बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि उपज की चुनौती
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, June 16, 2019 09:07 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कृषि उपज की चुनौती

संपादकीय /  May 26, 2019

प्रमुख फसलों की सरकारी खरीद कीमत को उसकी उत्पादन लागत के 50 फीसदी तक बढ़ाए जाने के बाद भी जिंस बाजारों में निरंतर गिरावट आ रही है। यह एक ऐसा विषय है जिससे देश की नई सरकार को तत्काल निपटना होगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) वाली अधिकांश जिंस मौजूदा रबी मार्केटिंग सीजन में इन दरों से 10 से 30 फीसदी कम दर पर बिक रही हैं। गत खरीफ सीजन में भी हालात अलग नहीं थे। केवल गेहूं और चावल ही अपवाद हैं जो चुनिंदा क्षेत्रों में सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीदे जाते हैं। इसके अलावा तुअर, कपास और जौ पर भी यह बात लागू होती है क्योंकि इनकी मांग आपूर्ति से ज्यादा है। हालांकि दाल और तिलहन की खरीद कुछ इलाकों में सरकार द्वारा नियत एजेंसियों द्वारा भी की जाती है लेकिन इस खरीद की मात्रा अत्यंत कम है। यही कारण है कि ये बाजार को प्रभावित नहीं करती। सरकार की प्रमुख मूल्य समर्थन योजना पीएम-आशा (अन्नदाता आय संरक्षण अभियान) को भी गति नहीं मिल सकी। इस प्रक्रिया में जिन किसानों को नुकसान हुआ है, आशंका है कि नई सरकार के गठन के बाद वे भी विरोध करेंगे। 

 
जिंस कीमतों में मौजूदा गिरावट का काफी श्रेय बीते कुछ वर्ष के दौरान निरंतर अधिशेष उत्पादन को दिया जा सकता है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर कमजोर जिंस कीमतें और प्रतिकूल घरेलू और बाहरी व्यापार नीतियां भी इसका कारण हैं। इतना ही नहीं पुराने नए घरेलू माल के विपणन के दौरान ही भंडारित माल का निपटान और नए आयात की इजाजत भी इसका कारण है। इससे अलग पीएम आशा योजना में वही मूलभूत कमियां हैं जो अन्य मूल्य समर्थन योजनाओं में। मध्य प्रदेश तथा कुछ अन्य राज्यों में भावांतर भुगतान का प्रयास किया गया। कुछ जगहों पर तयशुदा कमीशन के आधार पर कृषि उपज की खरीद और प्रबंधन में निजी क्षेत्र को भागीदार बनाने की कोशिश भी की गई। मुख्य उपज खासकर चावल और गेहूं की खुली खरीद का काम दशकों से चल रहा है और इसकी बदौलत दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक वितरण प्रणाली सफलतापूर्वक चल रही है, लेकिन सरकारी खजाने पर इसका भारी बोझ पड़ा है। परंतु यह भी मोटेतौर पर चुनिंदा राज्यों तक सीमित है जहां खरीद का बुनियादी ढांचा मौजूद है। अन्य स्थानों पर गेहूं और चावल की बिक्री एमएसपी से कम दर पर होती है। इस योजना को देश भर की सभी फसलों पर लागू करने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती। भावांतर भुगतान योजना भी नाकाम रही है क्योंकि पंजीयन की प्रक्रिया जटिल थी और नियमित मंडियों के जरिए बिक्री करना अनिवार्य था जहां बिचौलिये हावी थे। उपज का अधिकतम 25 फीसदी ही खरीदा जा सकता था। तीसरा विकल्प था मूल्य समर्थन व्यवस्था में निजी कारोबारियों को शामिल करना। यह इसलिए नाकाम रहा क्योंकि खरीद, पैकिंग, परिवहन, भंडारण, निस्तारण आदि के लिए एमएसपी का केवल 15 फीसदी कमीशन तय किया गया था जो कि बहुत कम था। 
 
इन मसलों को हल करने के अलावा कृषि-जिंस कीमतों में सुधार के लिए कई अन्य कदम उठाने की आवश्यकता है। अधिशेष उपज का निर्यात करने की सुविधा आवश्यक है। इसके लिए आयात-निर्यात शुल्क दरों में बदलाव किया जा सकता है। साथ ही, कृषि निर्यात को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसके अलावा किसानों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए कि वे अपनी कृषि में विविधता लाएं और मूल्यवर्धित फसल उगाएं। इससे बिना सरकारी हस्तक्षेप के उनको बेहतर प्रतिफल मिल पाएगा। नीतिगत व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि किसानों के हितों और मुद्रास्फीति के प्रबंधन के बीच संतुलन कायम हो सके। 
Keyword: agri, farmer, crop, MSP, jins,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या भारत के शुल्क लगाने से बिगड़ेगा अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.