बिजनेस स्टैंडर्ड - नई सरकार की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती
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नई सरकार की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती

तमाल बंद्योपाध्याय /  May 24, 2019

बैंकिंग क्षेत्र की मौजूदा समस्या के केंद्र में तरलता संकट से अधिक बैंकों की जोखिम-विमुखता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इस समस्या की गंभीरता पर रोशनी डाल रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
एक वरिष्ठ बैंकर ने हाल ही में कहा कि परंपरागत तौर पर मुख्य क्षेत्र वित्तीय क्षेत्र की सेहत प्रभावित करता है लेकिन अब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था में वित्तीय क्षेत्र की चिंताएं मुख्य क्षेत्र पर भारी पड़ती दिख रही हैं। उनकी इस बात से मेरी चाची सहमत नजर आती हैं। 'कैसेंड्रा' पुकारे जाने का जोखिम होते हुए भी वह कहती हैं कि अगर नई सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस दिशा में युद्ध स्तर पर प्रयास नहीं करते हैं तो हालात काफी खराब हो जाएंगे।  क्या सरकार और बैंकिंग नियामक का रुख नकारात्मक रहा है? ऐसा नहीं है लेकिन उन्हें जल्द कदम उठाने की जरूरत है। इसकी वजह जानने के लिए भारतीय वित्तीय क्षेत्र में घट रही घटनाओं पर एक फौरी नजर डालते हैं।
 
गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी (एनबीएफसी) उद्योग बैंकों से कहीं अधिक तेजी से बढ़ता रहा है लेकिन आज यह बेहाल है क्योंकि परिसंपत्ति एवं जवाबदेही के बीच तालमेल नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि मुद्दा परिसंपत्ति गुणवत्ता का है। गत पांच वर्षों में एनबीएफसी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर 17 फीसदी रही है जबकि बैंकिंग क्षेत्र की दर 9.4 फीसदी रही है। आवासीय वित्त कंपनियां 20 फीसदी की दर से बढ़ती रही हैं। पिछले साल के मध्य तक एनबीएफसी का कुल ऋण बाजार करीब 28.5 लाख करोड़ रुपये था जो बैंकिंग परिसंपत्तियों का तिहाई हिस्सा है। लेकिन अब यह कम होने लगा है। बैंक ऋण करीब 12.3 फीसदी की दर से बढ़ता रहा है जो पिछले दो वर्षों के 8.4 फीसदी से काफी अधिक है लेकिन इससे भी सही तस्वीर नहीं सामने आती है। पिछले कुछ वर्षों में ऋण स्थानापन्न के तौर पर एनबीएफसी ने कर्ज बांटे। बैंकों की अपेक्षाकृत उच्च ऋण वृद्धि भी इसकी भरपाई करने में नाकाम रही है। बैंक ऋण के घटकों पर बारीक निगाह डालने पर सब कुछ पता चल जाता है। बड़े उद्योगों को कर्ज 8.2 फीसदी की दर से बढ़ रहा है, सूक्ष्म एवं लघु इकाइयों को कर्ज 0.7 फीसदी और मझोली इकाइयों को कर्ज 2.6 फीसदी की दर से बढ़ा है। सवाल है कि बाकी पैसा कहां जा रहा है? बैंकिंग क्षेत्र का व्यक्तिगत कर्ज आवंटन करीब 18 फीसदी और आवासीय ऋण 19 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।
 
करीब 23 लाख करोड़ रुपये के आकार वाले म्युचुअल फंड उद्योग को डेट म्युचुअल फंड के नाते पसीने छूट रहे हैं। दरअसल डेट फंडों में अपने शेयरों को गिरवी रखने वाले कई भारतीय प्रवर्तकों का भी जुड़ाव है। इन गिरवी शेयरों की कीमतें गिर गई हैं जिससे फंड हाउस और खुद प्रवर्तक भी शेयरों को खुले बाजार में बेचने के लिए मजबूर हो गए हैं। कई एनबीएफसी की भी हालत कुछ ऐसी ही है।  बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के आंकड़े बताते हैं कि प्रवर्तकों के गिरवी रखे शेयरों का मूल्य अप्रैल के अंतिम हफ्ते में 2.25 लाख करोड़ रुपये था। बीएसई में सूचीबद्ध कुल 5,126 में से 2,932 कंपनियों के आधे से अधिक प्रवर्तकों ने इसी तरीके से पैसे जुटाए हैं। कई प्रवर्तकों के अपना स्वामित्व आधार कम करने की कोशिशों के चलते एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद को नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है।
 
इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) की नाकामी के बाद अधिकांश रेटिंग एजेंसियां या तो कवर के लिए भाग रही हैं या आक्रामक तरीके से कंपनियों की रेटिंग कम कर रही हैं। ऐसी सात एजेंसियां हैं। क्या उन सबको यह पता है कि जोखिम का आकलन कैसे किया जाता है? निश्चित रूप से, वे बैलेंस शीट के मायने समझने और लाभ एवं हानि के आंकड़े समझने में सक्षम हैं लेकिन उनमें बाजार संबंधी समझ की कमी है। इसीलिए वे चौंकाने वाली हरेक घटना के बाद हमेशा अपने दरवाजे बंद कर लेते हैं। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो रेटिंग एजेंसियों ने प्रवर्तक शेयरों के समर्थन वाले करीब 40,000 करोड़ रुपये मूल्य के डिबेंचरों की रेटिंग की है और डिबेंचर को डेट म्युचुअल फंड एवं एनबीएफसी के खातों में भी जगह मिल गई है। 
 
