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मंडल और मंदिर से आगे मोदी की राह

चुनाव की बात
शेखर गुप्ता /  May 26, 2019

ठीक तीन दशक बाद भारतीय राजनीति के एक युग का अंत हुआ और नए युग की शुरुआत हुई। हम नेहरू-गांधी परिवार के पतन और नरेंद्र  मोदी के रूप में भारतीय राजनीति के एक नये धु्रव के आगाज की बात नहीं कर रहे। देश के व्यापक राजनीतिक बदलाव को इस संकीर्ण नजरिये से देखना उचित नहीं होगा। यह मंडल और मंदिर की राजनीति का अंत और मोदी युग की शुरुआत है। सन 1989 में लगभग इसी समय भाजपा की वापसी की संभावनाएं बनी थीं। इससे पहले 1984 में पार्टी दो सीटों पर सिमट गई थी। सन 1989 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व के अंतिम वर्ष में उनके करीबी और रक्षा मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बगावत कर दी थी और राजीव के स्वाभाविक स्थानापन्न नजर आ रहे थे। परंतु वह बिना भाजपा के सहयोग के ऐसा नहीं कर सकते थे। भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी सत्ता में हमेशा के लिए साझेदार भर नहीं बने रहना चाहते थे।

 
वह चाहते थे कि भाजपा अपने दम पर सत्ता में आए। इसके लिए भाजपा को भ्रष्ट राजीव को हटाने से इतर एजेंडे की तलाश थी। आडवाणी ने अयोध्या का मसला उठाया। उन्होंने आक्रामक राष्ट्रवाद को हिंदू जागरण से मिलाया और इस प्रकार मंदिर आंदोलन की शुरुआत हुई। आडवाणी ने राजीव को रोकने में विपक्ष की मदद की। विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल को 143 सीटें मिलीं जिनमें से अधिकांश हिंदी प्रदेश में थीं। सिंह को राष्ट्रीय मोर्चे की नई सरकार में प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। मोर्चा 272 के जादुई आंकड़े से दूर था। यह दूरी पाटने में वाम और भाजपा के बाहरी समर्थन ने मदद की। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि ये दो विपरीत विचारधाराएं एक साथ आई थीं।
 
जनता दल और उसके छोटे सहयोगियों की सीटों में पुराने समाजवादी और कांग्रेस के बागियों का हिस्सा था। वे आमतौर पर भाजपा को पसंद नहीं करते थे। कश्मीर में उभरती अशांति, विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के गृहमंत्री और कश्मीरी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण और बदले में कश्मीरी अलगाववादियों की रिहाई की मांग पर झुकने से हालात और खराब हो गए। सिंह और उनके समाजवादी/ लोहियावादी विचारकों को पता था कि यह साझेदारी अस्थायी है और इसलिए वे कांग्रेस और भाजपा विरोधी नई राजनीति में जुट गए। तब करीब एक दशक पुराने मंडल आयोग की सिफारिश को लागू किया गया जो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण से संबंधित थी। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 22.5 फीसदी आरक्षण से पहले ही नाराज सवर्ण विश्वनाथ प्रताप सिंह से बेहद नाराज हो गए। हिंसात्मक आंदोलन में करीब 159 युवाओं ने आत्महत्या का प्रयास किया और 63 जानें चली गईं। एक किस्म का जातीय युद्ध छिड़ गया। इस प्रक्रिया में विश्वनाथ प्रताप सिंह और समाजवादियों ने नया ओबीसी वोट बैंक तैयार कर लिया। भाजपा को यह आशंका पैदा हो गई कि इससे उसका हिंदू वोट बंट सकता है। यह वह दौर था जब आडवाणी समूची आबादी को हिंदू-मुस्लिम के नाम पर ध्रुवीकृत करने का प्रयास कर रहे थे।
 
सिंह की मंडल नीति, आडवाणी की मंदिर नीति से टकरा रही थी। मंडल बनाम मंदिर की राजनीति तब से भारतीय राजनीति को परिभाषित करती रही। क्या जातीय विभाजन को आस्था से जोड़ा जा सकता है? जब भी यह कारगर हुआ, भाजपा सत्ता में आई। परंतु ज्यादातर मौकों पर जातीय समीकरण भारी पड़े। खासकर इसलिए क्योंकि हिंदी क्षेत्र में तमाम नेताओं ने जातीय गोलबंदी की। कांशीराम और मायावती भी इसमें शामिल हो गए और दलित उनके पीछे एकजुट हो गए। मुस्लिम कभी इनकी ताकत बने तो कभी उसका उलट हुआ। दोनों ने मिलकर हिंदी प्रदेश में भाजपा को पराजित किया और राष्ट्रीय स्तर पर इन्होंने कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए गठजोड़ किया। वर्ष 2019 के जनमत ने इसका अंत कर दिया। मंडल पर मंदिर को जीत मिली, कहने से बात पूरी नहीं होगी। यह कहना अधिक सही होगा कि मोदी और शाह के अधीन मंदिर ने मंडल को हड़प लिया। मोदी देश के पहले ऐसे पिछड़ा प्रधानमंत्री बने हैं जिन्होंने दूसरी बार पूर्ण बहुमत हासिल किया। मंडल का वोट बैंक टूट चुका है। मोदी को मंदिर और मंडल दोनों से ताकत मिली है।
 
