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बंगाल में लुभावनी सरकारी योजनाएं नाकाम

नम्रता आचार्य / कोलकाता May 24, 2019

ममता बनर्जी सत्ता में आने के बाद समय-समय पर प्रशासनिक समीक्षा बैठक करती रहती हैं, जिसे लेकर सरकारी अधिकारी और जिला स्तर के राजनेता डरे रहते हैं। इन बैठकों के बाद कुछ लोगों के नाम पुकारे जाते हैं और उन्हें आम तौर पर सरकारी विकास कार्यों की प्रगति रिपोर्ट पर शीर्ष सरकारी अधिकारियों और पार्टी कार्यकर्ताओं को फटकार लगाते हुए देखा जाता है, जबकि उस समय सीधा मीडिया प्रसारण होता रहता है।  ये समीक्षा बैठक बनर्जी की काम करने की शैली का अहम हिस्सा हैं। ये बैठक उनके लिए ग्रामीण आबादी से सीधे जुडऩे का माध्यम हैं। वह नवंबर, 2018 तक ऐसी 430 बैठक कर चुकी हैं। बंगाल में तृणमूल के शासन को करीब 8 साल हो गए हैं। राज्य सरकार के सभी बजटों में ग्रामीण क्षेत्र पर जोर रहा है। फिर भी पार्टी को ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी हार का सामना करना पड़ा है, जबकि वह शहरी सीटों पर पकड़ बनाए रखने में कामयाब रही है। 

 
विश्लेषकों के मुताबिक इन चुनावों में ज्यादातर मतदान धार्मिक आधार पर हुआ है, इसलिए बनर्जी का ग्रामीण क्षेत्रों पर ध्यान अप्रासंगिक हो गया। पश्चिम बंगाल में पिछले 8 वर्षों में जिन विभागों को सबसे ज्यादा धन मिला है, उनमें कृषि, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, अल्पसंख्यक विकास, स्वास्थ्य, स्कूल शिक्षा और महिला विकास शामिल हैं। इसकी असल तस्वीर आंकड़े पेश करते हैं।  राज्य के वित्त मंत्री अमित मित्रा ने जब 2012-13 में तृणमूल सरकार का पहला बजट पेश किया था, तब कृषि बजट 315 करोड़ रुपये था। यह वर्ष 2019-20 के बजट में बढ़कर 6,086 करोड़ रुपये हो गया। केंद्र की राजग सरकार द्वारा किसानों को सालाना 6,000 रुपये देने की योजना की घोषणा से करीब एक महीने पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने किसानों को प्रति एकड़ 5,000 रुपये दने की घोषणा की थी। इसके साथ ही 2 लाख रुपये की जीवन बीमा योजना मुहैया कराई गई। 
 
इस योजना का लाभ राज्य के करीब 7,20,000 किसानों को मिला है। इस साल फरवरी में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घोषणा की थी कि राज्य बांग्ला फसल बीमा योजना के पूरे प्रीमियम का बोझ उठाएगा। यह योजना केंद्र की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का देसी संस्करण है। पहले राज्य प्रीमियम का 80 फीसदी भुगतान करता था, जबकि 20 फीसदी भार केंद्र उठाता था। तृणमूल को बर्दवान और हुगली के कृषि प्रधान क्षेत्र में हार का सामना करना पड़ा है। तृणमूल के शासन के दौरान स्कूली शिक्षा के बजट में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। यह वर्ष 2012-13 में 2,713 करोड़ रुपये था, जो 2019-20 में 27,541 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। राज्य की कन्याश्री योजना के तहत लड़की के 18 साल की होने और अपनी पढ़ाई जारी रखने पर 25,000 रुपये का एकबारगी अनुदान दिया जाता है। 
 
पंचायत एवं ग्रामीण विकास में पश्चिम बंगाल का बजट आवंटन तृणमूल के शासन में 2,716 करोड़ रुपये से 20,422 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। राज्य की ताजा आर्थिक समीक्षा के मुताबिक राज्य के स्वच्छता अभियान-मिशन निर्मल बांग्ला के तहत राज्य में 99 फीसदी घरों में शौचालय बन गए हैं, जो पहले 55 फीसदी परिवारों के पास ही थे। यह योजना केंद्र के स्वच्छ भारत अभियान से काफी पहले वर्ष 2013 में शुरू की गई। पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक विकास एवं मदरसा शिक्षा के लिए बजट आवंटन 2012-13 में 570 करोड़ रुपये था, जो 2018-19 में करीब 4,017 करोड़ रुपये हो गया। बनर्जी को अपने इस दांव का फायदा भी मिला है।  स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के लिए भी बजट इन 8ï ïवर्षों में 1,049 करोड़ रुपये से बढ़कर 9,557 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।
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