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भारतीय राज्य के स्वरूप में सुधार को देनी होगी तवज्जो

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  May 20, 2019

चुनावी कोलाहल के बीच में एक भीषण चक्रवाती तूफान का दस्तक देना अच्छी बात नहीं है। कुछ समय के लिए तूफान से जुड़ी बातें सुर्खियों में रहीं और इस दौरान राजनीति के भी बढिय़ा मौके बने। मसलन, तूफानी विपदा से निपटने के लिए किसने अच्छा काम किया और किसने नहीं किया? लेकिन यह सच है कि फनी तूफान ने ओडिशा के बड़े हिस्से और पश्चिम बंगाल एवं बांग्लादेश में भी काफी नुकसान पहुंचाया। यह अपने पीछे टूटे घर, बिजली के गिरे खंभों और ढांचागत बरबादी के निशान छोड़ गया है। एक ही झटके में ओडिशा ने कई वर्षों के अर्जित विकास लाभांश को गंवा दिया है।

 
लेकिन इस तूफान के दौरान मरने वाले लोगों की संख्या पहले से कम रहीं। इससे वैज्ञानिकों और ओडिशा के प्रशासन की तरफ से 10 लाख लोगों को सुरक्षित निकालने और उन्हें राहत शिविरों तक पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर किए गए अद्भुत प्रयासों का भी पता चलता है। इससे पहले 1999 में ओडिशा में आए पिछले भीषण चक्रवाती तूफान में करीब 10 हजार लोगों की मौत हुई थी। लेकिन इस बार 170 किलोमीटर प्रति घंटे से भी तेज रफ्तार हवाएं चलने के बावजूद मृतकों की संख्या 70 तक ही सीमित रखने में कामयाबी मिली है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। 
 
हालांकि यह समझने की जरूरत है कि जलवायु को लेकर जोखिम भरी इस दुनिया में फनी तूफान का क्या मतलब है? जब भी ऐसी कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो जलवायु परिवर्तन की तरफ उंगलियां उठने लगती हैं। लेकिन केवल जलवायु परिवर्तन को ही ऐसी विपदाओं के लिए जिम्मेदार क्यों ठहराया जाए? संशयवादी इस तरफ इशारा करेंगे कि तूफानों की संख्या में बढ़ोतरी दिखाने वाले ठोस आंकड़ों की कमी है। कुछ बदलाव आया है लेकिन इस फर्क को मापने वाले काल-आधारित पैमाना काफी नहीं है। विश्व मौसम-विज्ञान संगठन की जलवायु आकलन रिपोर्ट 2018 के मुताबिक उत्तरी गोलाद्र्ध में उठने वाले उष्ण-कटिबंधी तूफान एक साल पहले के 63 से बढ़कर 74 हो गए जबकि दक्षिणी गोलाद्र्ध में दोनों साल 22 तूफान दर्ज किए गए। ऐसे में अगर आप अपने जोखिम पर यह दलील दे सकते हैं कि इसमें कुछ भी नया नहीं है। तूफान तो आएंगे और जाएंगे। इसके लिए जलवायु परिवर्तन को भला क्यों दोष दें?
 