यह बहुत बड़ा बदलाव है। ऐसा कैसे हुआ? इसके क्या संभावित परिणाम हैं? इसका प्रतिरोध कैसे होगा और देश की राजनीति में एक नया ध्रुव कैसे बनेगा? नतीजों की शाम मोदी के पार्टी कार्यकर्ताओं को दिए भाषण को याद करें, उन्होंने दो बातें कहीं। पहला, देश में केवल दो जातियां हैं एक गरीब और दूसरी वे जो गरीबों की मदद के लिए संसाधन जुटाने में सक्षम हैं। दूसरी बात, धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाने वालों की हार हुई है। राजनीतिक संदेश कहता है कि अब वह समय गया जब जाति के आधार पर हिंदुओ को बांटा जाता था और मुस्लिम मतों की सहायता से सत्ता पाई जाती थी।
 
यह केवल मोदी के कारण संभव हुआ। विपक्ष को दोष देने का कोई अर्थ नहीं है। चुनाव पूर्व गठबंधन तब काम करते हैं जब आप किसी विचारधारा या पार्टी से लड़ रहे हों। किसी व्यक्ति से लडऩे में वे काम नहीं आते, खासतौर पर मोदी जैसी लोकप्रियता वाले व्यक्ति से या फिर सन 1971 की इंदिरा गांधी से। मोदी और शाह ने भाजपा को वहां ले जाने का दुस्साहस किया है जहां आडवाणी और उनकी पीढ़ी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा। मंदिर को लेकर उनके ध्रुवीकरण को हिंदी क्षेत्र के मतदाताओं की उच्च वर्णीय मंडल विरोधी आत्मदाह करने वालों के साथ सहानुभूति में स्पष्ट देखा गया था। मोदी और शाह अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों तक पहुंचने में  कामयाब रहे। उत्तर प्रदेश में उन्होंने मायावती और मुलायम सिंह यादव, दोनों के वोट बैंक में सेंध लगाई और दोनों जाटव और यादव के रूप में जाति विशेष के नेता बनकर रह गए। अन्य दल भाजपा की ओर झुकते चले गए। पार्टी के पास उच्च वर्ण का हिंदू राष्ट्रवादी वोट बैंक पहले से है। इन अतिरिक्त आंकड़ों ने उसे और ताकतवर बनाया। बिहार गैर भाजपा ओबीसी नेता नीतीश कुमार के पास है, एक अन्य बड़े दलित समूह के नेता राम विलास पासवान भाजपा के साथ हैं। बीते तीन में से दो दशक तक भाजपा को सत्ता से बाहर रखने वाले मंडल की चुनौती 2019 में पूरी तरह समाप्त हो गई। 
 
मोदी के पास अब अवसर है कि वह नई रूपरेखा लिखें। चूंकि अब वह उच्च वर्णीय हिंदुओं की वफादारी को कुछ हल्के में ले सकते हैं इसलिए वह केंद्र और राज्य में ओबीसी और दलित नेताओं को मजबूत बना सकते हैं। बिहार में वह पहले ही मजबूत नेता तैयार कर रहे हैं और आगे उत्तर प्रदेश में भी ऐसा कर सकते हैं। हिंदू उनके नेतृत्व में पर्याप्त सुरक्षित महसूस कर रहे हैं इसलिए वे मुस्लिमों तक भी पहुंच सकते हैं। संदेश है: सारे दलों के मत प्रतिशत मिलाकर सत्ता हासिल करने का वक्त गया। वह राजनीति अब खत्म हो चुकी है इसलिए मेरी छत्रछाया में आइए। आखिरकार, जैसा कि मैंने कहा, भारत में केवल दो जातियां हैं गरीब और संपदा बनाने वाले। अधिकांश मुस्लिम इसमें शामिल नहीं हैं लेकिन कुछ तो हैं। इसे देश में राजनीति का अंत समझना भूल होगी। यह केवल मंडल और मंदिर युग का समापन है। मोदी को चुनौती देने वाले अगले नेता को एक नई राजनीति तलाशनी होगी। कुछ लोगों को अभी भी उम्मीद होगी कि जाति एक बार फिर आस्था के आधार पर एकजुट लोगों को विभाजित करेगी। परंतु मुझे लगता है कि यह विचार पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
 
यह नई राजनीति कौन और कैसे तैयार करेगा? चुनाव नतीजों को खंगालें तो पता चलता है कि भाजपा की 303 और कांग्रेस की 52 सीटों के पीछे दो अहम आंकड़े हैं। भाजपा के वोट 2014 के 17.1 करोड़ से बढ़कर अब 22.6 करोड़ हो गए हैं। कांग्रेस के वोट भी 10.69 करोड़ से बढ़कर 11.86 करोड़ हो गए हैं। वर्ष 2014 में दोनों के बीच कुल 27.79 करोड़ वोट बंटे थे जो अब 34.46 करोड़ हो गए हैं। यह 2014 में कुल वोट के 50.3 प्रतिशत से बढ़कर 57 फीसदी हो गया है। मंडलवादी दलों तथा अन्य क्षेत्रीय दलों की ओर छिटका वोट वापस राष्ट्रीय दलों की ओर लौट रहा है। इसलिए आप भले ही कांग्रेस को हल्के में ले लें लेकिन मोदी और शाह ऐसा नहीं कर सकते। 
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