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ग्रामीण बंगाल में दीदी की नाकामी

नम्रता आचार्य /  May 26, 2019

जबसे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सत्ता में आई हैं वह लगातार प्रशासनिक समीक्षा से जुड़ी बैठकें करती रही हैं जिससे अधिकतर सरकारी अधिकारियों और जिला स्तरीय राजनेताओं में भय का माहौल बन गया है। बार-बार बुलाए जाने वाले इन सत्रों में वह मीडिया के सामने विकास कार्यों की प्रगति पर शीर्ष सरकारी अधिकारियों और पार्टी कार्यकर्ताओं को फटकार लगाती रहती हैं।  समीक्षा बैठकों में ममता अपने तरीके से प्रशासनिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी मजबूत पकड़ को दर्शाता है। नवंबर 2018 तक उन्होंने इस तरह की 430 बैठकें की हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के करीब आठ साल के कार्यकाल में राज्य सरकार के बजट में ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया है। हालांकि इसके बावजूद पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और पार्टी शहरी सीटों को ही बनाए रख पाई। विश्लेषकों के मुताबिक, वैसे तो इन चुनावों में अधिकांश मत धार्मिक आधार पर दिए गए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों पर ममता द्वारा दी गई तवज्जो अप्रासंगिक हो गई।  पिछले आठ सालों में राज्य में कृषि, पंचायत और ग्रामीण विकास, अल्पसंख्यक विकास, स्वास्थ्य, स्कूली शिक्षा, भूमि सुधार और शरणार्थी राहत तथा पुनर्वास जैसे क्षेत्रों को सर्वाधिक वित्तीय सहायता प्रदान की गई। इसी दौरान, नई नौकरियां सृजित करने वाले क्षेत्र, जैसे वाणिज्य, उद्योग और सूचना तकनीक में तुलनात्मक रूप से वित्त आवंटन कम रहा। 

 
आंकड़ों से बनती तस्वीर 
 
साल 2012-13 में बंगाल का कृषि बजट 315 करोड़ रुपये था जब राज्य वित्त मंत्री अमित मित्रा ने तृणमूल सरकार का पहला बजट पेश किया। साल 2019-20 तक आते आते यह आवंटन बढ़कर 6,086 करोड़ रुपये हो गया।  केंद्र की राजग सरकार द्वारा कुछ समय पहले किसानों को सालाना 6,000 रुपये की पीएम सम्मान निधि योजना की घोषणा करने से करीब एक महीने पहले पश्चिम बंगाल ने किसानों को 2 लाख रुपये के जीवन बीमा के साथ प्रति एकड़ 5,000 रुपये देने की घोषणा की थी। राज्य सरकार की इस योजना के तहत 7,20,000 किसान आते हैं। फरवरी 2019 में ममता ने घोषणा की कि राज्य सरकार फसल बीमा योजना के पूरे प्रीमियम को वहन करेगी। इससे पहले तक राज्य 80 प्रतिशत प्रीमियम वहन करता था और शेष राशि केंद्र सरकार देती थी। इसके बावजूद तृणमूल को कृषि बहुल क्षेत्र हुगली और वर्धमान-दुर्गापुर में हार का सामना करना पड़ा। 
 
तृणमूल सरकार ने अल्पसंख्यक विकास पर भी काफी ध्यान दिया था। भाजपा ने भी इस विषय को राज्य में एक मुद्दा बनाने का लगातार प्रयास किया और पार्टी ने तृणमूल पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया।  अल्पसंख्यक विकास और मदरसा शिक्षा के लिए बंगाल का बजट साल 2012-13 में 570 करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में करीब 4,017 करोड़ रुपये हो गया। मुसलमानों को ध्यान में रखकर चलाई गई कुछ परियोजनाओं में अभी तक कुल 563 करोड़ रुपये की राशि से कब्रिस्तान में चहारदीवारी का निर्माण, 100 करोड़ रुपये की मदद से हज हाउस का निर्माण और इसके अलावा सरकार की सभी योजनाओं के लिए प्रत्येक जिले में एकल खिड़की सुविधा देने के लिए अल्पसंख्यक भवन की स्थापना की गई। 
 
