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मोदी-शाह ने कांग्रेस और अन्य दलों को पीछे छोड़ा

चुनाव की बात
शेखर गुप्ता /  May 23, 2019

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों से नजर आने वाले बिंदु मेरे हिसाब से इस तरह हैं:

 
1. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस दोनों ने ही बुनियादी तौर पर अलग रणनीतियों पर चुनाव लड़ा। भाजपा इसे राष्ट्रपति-शैली का चुनाव बनाना चाहती थी। वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इसे 543 सीटों पर अलग-अलग लड़ा जाने वाला चुनाव बनाने की कोशिश की लेकिन वे नाकाम रहे। भाजपा इस राष्ट्रपति-शैली वाला चुनाव बनाने में पूरी तरह सफल रही और उसमें केवल एक उम्मीदवार नरेंद्र मोदी थे। 
 
2. कांग्रेस जाल में बुरी तरह फंस गई। उसने सांकेतिक रूप से भी विकल्प पेश करने की जहमत नहीं उठाई और उसके हमले केवल मोदी तक ही केंद्रित रहे। समस्या यह है कि दुश्मन की ताकत से मुकाबला करना कठिन होता है। आपके पास कोई विश्वसनीय संदेश नहीं होने पर यह कदम दु:साहसी भी हो सकता है। इसके जवाब में कांग्रेस ने जो डेढ़ जुमले उछाले, वे भी पार्टी के समर्पित मतदाताओं के सिवाय दूसरों में उत्साह नहीं भर सके। चौकीदार चोर है (पूरा) और राफेल (आधा) के जरिये कांग्रेस मोदी को भ्रष्ट ठहराना चाहती थी। राहुल का अपनी सभाओं में लगने वाले 'चोर' नारे को जनमत में बदलाव का प्रतीक समझ लेना रीट्वीट को वोट समझने जैसा है।
 
3. 'प्यार और सहिष्णुता' की बात सुनने में अच्छी और सुकूनदायक लगती है लेकिन यह भक्तों की मंडली में ही अच्छा लगता है। मतदाताओं को एक सकारात्मक विकल्प चाहिए। कांग्रेस और राहुल ने न्याय योजना पेश की लेकिन वह काफी जटिल और देर से लाई गई थी। चुनाव अभियान के दौरान 10 हफ्तों के अपने भ्रमण के दौरान मुझे एक भी ऐसा लक्षित मतदाता नहीं मिला जिसे इसके बारे में पता भी हो। आंकड़ों के मुताबिक करीब आधे मतदाताओं को न्याय योजना के बारे में पता था लेकिन वे लोग समाज के ऊपरी तबके के लोग थे। इसका मतलब है कि जिन लोगों के लिए यह योजना लाने की बात कही गई, उन्हें इसके बारे में जानकारी ही नहीं थी।
 
4. अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने गठबंधन बनाने का काम काफी अच्छे ढंग से अंजाम दिया। किसी मुकाबले में सबसे आगे रहने वाला एक सशक्त चुंबक की तरह काम करता है। लेकिन मोदी-शाह ने बड़ा दिल भी दिखाया। बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी को अधिक सीटें देना इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। इसकी तुलना उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में कांग्रेस के तेवर से कीजिए। भाजपा ने भविष्य पर नजर रखते हुए गठबंधन किए जबकि कांग्रेस अपने गौरवशाली अतीत से ही चिपकी रही। 
 
5. केरल और पंजाब को छोड़कर बाकी सभी जगहों पर भाजपा का रथ रोकने का काम क्षेत्रीय दलों ने किया है। इनमें तमिलनाडु भी शामिल है। केरल में भाजपा ने अभी दस्तक देनी शुरू ही की है लेकिन वामदलों के पराभव से उसका रास्ता बनने लगा है। पंजाब में कांग्रेस को यह कड़वा संदेश मिला कि राज्य का एक मजबूत नेता लहर को भी रोक सकता है। इसने भाजपा की वह रणनीति आसान कर दी: सीधे उन राज्यों पर धावा बोलो जहां कांग्रेस मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। बाकी राज्यों में क्षेत्रीय दलों से गठजोड़ बनाओ। आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना में टीआरएस पर नजर रखें। ओडिशा में नवीन पटनायक के साथ आधी बात बन ही चुकी है।
 
6. आप काफी तर्कसंगत ढंग से मीडिया को दोष दे सकते हैं। भाजपा ने अपने मीडिया संगठन खड़ा करने या उन्हें खरीद लेने के लिए अपनी राजनीतिक ताकत का बेहतरीन इस्तेमाल किया और बाकी मीडिया संगठनों को वस्तुनिष्ठ बने रहने के लिए बाध्य कर दिया। इसके बावजूद कांग्रेस के पास कहने के लिए क्या था? राहुल ने बड़े मीडिया समूहों को साक्षात्कार चुनाव के अंतिम चरणों में दिए। इन साक्षात्कारों को देखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह साफ था कि कांग्रेस ट्विटर पर असर और अपने समर्थकों की तारीफ को लेकर भ्रम पालकर बड़ी गलती कर रही है।
 
