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सफल होगी उड़ान?

संपादकीय /  May 27, 2019

जानकारी के मुताबिक सरकार ने एयर इंडिया की रणनीतिक बिक्री की योजना को नए सिरे से अंजाम देने का मन बनाया है। उसने एयर इंडिया प्रबंधन से कहा है कि वह जून के अंत तक वर्ष 2018-19 के लिए विमानन कंपनी तथा उसकी अनुषंगी कंपनियों के वित्तीय खातों की जानकारी मुहैया कराए।  अनुमान लगाया जा रहा है कि एक महीने के भीतर अभिरुचि पत्र आमंत्रित किए जाएंगे। यह उत्साहवर्धक खबर है क्योंकि एयर इंडिया की बिक्री का मामला लंबे समय से लंबित है और विभिन्न सरकारें इसे अंजाम नहीं दे पाईं। यही कारण है कि कंपनी करदाताओं पर बोझ बनी हुई है। 

 
उदाहरण के लिए 2015-16 से 2017-18 के बीच कंपनी का राजस्व 20,526 करोड़ रुपये से बढ़कर 22,146 करोड़ रुपये हो गया लेकिन इसी अवधि में कंपनी का शुद्घ घाटा भी 3,837 करोड़ रुपये से बढ़कर 5,765 करोड़ रुपये हो गया।  राजग सरकार गत वित्त वर्ष में एयर इंडिया के लिए सौदा तलाशने में नाकाम रही क्योंकि किसी ने भी इस सरकारी विमानन सेवा में हिस्सेदारी खरीदने की इच्छा नहीं दिखाई। उदाहरण के लिए सरकार ने गत वर्ष कंपनी के 74 फीसदी शेयर बेचने की पेशकश की थी। इससे संभावित खरीदारों के मन में आशंका उत्पन्न हो गई क्योंकि वे सरकार के साझेदार के रूप में कारोबार नहीं करना चाहते थे। गत वर्ष जारी अभिरुचि शर्तों में कई अन्य विवादास्पद प्रावधान थे। उदाहरण के लिए भारतीय विमानन सेवाओं के लिए 5,000 करोड़ रुपये की नेटवर्थ का मानक भी सही नहीं था क्योंकि केवल इंडिगो एयरलाइंस ही इस मानक को पूरा कर पा रही थी। इतना ही नहीं अगर किसी समूह द्वारा बोली लगती, भारतीय कंपनियां नेटवर्थ मानक पूरा नहीं करतीं और कर बाद मुनाफे का मानक 51 फीसदी हिस्सेदारी तक सीमित होता तो केवल 38 फीसदी हिस्सेदारी ही बचती। शर्तों में यह भी कहा गया था कि अंशधारिता का रुख अभिरुचि के स्तर पर ही स्थिर रहेगा और बोली हासिल करने वाले को एयर इंडिया ब्रांड पर अधिकार मिलेगा और वह उसे एक अलग विमानन सेवा के रूप में संचालित कर सकेगा। 
 
अतीत के अनुभवों से तंग सरकार अब शायद पुरानी गलतियां दोहराना नहीं चाहती है। उदाहरण के लिए 76 फीसदी शेयर के स्थान पर इस बार सरकार 95 फीसदी शेयर बेचना चाहती है। वह कर्मचारी शेयर विकल्प के तौर पर केवल 5 फीसदी शेयर अपने पास रखना चाहती है। गत वर्ष कंपनी के बहीखातों का भारी भरकम कर्ज भी अवरोधक बनकर सामने आया था। यहां भी सरकार संशोधन करने को प्रतिबद्घ नजर आ रही है। उसने पहले ही एयर इंडिया की 29,464 करोड़ रुपये का कार्यशील पूंजी ऋण एक नई कंपनी को स्थानांतरित करने की बात कही है।  
 
सरकार को उम्मीद है कि यह राशि विमानन कंपनी की कुछ मुनाफे में चल रही अनुषंगी कंपनियों की बिक्री से चुकाई जा सकेगी। ऐसे में कंपनी पर 25,000 करोड़ रुपये का कर्ज रह जाएगा। इससे चुकता किए जाने वाले ब्याज में भारी कमी आएगी और यह राशि सालाना 1,700 करोड़ रुपये रह जाएगी। यह एक ऐसी विमानन कंपनी के लिए कर्ज का व्यवहार्य स्तर है जो जेट एयरवेज के बंद होने के बाद अमेरिका और उत्तरी अमेरिका के बाजार में दबदबा रखती है। चूंकि 163 विमानों में आधे से अधिक पर कंपनी का मालिकाना हक है। मालिक बनने वाली नई कंपनी इनका भी पूरा लाभ उठा सकती है। लोकसभा चुनाव में मिली जबरदस्त जीत ने सरकार को यह अवसर प्रदान किया है कि वह इस बार अपनी बात पर अमल कर दिखाए। 
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