बिजनेस स्टैंडर्ड - रोजगार का सवाल और राजनीति का हाल
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रोजगार का सवाल और राजनीति का हाल

मिहिर शर्मा /  May 22, 2019

आर्थिक परिणाम हमारी राजनीति को किस प्रकार प्रभावित करते हैं, इस विषय में हमारी पारंपरिक समझ का परीक्षण 23 मई को हो रहा है। विस्तार से बता रहे हैं मिहिर शर्मा 

 
पिछले कुछ आम चुनावों की बात करें तो हर बार उनकी व्याख्या किन्हीं आर्थिक कारकों पर की गई। सन 2004 में जब इंडिया शाइनिंग अभियान के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार दोबारा नहीं चुनी गई तो अधिकांश लोगों का मानना था कि ऐसा ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त निराशा की वजह से हुआ। उस दौरान पांच वर्ष में दो बार मॉनसून नाकाम रहा था। उनके कार्यकाल में मुद्रास्फीति भी अपेक्षाकृत कमजोर थी।  उसके बाद 2009 में जब मनमोहन सिंह की सरकार दोबारा चुनी गई तब इसके लिए संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में आई तेज वृद्घि को श्रेय दिया गया। 2014 में जब संप्रग की दूसरी सरकार की पराजय हुई तो कई लोगों ने कहा कि वर्ष 2011 के बाद आर्थिक वृद्धि में आया धीमापन इसकी वजह रहा। हालांकि सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में चक्रीय सुधार की शुरुआत हो चुकी थी। 
 
गुरुवार को आने वाले आम चुनाव के नतीजों को तय करने वाले कौन से आर्थिक कारक हो सकते हैं? नतीजों के बाद काफी कुछ कहा जाएगा लेकिन बेहतर होगा कि हम कुछ परिकल्पना प्रस्तुत करें और देखें कि वह किस कदर सटीक बैठती है? पहला, भारतीय चुनावों के बारे में मान्यता है कि वे महंगाई से प्रभावित होते हैं। तमाम सर्वेक्षण कहते हैं कि मतदाता इसे लेकर चिंतित हैं। संप्रग की दूसरी सरकार को महंगाई से जूझना पड़ा था। इसके लिए एक हद तक ईंधन कीमतें भी उत्तरदायी थीं। परंतु दूसरी ओर वाजपेयी की राजग सरकार ने इस मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन किया फिर भी हार गई। यानी यहां मामला मिलाजुला है। मौजूदा सरकार की बात करें तो वह मुद्रास्फीति को लेकर सतर्क भी रही और भाग्यशाली भी। भाग्यशाली इस लिहाज से कि कच्चे तेल की कीमतें इस सरकार के कार्यकाल में तेजी से घटीं। इससे मुद्रास्फीति का दबाव घटा और सरकारी व्यय की भरपाई बिना घाटे में ज्यादा इजाफा किए की जा सकी। सतर्क इसलिए क्योंकि कृषि संकट के बावजूद सरकार द्वारा निर्धारित होने वाले कृषि मूल्य में ज्यादा इजाफा नहीं किया गया। अगर ऐसा होता तो यह मुद्रास्फीति की राजनीति एक और प्रमाण बनता। 
 
दूसरा, यह धारणा कि किसानों की मदद ग्रामीण वोट जुटाने में सहायता करती है। इस बात के मजबूत प्रमाण कभी नहीं रहे कि ग्रामीण वोटों में बदलाव की वजह से वाजपेयी की सरकार दोबारा नहीं आ सकी। किसान शब्द मौजूदा प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों में भी बार-बार आया है लेकिन इसके बावजूद कृषि संकट के पर्याप्त संकेत देखने को मिले हैं। महाराष्ट्र में किसानों ने कई बार शहरों की ओर मार्च किया। सब्जियों की कीमतें अक्सर काफी कम रही हैं। मोदी के कार्यकाल के आरंभ में मॉनसून कमजोर रहा। किसानों को उपज की लागत से 50 फीसदी अधिक भुगतान का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो सका। गोसंरक्षण नीतियों ने किसानों की उपज और आय सुरक्षा को प्रभावित किया। आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भुगतान मोदी के कार्यकाल के अधिकांश वक्त ठहरा रहा। न्यूनतम समर्थन मूल्य में मामूली इजाफा देखने को मिला। सरकार ने कार्यकाल के अंत में अंतरिम बजट में किसानों के लिए आय समर्थन की घोषणा की लेकिन यह राशि बहुत ज्यादा नहीं है। अगर इसके बावजूद मोदी सरकार को कृषि संकट वाले क्षेत्रों मसलन महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश के के हिस्सों में मजबूत समर्थन मिलता है तो यह कहना सही नहीं होगा कि देश की राजनीति में किसानों या कृषि समर्थन मानीखेज है।
 
