट साफ-सुथरी बनाने के लिए और पूंजी की जरूरत हो सकती है। सरकार बैलेंसशीट साफ-सुथरी बनाने पर सबसे अधिक ध्यान दे रही है। पिछले साल सरकार ने बैंकों में 88,139 करोड़ रुपये की नई पूंजी डाली थी। इनमें से 52,311 करोड़ रुपये पीसीए के तहत आने वाले 11 सरकारी बैंकों के लिए आवंटित की गई थी। बैंक ऑफ इंडिया, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और बैंक ऑफ महाराष्ट्र पीसीए से बाहर आ गए हैं। वहीं देना बैंक और आईडीबीआई बैंक का बैंक ऑफ बड़ौदा और भारतीय जीवन बीमा निगम में विलय कर दिया गया। विश्लेषकों का अनुमान है कि इस क्षेत्र में और पूंजी डाली जा सकती है और इसका आवंटन बजट में किया जा सकता है। यूबीएस ने एक रिपोर्ट में कहा, 'हमारे आकलन के मुताबिक वित्तीय तंत्र में 10 अरब डॉलर की पूंजी डालने से ऋण में 100 अरब डॉलर की बढ़ोतरी की संभावना है।' हालांकि आरबीआई बॉन्ड खरीद और डॉलर अदला-बदली के जरिये लगातार आर्थिक तंत्र में पर्याप्त नकदी डाल रहा है, लेकिन दरों में कटौती का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए कुछ और कदम उठाए जाने की जरूरत है। 
 
इस स्तर पर भारतीय रिजर्व बैंक के दरों में 50 फीसदी आधार अंक की कटौती करने से मदद मिल सकती है। असल में 6 जून को मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान नीतिगत दर में कम से कम 25 आधार अंक की कटौती किए जाने की उम्मीद है। हालांकि ऐसा लगता है कि सरकार ने अपने घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.2 फीसदी के दायरे में रखने के लिए राजकोषीय पैकेज नहीं देने का फैसला किया है।  सरकार को आईबीसी की प्रक्रिया की कुशलता सुधारने पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। इसमें ऋणग्रस्त संपत्तियों के समाधान पर आरबीआई का संशोधित परिपत्र एक अहम भूमिका निभा सकता है। सूत्रों के मुताबिक एक दिन के डिफॉल्ट का नियम बने रहने की संभावना है। लेकिन सरकार को आईबीसी अधिनियम में संशोधन करना चाहिए ताकि अवसरवादी लोगों को वसूली की प्रक्रिया में देरी करने से रोका जा सके। विश्लेषकों का कहना है कि अगंभीर बोलीदाता लंबे समय से एक समस्या बने हुए हैं और बोली की प्रक्रिया बंद होने के बाद नई बोलियों पर भी रोक लगाई जाए।
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