7. मोदी के आलोचक कभी भी उन्हें इसका श्रेय नहीं देंगे लेकिन उनकी सरकार प्रमुख कल्याण कार्यक्रम चलाने में काफी असरदार रही। अपने हालिया लेखों में मैंने कहा था कि संप्रग-2 की तुलना में अर्थव्यवस्था एवं आधारभूत ढांचे के मोर्चे पर मोदी सरकार का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। मेरी राय में अखिल भारतीय स्तर पर अगड़ी जातियों का वोट बैंक निचली जातियों एवं अल्पसंख्यक गठजोड़ को काउंटर करता है। महंगाई दर काफी कम रहने से भी रोजगार की कमी एवं निजी आर्थिक दुश्वारियों से पार पाने में मदद मिली।
 
8. गत पांच वर्षों में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में जीत के अलावा गुजरात में मोदी को परेशान कर देना कांग्रेस की मुख्य उपलब्धियां थीं। इससे दो बातें साफ थीं: पहली, ग्रामीण एवं कृषि क्षेत्र का संकट भाजपा मतदाताओं पर चोट कर रहा है और दूसरी, इसका कोई फौरी हल न होने से मोदी राष्ट्रवाद, हिंदुत्व एवं भ्रष्टाचार से जंग के तीन-सूत्री अभियान पर लौट आएंगे। उसमें भी राष्ट्रवाद को केंद्रीय भूमिका मिलनी थी और इस पर उनके सभी चुनौतीकर्ता नाकाम रहे। अभी नवजात भारतीय राष्ट्रवाद का मुकाबला यूरोपीय वामपंथ की सोच से नहीं किया जा सकता है। देशद्रोह कानून खत्म करने, अफस्पा और आधार कानून को कमजोर करने का समर्थन करने वाले महानुभाव शायद किसी और देश में रह रहे थे। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी भौचक हो जाते। इन कानूनों को नरम करना संपादकीय नजर से अच्छा विचार है लेकिन फिर आपको मत भी संपादकों से ही लेने होंगे।
 
9. पिछले दशक में चुनाव प्रचार के दौरान मुझे युवाओं के मन में वंशवादी राजनीति एवं कुलीनता को लेकर एक तरह का विरक्ति भाव दिखा। गुजरात से लेकर त्रिपुरा तक और जम्मू से लेकर तिरुवनंतपुरम तक आम राय है कि राहुल गांधी एक अच्छे व्यक्ति हैं लेकिन उनके पास अनुभव नहीं है। अपनी पार्टी के सत्ता में रहते समय उन्होंने किसी मंत्रालय का दायित्व क्यों नहीं संभाला? गैर-प्रतिबद्ध मतदाता अधिक कटु हैं: राहुल अपने रहन-सहन एवं आजीविका के लिए पैसे कैसे जुटाते हैं? मैं भी एक प्रशिक्षित तैराक, पायलट, मार्शल आट्र्स ब्लैक बेल्ट होना पसंद करता लेकिन उसके लिए पैसे कहां से आएंगे? उनके पास पैसे कहां से आते हैं? हम एक दशक से कहते रहे हैं कि भारत में विचारधारा-पश्चात की पीढ़ी का उदय हो रहा है जिसमें लोग जमीन से उठे और अपने दम पर मुकाम बनाने वाले मोदी को कुलीन परिवार से जुड़े राहुल पर तरजीह देते हैं।
 
10. इस चुनाव में प्रियंका गांधी क्या कर रही थीं? वह मेहमान कलाकार की तरह थीं और कभी भी उन्हें रणनीतिक भूमिका नहीं दी गई। उत्तर प्रदेश में पुनर्जन्म की कांग्रेस की आसक्ति आत्मघाती है। प्रियंका ने भाजपा से सीधी लड़ाई वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में अधिक फर्क पैदा किया होता। वह कांग्रेस की सबसे सहज प्रचारक थीं लेकिन उन्हें पूर्वी यूपी में जाया कर दिया गया।
 
11. मोदी अपनी उपलब्धियों का लाभ उठा रहे हैं लेकिन राहुल उनका मुकाबला कर सकते हैं। राहुल ने क्या संप्रग-2 सरकार की उपलब्धियों को गिनाया? टी एन नाइनन ने अपने लेख में इसका जिक्र किया था। वर्ष 2009-14 के बीच 10 जनपथ ने एनएसी की गैर-संवैधानिक सत्ता के बूते अपनी ही सरकार को कमतर किया था क्योंकि उनके दरबारियों को मनमोहन सिंह का दूसरी बार सरकार बनाना रास नहीं आया था। मैंने उसे कांग्रेस की स्वत: प्रतिरक्षा जनित बीमारी बताया था और यह अब भी वैसे ही है। 
 
12. आखिर में, वामदलों के बारे में सोचिए। अपने पुराने किलों- पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा में उनका खाता भी नहीं खुला है। उसे मिली सीटों में तमिलनाडु का भी योगदान है जहां उसे कांग्रेस एवं द्रमुक का सहयोग मिला है।
 
सारांशत: परंपरागत समझ कहती है कि हारने वाला जीतने वाले से अधिक सीखता है लेकिन कांग्रेस और भाजपा के मामले में यह तर्क उलटा हो गया है।
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