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सही और गलत!

संपादकीय /  May 20, 2019

वर्ष 2019 के आम चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हों लेकिन यह कहना उचित होगा कि 36 दिन तक चली इस कवायद के बाद निर्वाचन आयोग का कद छोटा हुआ है। ये चुनाव आधिकारिक तौर पर निहायत अशिष्टता से भरे हुए थे और इस अवधि के दौरान सत्ताधारी दल और विपक्षी उम्मीदवारों द्वारा उल्लंघन के तमाम मामलों की शिकायत के बाद अब आयोग में आपसी असहमति सामने आ रही है। निर्वाचन आयुक्तों में से एक अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों की सुनवाई वाली बैठकों से खुद को अलग करते हुए कहा कि उनकी असहमति को दर्ज ही नहीं किया जा रहा। लवासा विवादों के केंद्र में रहे हैं। चुनाव प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को चुनाव प्रचार के दौरान धर्म को बीच में लाने और बालाकोट हमले का जिक्र करने के पांच मामलों में क्लीनचिट दी। लवासा ने इन सभी अवसरों पर विरोध किया। आयोग के नियमों के मुताबिक बहुमत का निर्णय मान्य होता है और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने अपनी दलील में कहा था कि अल्पमत का निर्णय रिकॉर्ड नहीं किया जाएगा क्योंकि आचार संहिता के उल्लंघन का मामला अद्र्घ न्यायिक निर्णयों में नहीं आता है। 

 
यह नजरिया चुनाव आयोग के ध्येय की रक्षा भले ही करता हो लेकिन यह उसकी आत्मा के अनुरूप नहीं है। यह एक खुला प्रश्न है कि क्या उसे प्रधानमंत्री की केदारनाथ यात्रा के प्रसारण के लिए सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल की अनुमति देनी चाहिए थी जबकि अभी चुनाव प्रचार समाप्त ही हुआ था। अगर यह यात्रा प्रचार अभियान के दौरान हुई होती तो कोई मुद्दा नहीं बनता। यह बात भी आश्चर्य का सबब है कि उसने मोदी और ममता बनर्जी को बंगाल में पूरे दिन चुनाव प्रचार की अनुमति क्यों दी, इसके ठीक बाद उसने चुनावी हिंसा की निंदा करते हुए प्रचार की अवधि को ही कम कर दिया। हाल के वर्षों में सार्वजनिक बहस में आरोप प्रत्यारोप बढ़ गए हैं। यह कहना उचित होगा कि इससे पहले के चुनाव आयोग ने भी कोई बहुत अधिक प्रतिष्ठा नहीं अर्जित की है। न ही उनसे निपटने वाले राजनीतिक प्रतिष्ठान ने ऐसा कुछ किया है। वर्ष 2009 का उदाहरण हमारे सामने है जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त एन गोपालस्वामी ने अपने सहयोगी नवीन चावला को हटाने की अनुशंसा की थी क्योंकि उन्हें कांग्रेस पार्टी के करीब माना जाता था। 
 
वर्ष 2002 में मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए कहा था कि तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त जे एम लिंगदोह ने गुजरात में सांप्रदायिक दंगों के बाद जल्दी चुनाव कराने की उनकी मांग इसलिए ठुकरा दी थी क्योंकि वह ईसाई थे। सन 1989 में निर्वाचन आयोग को तीन सदस्यीय इसलिए बनाया गया क्योंकि तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त आरवीएस पेरी शास्त्री ने कुछ ज्यादा ही स्वतंत्रता का परिचय दिया था। शास्त्री को उनके दौर में कुछ व्यापक चुनाव सुधार लाने के प्रयास के लिए भी जाना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया था लेकिन 1993 में टीएन शेषन ने इसे दोबारा शुरू किया। उनकी स्वायत्तता ने तमाम राजनीतिक दलों को असहज कर दिया था। शास्त्री और शेषन दोनों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता के नए मानक तय किए। उस वक्त तक इसे एक अनुगामी संगठन की छवि हासिल थी लेकिन बाद में यह संस्थागत निष्पक्षता की मिसाल बन गया। यह प्रतिष्ठा 2000 के दशक में गायब होने लगी। इसकी कमजोरी का एक सिरा यह भी है कि यहां होने वाली नियुक्तियां वह कार्यपालिका करती है जिसकी निगरानी का काम आयोग के पास है। उस लिहाज से देखें तो लवासा ने सच बोलकर असाधारण साहस दिखाया है। यह दुखद है कि आयोग ने उनकी सुविचारित दृष्टि को नकार दिया है।
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