रिकॉर्ड के लिए, रेटिंग एजेंसियों ने आईएलऐंडएफएस प्रकरण के बाद पिछले दशक की तुलना में अधिक कंपनियों को निगरानी सूची में रखा है। वर्ष 2018-19 में 10 लाख करोड़ रुपये मूल्य के कॉर्पोरेट बॉन्ड को रेटिंग निगरानी में रखा गया था जो कुल कॉर्पोरेट कर्ज का करीब 10 फीसदी था। वर्ष 2017-18 में यह आंकड़ा 2 लाख करोड़ रुपये का था।  अगर अधिकारियों को त्वरित कार्रवाई के लिए बाध्य करने के वास्ते इतना काफी नहीं है तो कथित तरलता संकट का मुद्दा भी है। क्या तरलता संकट की स्थिति गंभीर है? कई लोग ऐसा ही मानते हैं। उनका कहना है कि तरलता संकट समूची कर्ज प्रणाली को अवरुद्ध कर देगा और 2 लाख करोड़ डॉलर वाली भारतीय अर्थव्यवस्था ठहर जाएगी। हालात की गंभीरता और इसके संभावित नतीजों से सहमत होते हुए भी मुझे लगता है कि तरलता संकट की धारणा अतिरंजित है। इस समस्या की जड़ में तरलता की कमी नहीं बल्कि बैंकों का जोखिम उठाने से बचना है।
 
इस महीने की शुरुआत में 1.3 लाख करोड़ रुपये रहा दैनिक प्रणालीगत तरलता घाटा करीब 30,000 करोड़ रुपये पर आ चुका है। आरबीआई दो बार में 10 अरब डॉलर के विनिमय के जरिये करीब 70,000 करोड़ रुपये जुटाकर इस मुद्दे को लगातार सुलझाने की कोशिश करता रहा है। आरबीआई ने मई में 25,000 करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड बेचे और अप्रैल में तरलता बढ़ाने के लिए बैंकों का तथाकथित तरलता कवरेज अनुपात बदला गया। लेकिन बैंक कर्ज देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उनकी राय में कई एनबीएफसी बैठ सकती हैं और वे अपना पैसा भी वापस नहीं पा सकेंगी। पिछले महीनों में दो बार ब्याज दरें कम करने के बावजूद अधिकांश एनबीएफसी ने अपनी कर्ज दरों में कटौती भी नहीं की है। सच तो यह है कि उन्होंने कर्ज की दरें बढ़ा दी हैं। जब मेरी चाची इसे भारत का लीमन क्षण बताती हैं तो मैं उनसे सहमत नहीं हो पाता लेकिन इन मुद्दों का समाधान नहीं करने पर हम उसी दिशा में बढ़ सकते हैं।
 
क्या कदम उठाए जाने चाहिए? एनबीएफसी, म्युचुअल फंड और रेटिंग एजेंसियों के कई हिस्से अपनी विश्वसनीयता गंवा चुके हैं। कुछ बैंकों की सेहत बहुत अच्छी नहीं है और बैंकिंग प्रणाली ने ऋण की कमी से जूझ रही कंपनियों से अपना मुंह मोड़ लिया है। वे केवल घर खरीदने एवं व्यक्तिगत ऋण के लिए ही धन दे रहे हैं। बुनियादी तौर पर वे भारत की वृद्धि का लाभ उठा रहे हैं। अब तक असंगठित क्षेत्र में रोजगारहीनता और नौकरियों की कटौती पर चर्चा होती रही है लेकिन संगठित क्षेत्र में भी नौकरियां कम होने पर बैंकों को खुदरा कर्जदारों की चूक का भी सामना करना होगा। यह ऊंट की पीठ पर रखा आखिरी तिनका साबित होगा।
 
लीमन संकट की चपेट में आने से पहले हमें कदम उठाने की जरूरत है। सरकार और आरबीआई को निर्णायक कदम उठाते हुए व्यवस्थागत पतन से बचाने के लिए काम करने होंगे। कुछ एनबीएफसी को कामकाज समेटने होंगे, कुछ बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड वाली कंपनियों को बैंक के रूप में तब्दील कर आरबीआई की निगरानी में लाया जा सकता है। हमें मात्रात्मक सुगमता (क्यूई) और संकटग्रस्त परिसंपत्ति राहत कार्यक्रम (टीएआरएफ) की भी जरूरत है।  आरबीआई संकटग्रस्त एनबीएफसी और बैंकों पर कड़ी नजर रखते हुए उन्हें अपनी परिसंपत्तियों को हटाने के लिए बाध्य कर सकता है ताकि उनका समुचित बाजार मूल्य मिले और सरकार उनमें रकम डाल सके। अगर ढांचा सही है तो सरकार टीएआरएफ की हालत सुधरने के बाद उससे खासा लाभांश बटोर सकती है। 
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं।)
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