बिजनेस स्टैंडर्ड - एल्युमीनियम पर आयात का प्रहार
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एल्युमीनियम पर आयात का प्रहार

जयजित दास / भुवनेश्वर May 26, 2019

आयात की बाढ़ से पस्त देश के एल्युमीनियम विनिर्माताओं ने एल्युमीनियम समेत अन्य उत्पादों को क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) के तहत आयात की नकारात्मक सूची में डालने पर जोर दिया है। एल्युमीनियम और इसके तैयार उत्पादों का आयात वित्त वर्ष 2019 में 23 लाख टन के सर्वकालिक शीर्ष स्तर पर पहुंच गया जिसके परिणामस्वरूप 5.5 अरब डॉलर (या 40,000 करोड़ रुपये) की विदेशी मुद्रा बाहर गई। देश के कुल आयात में इसका योगदान 1.1 प्रतिशत रहा। अलबत्ता कुल एल्युमीनियम आयात में 19 प्रतिशत की वृद्धि हुई और कबाड़ का आयात 21 प्रतिशत बढ़ा। निर्बाध आयात से घरेलू एल्युमीनियम कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी वित्त वर्ष 19 में घटकर 40 प्रतिशत रह गई जबकि वित्त वर्ष 11 में यह 60 प्रतिशत थी।

 
अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते व्यापार युद्ध को देखते हुए देश का एल्युमीनियम बाजार चीन, रूस, कनाडा और खाड़ी क्षेत्र जैसे प्रचुर एल्युमीनियम वाले देशों की पसंदीदा जगह में तब्दील हो गया है। लेकिन मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की वजह से भारत में आयात किए जाने वाले कुल एल्युमीनियम उत्पादों में दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र का योगदान करीब 35 प्रतिशत रहता है। इस आयात को आरसीईपी देशों - चीन, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, जापान, थाईलैंड, सिंगापुर और अन्य आसियान (दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन) से बढ़ावा मिलता है। भारत में अधिकांश एल्युमीनियम आयात एफटीए के रास्ते हो रहा है। घरेलू एल्युमीनियम उद्योग को शक है कि चीन की ओर से अन्य मार्गों से माल भेजा जा रहा है जिसे भारत-आसियान और भारत-मलेशिया एफटीए जैसे मौजूदा समझौतों का लाभ मिल रहा है।
 
उद्योग के एक सूत्र ने कहा कि आरसीईपी के लिए चल रही वार्ता में चीन और आसियान भागीदार देशों के रूप में शामिल हैं। चीन की उपस्थिति गंभीर खतरा है जो भारत का व्यापार घाटा और बिगाड़ देगी जिससे भारतीय एल्युमीनियम उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एल्युमीनियम पर अमेरिका द्वारा शुल्क बढ़ाने और रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के ताजा वैश्विक घटनाक्रम के परिणामस्वरूपभारतीय एल्युमीनियम उद्योग भारी खतरे का सामना कर रहा है। इसके बाद चीन ने भी अमेरिकी कबाड़ पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाया था।
 
भारत के एल्युमीनियम उद्योग को डर है कि अगर उत्पादन के मूल स्थान वाले नियम (आरओओ) की अनदेखी खत्म नहीं की जाती है तो चीन देश में अपने उत्पादों की डंपिंग कर सकता है। सूत्र ने कहा कि आरओओ मानदंड की अनदेखी से चीन के आयात में वृद्धि हो सकती है। इसलिए भारत में सस्ता आयात रोकने के लिए आरओओ के कड़े मानदंड की आवश्यकता है। दरअसल भारत को पिछले एफटीए से बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिला है। भारत से एफटीए भागीदारी वाले देशों को किए जाने वाले निर्यात की तुलना में इन देशों से भारत में आयात अधिक रहा है। संबंधित एफटीए पर हस्ताक्षर के बाद से आसियान, कोरिया और जापान के साथ व्यापार घाटा लगभग दोगुना हो चुका है।
 
चीन के साथ भी भारत का व्यापार संतुलन काफी हद तक चीन के पक्ष में है। नीति आयोग के आंकड़े बताते हैं कि चीन से भारत में एल्युमीनियम आयात भारत से चीन को निर्यात की तुलना में करीब 30 गुना ज्यादा है। संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 63 अरब डॉलर (जुलाई 2018 तक) रहा जो वैश्विक व्यापार घाटे का 40 प्रतिशत है। संसदीय पैनल को लगता है कि आयात के कुछ मामलों में डंपिंगरोधी और काउंटरवेलिंग शुल्क जैसे व्यापारिक उपाय प्रभावी नहीं हैं। ऐसा लग रहा है कि चीनी आपूर्तिकर्ता उन देशों के बाजार के जरिये उत्पाद भेज रहे हैं जिनके साथ भारत का एफटीए है। 
Keyword: aluminium, export, import, LME,,
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