बिजनेस स्टैंडर्ड - बासमती निर्यातकों ने ईरान की खेपें रोकीं
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बासमती निर्यातकों ने ईरान की खेपें रोकीं

वीरेंद्र सिंह रावत / लखनऊ May 23, 2019

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील न मिलने और लंबे समय से चल रहा गतिरोध बिगडऩे के कारण भारतीय बासमती निर्यातक भुगतान की अदायगी न होने या उसमें देरी होने के डर से ईरान की खेप रोक रहे हैं। भविष्य में किए जाने वाले निर्यात और ईरान से आयात पर स्पष्टïता में कमी के साथ-साथ भुगतान को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के कारण निर्यातक ईरान के व्यापारियों के साथ निर्यात के अपने वादे पूरे करने में परेशानी महसूस करने लगे हैंं। कोहिनूर फूड्स के संयुक्त निदेशक गुरनाम अरोड़ा ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि जब तक निर्यात की शर्तों के संबंध में ईरान सरकार के साथ कोई नया समझौता नहीं होता है, तब तक हमने खेप रोककर रखने का फैसला किया है क्योंकि भुगतान में चूक होने या पैसा फंसने का डर है।

 
हालांकि इस बाबत अटकी हुई खेपों के पुख्ता आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन फिर भी फिलहाल यह संख्या 20,000-30,000 टन आंकी जा रही है और अगर हालात ऐसे ही बने रहते हैं तो भविष्य में यह संख्या बढऩे की संभावना है। पिछले साल ईरान को बासमती चावल निर्यात करीब 10 लाख टन रहा था लेकिन इस साल यह 40 प्रतिशत इजाफे के साथ करीब 14 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने तो अपनी रिपोर्ट में यहां तक पूर्वानुमान लगाया था कि ईरान के प्रमुख बाजार में आयात की दोबारा शुरुआत होने से प्रेरित होकर अगली कुछेक तिमाहियों में निर्यात बाजार की मांग स्थिर रहेगी। अमेरिकी प्रतिबंधों के मद्देनजर ईरानी कच्चे तेल के भारतीय आयात के संबंध में असमंजस की स्थिति खत्म होने से भारतीय बासमती निर्यातकों की दुविधा बढ़ गई है। इससे पहले केंद्र ने भारत यात्रा पर आए ईरानी विदेश मंत्री को लोकसभा चुनाव के बाद इस मसले पर ध्यान देने के लिए कहा था। उन्होंने कहा था कि अब तक हमारा निर्यात रुपये में रहा और तेल के बदले वस्तु विनिमय व्यापार होता था लेकिन अब मामले में पूरी तरह से भ्रम है। इसलिए निर्यातकों को सलाह दी गई है कि जब तक कुछ स्पष्टïता न हो जाए तब तक वे अपनी-अपनी खेपों को रोके रखें।
 
हालांकि उपज में कमी के कारण घरेलू बाजार में बासमती की कमी को देखते हुए कम से कम अल्पावधि में तो निर्यातकों को ज्यादा चिंता नहीं है। अरोड़ा ने बताया कि अगर ईरान के साथ हुए अनुबंध पूरे नहीं होते हैं तो अपनी खेप अन्य गंतव्यों को भेज सकते हैं। इसके अलावा इस सीजन में कम आपूर्ति की वजह से बासमती बाजार में कुछ तेजी देखी गई है। निर्यातकों को ईरान सहित अयात-निर्यात के संबंध में नई सरकार के गठन और इसके नीतिगत रुख का इंतजार है। इक्रा के सहायक उपाध्यक्ष दीपक जोतवानी ने कहा, 'हालांकि ईरान के साथ व्यापार पर कोई प्रतिबंध नहीं है, फिर भी निर्यात की निरंतरता और भुगतान के मसलों पर स्पष्टता का अभाव है। हमें उम्मीद है कि केंद्र में नई सरकार के साथ इन मसलों को सुलझा लिया जाएगा।' हालांकि उन्होंने दावा किया है कि ईरान के साथ बासमती व्यापार का अस्थायी निलंबन भी बाजार को प्रभावित करेगा क्योंकि ईरान भारतीय बासमती चावल का प्रमुख गंतव्य है। काफी कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि ईरान भारत से इस जिंस केआयात के संबंध में क्या निर्णय लेता है।
 
कुछ सप्ताह पहले तक इस सीजन में बासमती का निर्यात 30,000 करोड़ रुपये (विनिमय दर 70 रुपये के हिसाब से) के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। हालांकि बासमती निर्यात का दायरा काफी विस्तृत है, फिर भी सबसे ज्यादा निर्यात की जाने वाली पूसा 1121 किस्म का खरीद मूल्य 2018-19 के मौजूदा सीजन में 8.5 प्रतिशत वृद्धि के साथ 35,000-38,000 रुपये प्रति टन रहा है जबकि 2017-18 के दौरान यह 33,000-35,000 रुपये प्रति टन था। हालांकि अप्रैल-जनवरी 2018-19 के दौरान बासमती निर्यात की प्राप्ति 14 प्रतिशत की ऊंची अनुपात दर से बढ़कर 74,000 रुपये प्रति टन से अधिक हो गई जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 65,000 रुपये प्रति टन थी। वृद्धि की इस रफ्तार को जारी रखते हुए भारत ने 2018-19 के पहले 10 महीने के दौरान 4.10 अरब डॉलर मूल्य का बासमती निर्यात किया जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 3.68 अरब डॉलर की तुलना में करीब 12 प्रतिशत अधिक रहा।  बासमती धान के दाम 2016-17 और 2017-18 के दो वित्त वर्ष में अधिक रहे हैं जबकि रकबे में कमी की वजह से मॉजूदा सीजन में बासमती उत्पादन में पांच प्रतिशत तक की कमी आई है।
Keyword: agri, farmer, crop, rice, basmati,,
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