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केरल में नहीं खिल पाया भाजपा का कमल

आर कृष्ण दास /  May 23, 2019

केरल में 23 अप्रैल को हुए एक चरणीय मतदान से ठीक तीन दिन पहले एक मैसेज ने तिरुवनंतपुरम स्थित भारतीय जनता पार्टी के राज्य मुख्यालय में निराशा की लहर फैला दी। पार्टी राज्य में हिंदु वोटों पर दांव लगा रही थी लेकिन अंतिम क्षणों में उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए।  केरल में कमल खिलाने की कोशिश में लगी भाजपा ने भरकस प्रयास किए लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। हालांकि राज्य में 15 सीटों के साथ कांग्रेस ने राहत की सांस ली होगी क्योंकि ये कांग्रेस को देशभर में किसी राज्य में मिली सबसे अधिक सीटे हैं। कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) को राज्य में 20 में से 19 सीटें मिली हैं। वहीं, राज्य में सत्तासीन माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा। केरल में भाजपा के विरोध में गए समीकरण राजनीतिकशास्त्रियों के लिए अध्ययन का विषय है। साल 2019 के आम चुनाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए प्रतिष्ठा का विषय था क्योंकि उसने अपना पूरा कैडर भाजपा के समर्थन में लगा दिया था। विशेषज्ञ बताते हैं कि 2019 के चुनावों में कई सीटों पर भाजपा के स्थान पर आरएसएस ही चुनाव लड़ रही थी। 

 
केरल में आरएसएस की मजबूत पकड़ के बाद भी भाजपा अपना खाता खोलने में भी नाकाम रही। इसका प्रमुख कारण रहा, नायर सर्विस सोसायटी (एनएसएस) द्वारा अपना रुख मोड़ लेना। एनएसएस राज्य में नायर समुदाय के लिए काम करता है जो केरल की कुल जनसंख्या का करीब 15 प्रतिशत है। राज्य में सबरीमाला विवाद के बाद हिंदु वोटों को एकजुट करने के प्रयासों के बीच एनएसएस ने राज्य के दो निर्वाचन क्षेत्रों, पथानामथिट्टा और तिरुवनंतपुरम में भाजपा को समर्थन देने का निर्णय किया था। पारंपरिक तौर पर नायर कांग्रेस को समर्थन देते रहे हैं और एनएसएस ने अपने समुदाय से शेष 18 सीटों पर पार्टी को समर्थन देने के लिए कहा था। 
 
राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रदीप नांबियर कहते हैं, 'एनएसएस ने खुद को भाजपा से काफी दूर कर लिया जिसके चलते राज्य में भाजपा की संभावनाएं काफी कम हो गई।' वह कहते हैं कि अगर एनएसएस का सहयोग बना रहता तो भाजपा अनुमानों के हिसाब से एक या 2 सीट जीत सकती थी।  भाजपा और आरएसएस कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की कमी भी इसका कारण रही है। एक दूसरे राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, 'आरएसएस कार्यकर्ताओं का एक हिस्सा सबरीमाला विवाद पर भाजपा के रुख से खुश नहीं थे।'
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