राज्य में 257 करोड़ रुपये के बजट से 20 एकड़ में फैली आलिया यूनिवर्सिटी बनाई गई है, जिसे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान का दर्जा दिया गया है। हालांकि तृणमूल सरकार की राजनीतिक रूप से सबसे अधिक विवादास्पद योजना वह थी, जिसमें करीब 63,378 इमाम और मुअज्जिन को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई। तृणमूल सरकार की सबसे सफल कल्याणकारी योजना में कन्याश्री प्रोजेक्ट शामिल है जिसे संयुक्त राष्ट्र और दूसरे कई जगहों से सम्मान मिल चुका है और कई दूसरे राज्य इसका अनुसरण कर रहे हैं। इसके तहत राज्य 18 साल की उम्र में पहुंचने पर पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रत्येक बालिका को एकमुश्त 25,000 रुपये दिए जाते हैं। राज्य कक्षा 8 से कक्षा 12 तक किसी भी कक्षा में अपना नामांकन कराने वाली 13-18 आयु वर्ष के बीच की अविवाहित लड़कियों को भी छात्रवृत्ति प्रदान करती है। सरकार कक्षा 9-12 के विद्यार्थियों को मुफ्त में स्कूली बैग, किताबें, ड्रेस और साइकिल देती है। स्कूली शिक्षा के लिए तृणमूल का बजट साल 2012-13 के 2,713 करोड़ रुपये से बढ़कर साल 2019-20 में 27,541 करोड़ रुपये हो गया। कन्याश्री की सफलता को देखते हुए तृणमूल ने बाद में रूपाश्री योजना भी शुरू की, जिसके तहत महिलाओं की शादी पर आर्थिक सहायता दी जाती है। राज्य सरकार की कुछ दूसरी लोकप्रिय योजनाओं में युवाश्री (बेरोजगारों को वित्तीय सहायता) और लोक कलाकारों को वित्तीय सहायता प्रदान करना शामिल हैं। खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में बंगाल का प्रदर्शन बेहतर रहा है और सरकार गरीबों को 2 रुपये किलो के हिसाब से मासिक तौर पर 5 किलो गेहूं या चावल देती है। 
 
राज्य का स्वच्छता अभियान, 'मिशन निर्मल बांग्ला' भी काफी सफल रहा। इसे केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए स्वच्छ भारत अभियान से काफी पहले साल 2013 में शुरू  किया गया था। सरकार ने पिछले आठ साल में ग्रामीण क्षेत्रों में 60 लाख से अधिक शौचालयों का निर्माण किया है। जब साल 2011 में ममता बनर्जी सत्ता में आईं तो सरकारी अस्पतालों में सुधार अहम मुद्दों में शामिल था। राज्य की जनता के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत स्वास्थ्यसाथी परियोजना ने चुनावी सभाओं के दौरान काफी ध्यान खींचा। आयुष्मान भारत से काफी पहले शुरू की गई स्वास्थ्य साथी के तहत राज्य सरकार 1.5 लाख रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक का बीमा कवर उपलब्ध कराती है। ममता नरेंद्र मोदी पर उनके राज्य की स्वास्थ्य बीमा योजना को हाइजैक करने का आरोप लगाती रहती हैं। 
 
शुरू में राज्य सरकार ने स्वास्थ्यसाथी और आयुष्मान को एक साथ चलाने पर हामी भर दी थी लेकिन बाद में राज्य ने खुद को आयुष्मान योजना से बाहर कर लिया। राज्य में उद्योग और नौकरियों की कमी ममता के लिए चिंता का विषय रहा है जिसके चलते पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में युवा विस्थापित हुए हैं। साल 2018-19 में वाणिज्य एवं उद्योग के लिए बजट आवंटन 1,304 करोड़ रुपये और आईटी के लिए 248 करोड़ रुपये था। जो अल्पसंख्यक विकास के लिए बजट से भी काफी कम है। तृणमूल राज्य के ग्रामीण इलाके से अपनी पकड़ खो चुकी है और दमदम, उत्तरी कोलकाता, जादवपुर, दक्षिण कोलकाता और बारासात जैसी शहरी सीटें जीतकर कुल सीटों की संख्या बराबर की हैं। स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्रों पर जोर देने की ममता की नीति सकारात्मक परिणाम नहीं दे सकी। 
Keyword: west bengal, mamta, election, TMC,,
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