बिजनेस स्टैंडर्ड - 'खान मार्केट गैंग' की मुश्किलें और मोदी की नाखुशी
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'खान मार्केट गैंग' की मुश्किलें और मोदी की नाखुशी

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  May 24, 2019

पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने देश की राजधानी में स्थित एक खास जगह जाने वाले लोगों के 'गैंग' से खुद को अलग करने की कोशिश की। आखिर इस गैंग के बारे में कौन सी बात प्रधानमंत्री को इतना असहज कर देती है कि एकसमान सोच रखने वाले इस समूह को अपने खिलाफ मानने लगते हैं? 'द इंडियन एक्सप्रेस' में प्रकाशित साक्षात्कार से पता चलता है कि वह खान मार्केट के सभी निवासियों को समृद्ध, उदार, पश्चिमी शैली में ढले अभिजन मानते हैं जो उनका और उनकी शैली की राजनीति का तिरस्कार करते हैं। 

 
दुनिया के सबसे महंगे 25 स्थानों में शामिल खान मार्केट में लोग महंगे ब्रांड के उत्पाद खरीदने या महंगे रेस्टोरेंट में खाने-पीने जाते हैं। ऐसे में यह कहना लाजिमी है कि उन लोगों का ध्यान राजनीति पर सबसे कम ही होता है। खान मार्केट में खानपान की कोई भी ऐसी जगह नहीं है जो कॉलेज स्ट्रीट के मशहूर कॉफी हाउस या लेफ्ट बैंक कैफे से मिलता-जुलता हो। एक समय था जब इन जगहों पर बौद्धिक एवं सत्ता-विरोधी विमर्श लगभग अनिवार्य होता था। अगर प्रधानमंत्री ने यह निष्कर्ष निकाला है कि खान मार्केट के ग्राहकों की वजह से वे नहीं बने हैं और उनका मत मिलने की उन्हें संभावना भी नहीं है। ऐसे में हमें यह मान लेना चाहिए कि मोदी या उनके पार्टी सहयोगियों ने यह राय बनाने के लिए बाकायदा इस जगह का सर्वे किया होगा।
 
इसके बावजूद मोदी का इस बाजार को अपने वोटबैंक में एक ब्लैंक चेक के रूप में रखना तरस की बात है। अगर उन्होंने अपने गृह-राज्य गुजरात की तरह खान मार्केट के लिए भी अपना उत्साही रवैया दिखाया होता तो उन्हें निस्संदेह इन तथाकथित उदार कुलीनों से भी कुछ तगड़ा समर्थन मिला होता। विभाजन के बाद पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से आए शरणार्थियों की बस्ती रहे इस बाजार ने खरीदारी के लिए देश के सबसे महंगे एवं फैशनपरस्त जगह के रूप में कनॉट प्लेस को पीछे छोड़ दिया है। इसे 21वीं सदी में यह पहचान मिलना भी एक विडंबना ही है क्योंकि इसे 'सीमांत गांधी' खान अब्दुल गफ्फार खां के सीधे-सादे भाई खान अब्दुल जब्बार खां के नाम पर खान बाजार नाम मिला था।
 
खान मार्केट को यह दोहरी प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए कीमत भी चुकानी पड़ी है। अच्छी जगह पर मौजूद होने के साथ ही यह बाजार उदारीकरण के बाद शहरी अभिजात्य वर्ग की मांग पूरी करने का जरिया भी बना। शोरगुल से परेशान होकर और आसमान छूते किराये के लालच में आकर यहां के निवासियों ने अपने घरों को दुकानों एवं रेस्टोरेंट को किराये पर दे दिया। इससे नए एवं रोमांचक स्थान देखने को मिले लेकिन उसी के साथ कुछ नकारात्मक बातें भी हुई हैं। आज खान मार्केट जाने वाला कोई भी व्यक्ति ट्रैफिक जाम में फंस जाएगा। इसकी वजह यह है कि कारें दुकानों-रेस्टोरेंट तक सवारियों को उतारने के लिए पहुंचती हैं। इस बाजार का प्रबंधन संभालने वाले संगठन ने पार्किंग की समस्या दूर करने के लिए पेड सर्विस के साथ मुफ्त पार्किंग शुरू कर दी लेकिन इससे खान मार्केट गैंग के सदस्यों के हतोत्साहित होने की संभावना कम ही है।
 