सच तो यह है कि भारतीय मौसमविज्ञान विभाग (आईएमडी) के मुताबिक इन तूफानों में बड़ा फासला है। तूफानों के बारे में अनुमान लगा पाना काफी मुश्किल होता जा रहा है। हालांकि कुछ वर्षों में आईएमडी ने तूफानों के बारे में अनुमान लगाने के विज्ञान में खुद को काफी सिद्धहस्त कर लिया है लेकिन यह अब भी सीखने के दौर से गुजर रहा है ताकि तूफानों के उद्भव एवं प्रसार के बारे में अनुमान लगाने की तकनीक और पद्धति को बेहतर किया जा सके। आईएमडी को वर्ष 2017 के आखिर में केरल के तटीय इलाकों में आए तूफान 'ओकची' ने पहला झटका दिया था। कई लोगों की जान लेने वाले और समुद्र में गए मछुआरों को संकट में डालने वाला यह तूफान छह घंटों के भीतर ही गहरे दबाव के क्षेत्र से चक्रवाती तूफान बन गया था। हमें यह अहसास होना चाहिए कि उस तूफान का पूर्वानुमान लगाने और समय से चेतावनी जारी करने में नाकाम रहना महज मानवीय गलती नहीं थी। इसकी वजह ऐसे चक्रवाती तूफान की असामान्य प्रकृति थी जिसे पहले कभी भी नहीं देखा गया था। इसने अपनी दिशा बदल ली और अनुमानों से एकदम अलग रफ्तार पकड़ ली और पहले कभी भी नहीं देखी गई गति से बढ़ते हुए अधिक प्रचंड रूप अख्तियार कर लिया। वैज्ञानिकों ने उस तूफान की प्रकृति में बदलाव का एक कारण तो यह बताया कि समुद्र में बने बेहद गर्म क्षेत्र की वजह से तूफान की दिशा और रफ्तार बदल गई। 
 
लेकिन इस बार आईएमडी इन बदलावों के लिए पहले से तैयार था। उसने ओकची तूफान से मिले कड़वे सबक को बखूबी सीखा था। इसके आधार पर वैज्ञानिकों ने अधिक परिष्कृत उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए अपने पूर्वानुमान मॉडल को सुधारा। लेकिन परिवर्तन की गति इतनी तेज है कि वर्ष 2017 में सीखा हुआ सबक भी इतनी जल्द पुराना हो गया है।  इस मामले में फनी तूफान ने देखते-ही-देखते प्रचंड से बेहद प्रचंड रूप अख्तियार कर लिया और निर्धारित समय से पहले ही तटीय इलाकों तक पहुंच गया। यह इस तथ्य के बावजूद हुआ कि भारत में चक्रवात का अब काफी अच्छा पूर्वानुमान होने लगा है। जरा सोचिए कि इसका असली वक्त में क्या मतलब है? फनी को दोपहर के बाद ओडिशा के तट तक पहुंचना था और उसके पहले उन इलाकों से लोगों को सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचाने की चुनौती थी। लेकिन फनी ने सुबह के समय ही पूरी तीव्रता से दस्तक दे दी। हालांकि राज्य सरकार ने निर्धारित समय से पहले ही लोगों को सुरक्षित निकालकर अपनी बेहतर तैयारी का परिचय दिया।
 
फनी ने भीतरी इलाकों का रुख किया और भुवनेश्वर तक रफ्तार में किसी कमी के बगैर जा पहुंचा था। यह अपने आप में आश्चर्यजनक बात है क्योंकि किसी भी तूफान को तीव्रता बनाए रखने और भारी बारिश करने के लिए जमीनी इलाके में नमी की जरूरत होती है। इस बार यह तूफान भीषण गर्मी के समय आया है जबकि इस समय में किसी भी सूरत में समुद्री तूफान कभी नहीं आते हैं। यह भीतरी इलाकों में कैसे और क्यों पहुंचा? भविष्य में इस तरह का अनुमान कैसे लगाया जाना चाहिए?
 
फनी हमें कई बातें बताता है। पहला, हमें मौसम के विज्ञान और आपदा से तत्काल निपटने के लिए सरकार की क्षमता बढ़ाने में निवेश करना होगा। दूसरा, तूफानों की संख्या के आधार पर हम यह नतीजा नहीं निकाल सकते हैं कि  दुनिया अधिक या कम सुरक्षित है। लेकिन सबसे अहम बात, यह हमें बताता है कि भविष्य अधिक जोखिम वाला है और अनुमानों से परे अप्रत्याशित है। इस हकीकत के प्रति जागरूक होने का वक्त आ गया है। अब समय नहीं गंवाया जा सकता है।
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