बिजनेस स्टैंडर्ड - अच्छे दिनों का आगमन और सरकार की भूमिका
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अच्छे दिनों का आगमन और सरकार की भूमिका

देवाशिष बसु /  May 20, 2019

अगर सरकार शांति कायम करने, तत्काल न्याय प्रदान करने और लागत कम करने में सहायता करे तो भारत तेजी से प्रगति कर सकता है। विस्तार से बता रहे हैं देवाशिष बसु 

 
वर्ष 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने चुनाव घोषणा पत्र के दो संस्करण सार्वजनिक किए थे। एक छोटा और दूसरा बड़ा। मैंने छोटे संस्करण को अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर सेव किया था। मुझे लगा कि चूंकि एक अलग सरकार का वादा किया गया था और कहा गया था न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप के साथ अधिकतम शासन होगा, ऐसे में मैं देश में आ रहे बदलाव को दर्ज करना चाहता था। करीब छह महीने बाद मैंने उसे हटा दिया। मैंने ध्यान दिया कि केवल नेतृत्व में बदलाव आया है, सरकार के कामकाज में कोई ढांचागत परिवर्तन नहीं आया है। 
 
निश्चित तौर पर बाद के वर्षों में हालात और खराब हुए। इस महीने के शुरुआती दो सप्ताह में हमें ऐसी सुर्खियां देखने को मिलीं, 'मारुति ने मांग में कमी के चलते तीसरे महीने भी उत्पादन घटाया।' '21 महीनों में पहली बार देश के औद्योगिक उत्पादन में कमी।' 'वित्त वर्ष 2019 में वृद्घि दर तीन वर्ष के निचले स्तर पर।' 'आईबीसी भी फंसे हुए कर्ज से संबंधित पुराने विफल कानूनों की राह पर' या फिर 'नरेंद्र मोदी की सबसे विशिष्ट आर्थिक नीतियां सबसे बुरी साबित हुईं।' आखिर गलती कहां हुई? मोदी सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं की शुरुआत की घोषणा के एक वर्ष बाद लेखक और विचारक अरुण शौरी ने कहा था कि कांग्रेसनीत संप्रग सरकार में गाय को शामिल कर दिया जाए तो यह सरकार वैसी ही है। यह व्याख्या अद्भुत थी। संप्रग की दोनों सरकार की पहचान थी रोजगार गारंटी योजनाएं, सरकारी क्षेत्र की अनुत्पादक कंपनियों को लगातार समर्थन, सांठगांठ के साथ बुनियादी परियोजनाओं की लागत में अनावश्यक इजाफा, आधार जैसी विवादास्पद योजना, राजकोषीय घाटे को छिपाने के लिए बजट में करामात, कर आतंक, किसानों के लिए लोकलुभावनवाद आदि। राजग सरकार में भी काफी कुछ ऐसा ही था।
 
भाजपानीत सरकार स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। 30 वर्ष के अंतराल के बाद किसी सरकार को बहुमत मिला था। यह अप्रत्याशित बहुमत रोजगार और विकास के लिए था। इसके बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संप्रग की योजनाओं का नाम बदलकर उन्हें आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। सरकार ने मुद्रा नामक ऋण योजना शुरू की। सरकारी क्षेत्र में कोई सुधार नहीं किया गया, कोई सार्थक विनिवेश नहीं, जो थोड़ा बहुत हुआ भी वह बहुत सार्थक नहीं था। मिसाल के तौर पर ओएनजीसी द्वारा हिंदुस्तान पेट्रोलियम को खरीदना और पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन द्वारा रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन को खरीदना। सरकारी कंपनियों से लाभांश के रूप में हजारों करोड़ रुपये की राशि ली गई। उनमें से कई के पास तो वेतन देने तक के लिए पैसे नहीं हैं। सरकारी बैंकों में स्वामित्व, भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी की स्थिति में कोई सुधार देखने को नहीं मिला है। करदाताओं की हजारों करोड़ रुपये की राशि इन बैंकों में डाली गई ताकि ये परिचालित होते रह सकें। सब्सिडी कम करने वाली परियोजना के बजाय आधार निगरानी करने का उपाय बन गया है। न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन की बात चुटकुला साबित हुई है।
 