तीसरा, जीडीपी वृद्घि भी बहुत मायने रखती है और 2009 में संप्रग के दोबारा चुने जाने और 2014 में सत्ता से बाहर जाने के लिए यह जिम्मेदार रही। दुर्भाग्यवश चुनाव इस बारे में कोई खास जानकारी नहीं देते क्योंकि मौजूदा जीडीपी आंकड़ों को अब गंभीरता से नहीं लिया जाता। ये पहले के आंकड़ों से तुलना लायक भी नहीं हैं। अन्य उच्च फ्रीक्वेंसी आंकड़ों की बात करें तो वे प्राय: जीडीपी के अनुरूप होते हैं। उनके मुताबिक देश में मंदी की स्थिति है। ऐसे में लगता नहीं कि 23 मई को पिछली सरकार का दोबारा चुना जाना इस बात का परिचायक होगा कि जीडीपी वृद्घि राजनीतिक जय-पराजय से संबद्घ है। 
 
चौथा, रोजगार निर्माण भी सरकार के प्रदर्शन को देखने की एक दृष्टि देता है। विपक्षी कांग्रेस तो यही मानती रही है। उसने रोजगार निर्माण पर मोदी के प्रदर्शन पर लगातार हमला किया। इस मोर्चे पर सरकार का प्रदर्शन निराश करने वाला रहा है। एनएसएसओ के लीक हुए आंकड़े यह बताते हैं। ध्यान रहे रोजगार पर यह जोर हमारी राजनीति में नया है। यह शायद उत्तर भारत के जनांकीय ढांचे की वजह से है जहां बहुत बड़ी तादाद में युवा हैं। निजी क्षेत्र के विकास, रोजगार के विस्तार और श्रम आधारित उत्पादन में कमी ने इसे जन्म दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो युवा, शहरी और आकांक्षी मतदाता के लिए रोजगार की चिंता राजनीतिक मुद्दा है। अगर मोदी 2014 की तरह इस मतदाता वर्ग का समर्थन पाते हैं तो यह कहना भी मुश्किल हो जाएगा कि रोजगार चुनाव में कोई मुद्दा है। ऐसे में अगर भविष्य के नेता रोजगारपरक नीति में निवेश करते भी हैं तो यह उनकी प्राथमिकता नहीं होगी। 
 
कुल मिलाकर अगर मौजूदा सरकार मजबूती से वापसी करती है तो महंगाई को छोड़ राजनीति के ये चारों आर्थिक सिद्घांत खारिज हो जाएंगे। मोदी के कमजोर प्रदर्शन का विपरीत असर होगा।  माना तो यह भी जाता है कि कई चुनाव आर्थिक मसलों पर नहीं भी लड़े जाते। हालांकि देखा जाए तो ऐसा लगता नहीं। खासकर अगर मोदी 2014 की तरह ही भारी जीत दर्ज करते हैं, जबकि वह चुनाव संप्रग सरकार के आर्थिक प्रदर्शन को आधार बनाकर हुआ था। भले ही आर्थिक अखबारों में लिखने वाले मुझ जैसे स्तंभकार चाहे जो मानते रहे हों। छिपा हुआ सामाजिक संघटन और ध्रुवीकरण अधिक अहम राजनीतिक कारक हैं और यह अब खुलकर सामने आ रहा है। जो मतदाता कह रहे हैं कि हमें भले ही मोदी से कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन वह देश के लिए अच्छे हैं, उनकी यही सच्चाई है। शायद अब यह धारणा त्याग देनी चाहिए कि आर्थिक कारक देश में राजनीति के अहम निर्धारक होते हैं। यकीनन यह सच है कि राजनीति आर्थिक नतीजों का अहम कारक है। दुर्भाग्य की बात है कि यह एकतरफा रास्ता राजनेताओं की आर्थिक नीति चयन की दृष्टि से सही नहीं। 
Keyword: parliament, election, ECI, BJP, congress, employment,
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