बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी की दोबारा ताजपोशी में खाई और मौका दोनों निहित
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मोदी की दोबारा ताजपोशी में खाई और मौका दोनों निहित

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 23, 2019

सत्रहवीं लोकसभा के लिए सात चरणों में संपन्न आम चुनाव के परिणामों के बाद नरेंद्र मोदी का दोबारा प्रधानमंत्री बनना तय है। एग्जिट पोल आने के अगले ही दिन शेयर बाजारों के सूचकांकों में करीब चार फीसदी की उछाल आ गई थी। गुरुवार को चुनाव परिणाम आने के दिन भी सेंसेक्स ने कारोबार के दौरान 40,000 अंक की रिकॉर्ड ऊंचाई हासिल कर ली। यह नई सरकार से लगी बाजार की आस को बयां करती है।  ऐसे में अगली सरकार में पदासीन लोगों को जनता की अपेक्षाओं के प्रति सतर्क रहना होगा और उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि किन बातों से परहेज करना है। इस लेख में नई सरकार के समक्ष मौजूद अवसर के साथ ही उसके सामने मौजूद खाई पर भी रोशनी डालने की कोशिश की गई है।

 
सबसे पहले उस खाई की बात करते हैं जिससे नई सरकार को जरूर बचना चाहिए। राजकोषीय मजबूती के लिए केंद्र की तरफ से उठाए गए कदम मोदी के पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल का अहम बिंदु रहे हैं। हालांकि यह और बेहतर हो सकता था लेकिन सरकार के राजकोषीय घाटे का 2013-14 के 4.5 फीसदी से घटकर 2018-19 में जीडीपी के 3.4 फीसदी पर आ जाना भी अच्छा सुधार दिखाता है। वर्ष 2017-18 के बाद सुधार की रफ्तार में खासी गिरावट आई है। आलोचक यह भी कहेंगे कि राजकोषीय घाटे में कमी की गुणवत्ता संदेहास्पद है लेकिन कुल मिलाकर यह रुझान आश्वस्त करने वाला है। 
 
मोदी को अपने दूसरे कार्यकाल में इससे जरूर परहेज करना चाहिए कि सरकार के राजकोषीय सशक्तीकरण की कोशिशों में कोई भी ढील न दी जाए। वर्ष 2020-21 तक राजकोषीय घाटा कम करते हुए जीडीपी के तीन फीसदी तक लाने का लक्ष्य किसी भी ठहराव के बगैर हासिल कर लिया जाना चाहिए। जुलाई 2014 में वित्त मंत्री अरुण जेटली के समक्ष यह विकल्प था कि मनमोहन सरकार के समय पेश अंतरिम बजट में राजकोषीय घाटे को 4.1 फीसदी रखने के लक्ष्य को तिलांजलि दे दी जाए। वह पिछली सरकार को अवास्तविक महत्त्वाकांक्षी राजकोषीय लक्ष्य रखने का दोषी ठहरा सकते थे जिससे अधिक व्यय की गुंजाइश बन जाती। लेकिन जेटली ने उस राह पर चलने के बजाय पुरानी सरकार के लक्ष्य पर ही खरा उतरने की मुश्किल चुनौती स्वीकार की। उससे मोदी सरकार के राजकोषीय सशक्तीकरण प्रयासों की दशा एवं दिशा तय हो गई।
 
अब वर्ष 2019 में तो राजकोषीय मजबूती की जरूरत और भी बढ़ गई है। अगली सरकार को न केवल वर्ष 2019-20 में राजकोषीय घाटे को 3.4 फीसदी रखने के लक्ष्य पर बने रहना चाहिए बल्कि उसे राजस्व व्यय में कटौती और कर प्रशासन एवं अनुपालन बेहतर कर घाटे में और कमी करने पर भी ध्यान देना चाहिए। अधिक अहम यह है कि उसे राजकोषीय घाटे को तीन फीसदी के मनचाहे लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक स्पष्ट एवं वास्तविक समयसीमा भी तय करनी चाहिए। राजकोषीय मजबूती की तगड़ी प्रतिबद्धता जरूरी है क्योंकि नई सरकार से वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए खर्च बढ़ाने की भारी मांग होगी। यह सच है कि आसन्न आर्थिक सुस्ती के घटकों का मुकाबला करने के लिए अधिक निवेश की जरूरत है। लेकिन ऐसी रणनीति अपनाने में दो खतरे भी हैं। पहला, व्यय बढ़ाने के नाम पर सरकार सब्सिडी एवं रियायतों जैसे फालतू, अक्षम एवं बुरी तरह से लक्षित व्यय को बढ़ावा दे सकती है। दूसरा, व्यय में बढ़ोतरी का मतलब सरकारी उधारी में तेजी होगा। इससे निजी क्षेत्र उधारी बाजार से बाहर हो जाएगा और ब्याज दरेें भी बढ़ जाएंगी। इन दोनों खतरों से बचा जा सकता है। नई सरकार को यह बात भी माननी होगी कि 2019-20 के अंतरिम बजट में राजस्व के आंकड़े पहले से ही काफी महत्त्वाकांक्षी वृद्धि दरों को परिलक्षित करते हैं। वर्ष 2018-19 में राजस्व संग्रह में आई कमी के मद्देनजर मौजूदा साल में कॉर्पोरेट टैक्स संग्रह 15 फीसदी तक बढऩे के आसार हैं और व्यक्तिगत आयकर संग्रह भी 32 फीसदी तक बढऩे की संभावना है (वर्ष 2018-19 में यह केवल नौ फीसदी ही बढ़ा था)। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष मंदी की चुनौती देखते हुए राजस्व के इन आंकड़ों को हासिल करना काफी चुनौतीपूर्ण होगा।
 
राजकोषीय मजबूती की कीमत पर व्यय में वृद्धि की योजना बनाना भी खतरनाक होगा। यह सच है कि वर्ष 2019-20 के लिए सरकार का कुल पूंजीगत व्यय मामूली गिरावट के साथ 9.54 लाख करोड़ रुपये होगा जबकि वर्ष 2018-19 में 9.61 लाख करोड़ रुपये रहा था। सरकार का पूंजीगत व्यय आदर्श रूप से बढऩा चाहिए लेकिन इस विकल्प की तरफ तभी देखा जा सकता है जब घाटे में और वृद्धि रोकने के लिए तमाम दूसरे तरह के राजस्व व्ययों में खासी कटौती की जाए।   सवाल है कि अगले कुछ महीनों में नई सरकार को कौन-सा मौका झपट लेना चाहिए? उसे जल्द-से-जल्द सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार का एजेंडा अपनाना चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार का मतलब केवल सरकारी-स्वामित्व वाली इकाइयों में सरकारी हिस्सेदारी का विनिवेश ही नहीं है, उसमें गैर-रणनीतिक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों का निजीकरण, अव्यवहार्य हो चुकी घाटा उठाने वाली इकाइयों को बंद करना और सार्वजनिक क्षेत्र के अधिक बैंकों का विलय भी है। बंद किए जाने वाले या निजीकरण किए जाने वाले सार्वजनिक उपक्रमों की सूची पहले से ही नीति आयोग के पास है। सार्वजनिक बैंकों के विलय का अगला चरण बिना किसी देरी के चलाया जाए। नई सरकार अपने कार्यकाल के शुरुआती महीनों में आसानी से ऐसे कदम उठा सकती है। राज्यों में विधानसभा चुनावों का अगला चरण सितंबर 2019 के बाद ही शुरू होगा। यानी नई सरकार पर अगले चार महीनों में किसी भी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं होगा। नई सरकार को यह मौका झपट लेना चाहिए।
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