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समाचार चैनलों के दर्शकों और राजस्व की खातिर बदलाव जरूरी

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  May 22, 2019

खेल चैनलों के लिए इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल की वही अहमियत है जो न्यूज चैनलों के लिए चुनावों की है। चुनावों के दौरान न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या में भारी इजाफा होता है। अमूमन इन चैनलों में दर्शकों की संख्या तब बढ़ती है जब कोई हमला होता है या कहीं बम की खबर उड़ती है। लेकिन इन दो कारणों से हमेशा कमाई नहीं की जा सकती है। पहला यह कि आप इनका अनुमान नहीं लगा सकते हैं। दूसरा कारण यह कि विज्ञापन का समय बढ़ाने या राजस्व बढ़ाने की किसी और कोशिश से दर्शक चैनल से दूर हो सकते हैं। लेकिन चुनाव के दौरान बेहतर दरों और कमाई के लिए बेहतर योजना बनाई जा सकती है। 

 
गुरुवार तक हमें देश में हाल में संपन्न हुए आम चुनावों का नतीजा पता चल जाएगा। साथ ही यह पता भी चलेगा कि मतगणना के दिन न्यूज चैनलों पर दर्शकों की संख्या कितनी रही। न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या और चुनावों में क्या संबंध है, इसका पता लगाने के लिए बिज़नेस स्टैंडर्ड ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल यानी बार्क की मदद ली। उसने गुजरात और उत्तर प्रदेश में 2017 और मिजोरम, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों की मतगणना के दिन न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या पर नजर डाली। राजस्थान और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों की मतगणना मंगलवार को हुई थी। इससे पहले के चार मंगलवार हिंदी चैनलों के दर्शकों की औसत संख्या 10.3 करोड़ थी जो मतगणना के दिन 40.3 करोड़ पहुंच गई। दूसरी ओर अंग्रेजी न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या 4 लाख से बढ़कर 14 लाख पहुंच गई। कुल मिलाकर हिंदी और अंग्रेजी के न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या में दो से छह गुना तक बढ़ोतरी हुई जबकि क्षेत्रीय चैनलों के दर्शकों की संख्या में पांच से 10 फीसदी उछाल आई।
 
वर्ष 2012 में तत्कालीन रेटिंग्स एजेंसी टीएएम मीडिया रिसर्च के मुताबिक 1999 से 2009 के दौरान चुनावों की तुलना में दूसरी घटनाओं ने न्यूज चैनलों पर ज्यादा दर्शक बटोरे। 2004 के लोक सभा चुनावों में न्यूज दर्शकों की संख्या में 10 फीसदी और 2009 में आठ फीसदी की बढ़ोतरी हुई। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं और मुंबई में हुए आंतकवादी हमलों के दौरान न्यूज चैनलों की संख्या में इससे कहीं ज्यादा इजाफा हुआ था। मुंबई हमलों के दौरान न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या टेलीविजन के कुल दर्शकों की संख्या का 18 फीसदी पहुंच गई थी। 
 
लेकिन न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या केवल कुछ ही घटनाओं के दौरान बढ़ी। 2018 के अंत तक पिछले दस वर्षों के दौरान न्यूज दर्शकों की संख्या ठहरी हुई है। टेलीविजन के कुल दर्शकों की संख्या में न्यूज चैनलों के दर्शकों की हिस्सेदारी छह से आठ फीसदी के बीच झूल रही है। 2018 में यह 7.2 फीसदी थी। अमूमन विज्ञापन और भुगतान राजस्व का सीधा संबंध दर्शकों की संख्या से होता है। इसलिए आश्चर्य नहीं है कि खबरों का प्रसारण अब भी घाटे का सौदा है। 74,000 करोड़ रुपये के भारतीय प्रसारण उद्योग में इसकी हिस्सेदारी महज 3,000 करोड़ रुपये की है। 
 
अब मैं इस सारे विश्लेषण के असली बिंदु पर आती हूं। यह बात सही है कि चुनावों के दौरान न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या में थोड़ा बहुत बढ़ोतरी होती है लेकिन इसे बरकरार रखने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। इसके लिए ठोस जमीनी रिपोर्टिंग, शानदार कवरेज और पत्रकारिता में भारी निवेश चाहिए। पिछले एक दशक में किसी भी न्यूज चैनल ने ऐसा नहीं किया। इसके उलट उन्होंने संवाददाताओं, रिपोर्टिंग और जमीनी पत्रकारिता में कटौती की है। आज न्यूज चैनल स्टार एंकर और चीखने-चिल्लाने वालों पर ज्यादा निर्भर हैं। इस तरह की पत्रकारिता का नतीजा यह हुआ कि गुणवत्ता में गिरावट आई और धु्रवीकरण बढ़ गया। किसी खास सोच को आगे बढ़ाने के लिए फर्जी तथ्यों का सहारा लेने से दर्शकों की संख्या तेजी से बढ़ती है और राजस्व भी बढ़ता है। कल्पना करें कि किसी फिल्म में केवल आइटम सॉन्ग हों तो दर्शकों को क्या हासिल होगा। देश के 400 न्यूज चैनलों में से अधिकांश का यही हाल है। 
 
मनोरंजन या फिल्मी चैनलों के साथ संवाद से इसमें मदद मिल सकती है। ज्यादा दर्शक खींचना अच्छी बात है लेकिन दर्शकों का स्तर बरकरार रखने के लिए आपको जरूरी कार्यक्रमों की जरूरत होती है। मनोरंजन चैनलों में धारावाहिकों से दर्शकों की संख्या बरकरार रहती है जबकि रियल्टी शो या खास इवेंट से इसमें तेजी आती है। फिल्मी चैनलों में सूर्यवंशम जैसी पुरानी फिल्में यह काम करती हैं। इससे चैनलों की कमाई होती रहती है जबकि दंगल या सुल्तान जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों से इसमें तेजी आती है।
 
अगर आप डर या भय वाले कार्यक्रम दिखाकर हर रात दर्शकों को अपनी तरफ खींचते हैं तो आप ऐसे मॉडल में निवेश कर रहे हैं जिसमें आपका रिटर्न घटता जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि देश में दर्जनों अच्छे अखबार हैं और अब तो कम से कम आधा दर्जन ऐसी न्यूज साइट आ गई हैं जो खबरें देती हैं। न्यूज चैनल तो बहुत पहले ही खबर देना भूल गए हैं। 
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