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भारतीय राज्य के स्वरूप में सुधार को देनी होगी तवज्जो

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  May 21, 2019

इस महीने के अंत तक देश में नई सरकार बन चुकी होगी। सरकार चाहे जिस सियासी गठजोड़ की बने, उसे तीन बुनियादी मुद्दों का सामना करना होगा। इसकी वजह यह है कि नई सरकार की अवधि पूरी होने तक 21वीं सदी का करीब चौथाई काल पूरा हो चुका होगा। पहला मुद्दा 21वीं सदी में भारतीय राज्य के स्वरूप एवं आकार से जुड़ा हुआ है। सवाल है कि यह कितना अधिक प्रतिरोधी होगा या एक व्यवहार्य इकाई के रूप में अस्तित्व बनाए रखने के लिए उसे ऐसा करना होगा? दूसरा मुद्दा भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप एवं ढांचे का है। यह भारतीय राज्य से कितना आजाद होगा? हम देखेंगे कि यह मसला पहले सवाल से गहराई से जुड़ा हुआ है। 

 
तीसरा सवाल समग्र राजनीतिक परिपाटी से जुड़ा है। 'अलग-अलग लटकाने से बेहतर समूह में लटकना होता है' सिद्धांत का अनुसरण करें तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभर रहे क्षेत्रीय एवं छोटे दलों को रोकने के लिए क्या दोनों राष्ट्रीय दल एक साथ आएंगे? ऐसा नहीं है कि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है, लिहाजा हम अपनी बात सियासी दलों से ही शुरू करते हैं।  मौजूदा चुनाव में भाजपा लोकसभा की कुल 543 सीटों में 437 पर चुनाव लड़ रही है जबकि कांग्रेस ने 423 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। इसका मतलब है कि ये दोनों राष्ट्रीय दल खुद ही मान रहे हैं कि करीब 120-125 सीटों पर उनका खास राजनीतिक दखल नहीं है। लेकिन सच तो यह है कि यह आंकड़ा करीब 220 सीटों का है। वर्ष 2004 के आम चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों को मिलकर केवल 282 सीटें मिली थीं। वर्ष 2009 के चुनाव में भाजपा एवं कांग्रेस ने मिलकर 322 सीटें जीती थीं जबकि 2014 में यह आंकड़ा बढ़कर 326 हो गया था और बाकी सीटें अन्य दलों के खाते में गई थीं। दोनों राष्ट्रीय दलों की सीटें कमोबेश इसी दायरे में रही हैं।
 
सवाल है कि क्या भाजपा-विरोधी एवं कांग्रेस-विरोधी रुझान में तेजी आई है? अगर ऐसा है तो भाजपा और कांग्रेस को एक साथ आने की जरूरत पड़ सकती है। अगले दशक में यह सबसे बड़ी राजनीतिक परिघटना हो सकती है। लेकिन इस संभावना को आकार देने के लिए जरूरी होगा कि भाजपा हिंदुत्व से पीछे हटे। उसी तरह  कांग्रेस को भी गांधी परिवार के नेतृत्व को अलविदा कहना होगा।
 
अर्थव्यवस्था
 
लेकिन केवल राजनीतिक दलों के पुनर्संयोजन से ही देश को कोई मदद नहीं मिलेगी। अर्थव्यवस्था को भी काफी मजबूती से बढऩा होगा। हाल ही में हार्वर्ड में शिक्षित एक भारतीय अर्थशास्त्री ने यह सवाल उठाया कि लोकतंत्र का पूर्ण अभाव होने के बावजूद चीन ने आर्थिक रूप से इतना अच्छा प्रदर्शन कैसे किया है जबकि अपनी तमाम लोकतांत्रिक उपलब्धियों के बावजूद भारत का प्रदर्शन खराब रहा है। उन्होंने चीन के सशक्त राज्य और भारत के कमजोर राज्य को इसका जिम्मेदार बताया है।  हमें इस बात की जानकारी 1967 से ही है। उस समय नोबेल पुरस्कार विजेता गुन्नार मिर्डल ने विनम्रतापूर्वक कहा था कि भारत एक 'नरम' राज्य है। उसके बाद से हम इसे नियतिवादी तरीके से हल्के में लेते रहे हैं। लेकिन अब यह सवाल पूछने का वक्त आ गया है कि राज्य को अपने आर्थिक साध्य हासिल करने के लिए खुद को किस हद तक बाध्यकारी शक्तियों से लैस करना होगा? इतना साफ है कि मौजूदा स्तर नाकाफी है।
 
जो भी हो, राज्य की बाध्यकारी शक्तियों में खासी कटौती की गई है जिसका नतीजा यह हुआ है कि उत्पादन के सभी घटक या तो बहुत महंगे या अनुपलब्ध या दोनों हो चुके हैं। इन घटकों को सस्ता बनाने के लिए हमें इस पर चर्चा करने की जरूरत है कि क्या भारतीय राज्य को भी दुनिया के पश्चिमी गोलाद्र्ध समेत कई देशों की तरह अधिक बाध्यकारी बनाना होगा? संरचनात्मक, संवैधानिक एवं राजनीतिक विपक्ष को ध्यान में रखें तो एक संतुलन बनाए रखना बेहद मुश्किल चुनौती बनने जा रहा है। इसे अंजाम देने का एक तरीका यह होगा कि संविधान से समवर्ती सूची को हटाकर राज्यों को अधिक स्वायत्तता दे दी जाए। इसके अलावा केंद्रीय सूची से भी कई विषयों को राज्य सूची में लाना होगा। राज्यों को एक तय रकम केंद्र को देनी चाहिए और हर पांच साल पर उस राशि का संशोधन होना चाहिए। ऐसा करना आसान नहीं होगा लेकिन 21वीं सदी तो अभी शुरू ही हुई है। अगला दशक बेहद बुनियादी किस्म की इन समस्याओं के समाधान तलाशने में लगाया जाना चाहिए।
 
भारतीय राज्य
 
कई देशों ने यह महसूस किया है कि राज्य के ढांचे में सुधार करना सबसे कठिन काम है क्योंकि स्वतंत्रता के सिद्धांत का आशय है कि सुधार की सर्वाधिक जरूरत वाले संस्थान खुद ही अपना सुधार कर सकते हैं। संसद, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच विवाद का यह बहुत पुराना बिंदु रहा है। स्वतंत्रता की इस आत्मघाती व्याख्या को दूर करने के लिए जरूरी है कि राज्य के बाकी दो अंग तीसरे अंग का सुधार करें। इसके बगैर कोई भी सुधार संभव नहीं हो पाएगा। यही कारण है कि अगली सरकार को यह तरीका ईजाद करना होगा जिससे तीन में से कोई भी दो अंग तीसरे अंग के सुधारों का मसौदा पेश कर सकें। इन सुधारों को अमल में लाना अनिवार्य करना होगा। अगर इसके लिए संविधान में संशोधन भी करने की जरूरत पड़े तो सरकार को उसके लिए काम करना चाहिए। आखिर संविधान में अब तक 100 से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं। 
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