खान मार्केट में आग लगने का खतरा भी अधिक गंभीर समस्या बन गया है। लकड़ी की संकरी सीढिय़ों और चौड़ी खिड़कियों से बनी अधिकांश इमारतें अब सजे-धजे रेस्टोरेंट में तब्दील हो चुकी हैं। आग लगने की स्थिति में बचाव एवं राहत के उपाय कुछ रेस्टोरेंट में ही नजर आते हैं। लुटियंस दिल्ली (मोदी को चिढ़ पैदा करने वाली एक और जगह) के अधिकांश इलाके की ही तरह खान मार्केट भी नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) के अधिकार क्षेत्र में आता है। एनडीएमसी की प्रशासनिक परिषद में केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों का ही बहुमत होता है। यह निकाय अग्नि सुरक्षा मानकों को लागू करने में ढिलाई बरतता रहा है। उच्चतम न्यायालय ने तीखी टिप्पणी भी की थी कि समृद्ध लोगों को कानून प्रवर्तन से छूट दी जा रही है।
 
इन सबका मोदी से क्या लेना-देना है? सीधी सी बात है। यह बाजार प्रधानमंत्री निवास से महज 3.5 किलोमीटर दूर है। वह अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के हिसाब से यहां की सड़कों के नाम बदलने में उत्साही रहे हैं। लेकिन इस बाजार की बुनियादी ट्रैफिक समस्या और सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए एनडीएमसी को निर्देश देना मोदी के प्रत्यक्ष अधिकार में है। अगर यहां की दुकान या रेस्टोरेंट में आग लगती है तो वहां धनी लोगों के साथ आम कामगार भी चपेट में आएंगे। मोदी अगर अपने अच्छे दोस्त शी चिनफिंग से मिलने अगली बार चीन जाएं तो उन्हें शिनथ्यांदी भी जाना चाहिए। खरीदारी एवं मनोरंजन के ठिकानों से भरपूर इस जगह को शांघाई का खान मार्केट कहा जा सकता है। शिनथ्यांदी में भी कुछ सबसे महंगी रियल एस्टेट प्रॉपर्टी और फैशनेबल प्रतिष्ठान हैं। लेकिन यह समानता यहीं पर खत्म हो जाती है। इस संकरे गलियारे में दुकानों एवं रेस्टोरेंट की भरमार है लेकिन सरकार ने शहरी नवीनीकरण योजना चलाकर यहां के कुछ पुराने घरों का जीर्णोद्धार भी करवाया है। लेकिन खान मार्केट के उलट शिनथ्यांदी में रहने वाले परिवारों को सरकार ने दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर किया था। यह एक कार-मुक्त जगह है जहां घूमते समय लोगों को हॉर्न सुनकर डरना नहीं पड़ता है।
 
संक्षेप में, शिनथ्यांदी एक शांत एवं समृद्ध इलाका है जो माओत्से तुंग के बाद लागू 'चीनी शैली के पूंजीवाद' की खूबियों को बयां करता है। खान मार्केट को शिनथ्यांदी बनाने के लिए बहुत कुछ नहीं करना है, बस थोड़ी काल्पनिकता के साथ शहरी नियोजन करने की जरूरत है। निश्चित रूप से, इनमें से कुछ भी ऐसे प्रधानमंत्री की क्षमताओं से बाहर नहीं है जिसने वाराणसी को स्वच्छ बनाने के लिए सदियों पुरानी तंद्रा को सिर्फ पांच वर्षों में ही तोड़ दिया है। अगर वह खान मार्केट में अपना बदलावकारी जादू दिखाने का फैसला करते हैं तो उन्हें खान मार्केट गैंग से अधिक अजनबीपन भी नहीं महसूस होगा। 
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