वस्तु एवं सेवा कर तथा संप्रग सरकार द्वारा प्रस्तावित ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) मोदी सरकार के दो बड़े सुधार हैं। परंतु उच्च जीएसटी दरों और पुरातनपंथी नियमों ने कई तरह की समस्याएं पैदा कीं। नौकरशाही और दिक्कतदेह आईबीसी ढांचे ने यह तय कर दिया कि नई व्यवस्था भी पुराने दिवालिया कानूनों की ही गति को प्राप्त हो। सौदेबाजी, लंबी निष्क्रियता और अनसुलझे मामलों की लंबी सूची इसका उदाहरण बन गई। अब से कुछ सप्ताह में नई सरकार कार्यभार संभाल लेगी। वह ढांचागत बदलाव लाने के लिए क्या कर सकती है? तकनीकी दुनिया में कहा जाता है कि किसी भी चीज को दस गुना अलग बनाया जाए तभी वह लोगों का ध्यान आकर्षित कर पाती है। गरीबी में जी रहे लाखों भारतीयों के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के लिए हमें भी शासन में 10 गुना अंतर पैदा करना होगा। ऐसा करने के लिए अब तक उठाए गए कदमों से कुछ अलग सोचना होगा। योजनाएं, सब्सिडी और कर बढ़ाकर इसे हासिल नहीं किया जा सकता है। हमारे रुख में ढांचागत बदलाव आवश्यक है। सरकार को खुद काम करने के बजाय सेवा प्रदाता बनना होगा। ऐसा करके ही रुख में 10 गुना बदलाव लाया जा सकेगा।
 
हमें यह यकीन दिलाया गया है कि सरकार की नीितयां और उसके कदम ही हर समस्या का समाधान कर सकते हैं। फिर चाहे मामला कृषि ऋण का हो, रोजगार का, आवास का, खराब स्वास्थ्य सुविधाओं का या खराब बुनियादी ढांचे का। बहरहाल, अगर हम अधिक गहराई मे जाएं तो हमें पता चलेगा कि सरकार अपने आप में समस्या है, न कि हल। हर घोटाला या हर बेकार होने वाले व्यय की जड़ लाइसेंसिंग, सरकारी क्षेत्र, निविदा या अपारदर्शी व्यवस्था में निहित होती है। इनके लिए अकेले सरकार ही उत्तरदायी है।
 
सन 1950 और 1960 के दशक में एक वक्त था जब निजी पूंजी और कौशल दुर्लभ थे और सरकार को औद्योगिक परियोजनाएं स्थापित करनी पड़ती थीं। तब से अब तक सरकार ने अबाध गति से विस्तार किया है। इससे निजी उपक्रमों का विकास सीमित हुआ। सांठगांठ वाले पूंजीवाद और भ्रष्टाचार के उभार के चलते कई प्रतिभावान भारतीयों ने देश से बाहर का रुख किया। इन हालात को बदलना होगा। सरकार को अपनी भूमिका कम करनी होगी। यह काफी अनुत्पादक और गैरजवाबदेह है। आज प्रतिभा, पूंजी और निजी संस्थानों की ताकत को लाभकारी और गैरलाभकारी, दोनों क्षेत्रों में महसूस किया जा सकता है। 
 
मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि अगर सरकार शांति कायम करने, तत्काल न्याय प्रदान करने और लागत कम करने में सहायता करे तो भारत तेजी से प्रगति कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो निजी संस्थानों को भी प्रोत्साहन मिलेगा और वे हरसंभव तरीके से अपना नजरिया सामने रख सकेंगे। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो सरकार को कम कर की आवश्यकता होगी। वह अपनी ऊर्जा वृद्घि को गति प्रदान करने में लगा सकती है। तब सही मायने में अच्छे दिन आएंगे। 
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