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प्रज्ञा ठाकुर की जीत के क्या होंगे मानी?

चुनाव की बात
शेखर गुप्ता /  May 19, 2019

यकीनन 'साध्वी' प्रज्ञा सिंह ने एक उपलब्धि तो हासिल कर ली है। उन्होंने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। ऐसा उनके अलावा कोई और नहीं कर सका है। उन्होंने एक और ऐसा काम किया जिससे उनके पार्टी नेतृत्व को नफरत है। प्रज्ञा ने पार्टी नेतृत्व से सुर्खियां तय करने की ताकत भी छीन ली है। लगातार पांच वर्ष तक सुर्खियां तय करने और उन पर नियंत्रण रखने की शानदार नीति के बाद भाजपा का अभियान जिस तरह समाप्त हुआ, पार्टी वैसा चाहती तो नहीं होगी। सार्वजनिक जीवन में  मोदी और शाह के सामने पहली बार ऐसा मसला था जिसका बचाव करना मुश्किल था।

 
केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े और आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय समेत कुछ ट्विटर प्रेमी उनके बचाव में कूदे और उन्होंने गांधी बनाम गोडसे की बहस को आगे ले जाने की कोशिश की। इन सबको चुप करा दिया गया। बीते पांच वर्षों ने हमें दिखाया है कि भाजपा, अपनी पार्टी के किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति या समुदाय के बारे में कही गई खराब से खराब बात का बचाव कर सकती है। याद कीजिए 'अली बनाम बजरंग बली', 'ईद पर बिजली हो तो दीवाली पर क्यों नहीं', 'मोदी की सेना', 'अवैध प्रवासी दीमक हैं' या राहुल को 'पप्पू' और प्रियंका गांधी को 'पप्पी' कहना।
 
परंतु महात्मा गांधी के बारे में ऐसा करने की सोचना भी नहीं चाहिए। कुछ लोग गोष्ठियों और शाखाओं में उनकी गलतियों के बारे में फुसफुसाते होंगे, उन्हें विभाजन का उत्तरदायी बताते होंगे लेकिन सार्वजनिक रूप से कभी नहीं। बीते सात दशक अपने वैचारिक अभिभावक आरएसएस को उनकी हत्या के आरोप से दूर रखने के प्रयास के बाद तो कतई नहीं। भाजपा ने इस भगवाधारी हिंदुत्व आइकॉन को जो कि आतंकवाद के मामले में जमानत पर बाहर है, यह दलील देते हुए चुनाव मैदान में उतारा कि जब तक कोई दोषी सिद्ध न हो, निर्दोष है। उनके मुताबिक महात्मा गांधी का हत्यारा देशभक्त है। आप जिसे राष्ट्रपिता कहते हैं उसकी विरासत को चुनौती कैसे दे सकते हैं? खासकर उनकी 150वीं वर्षगांठ वाले वर्ष में। प्रधानमंत्री खुद विदेशी राजनेताओं को महात्मा गांधी से जुड़े स्थानों तक ले जाने में गौरव महसूस करते हैं। दक्षिण अफ्रीका के जिस पीटरमारिट्जबर्ग स्टेशन पर गांधी को ट्रेन से जबरन उतारा गया था, वहां ट्रेन यात्रा कर चुके हैं, उन्होंने दांडी यात्रा की 89वीं वर्षगांठ पर ब्लॉग लिखा, चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी पर वहां पहुंचे, साबरमती में गांधी आश्रम में चरखा चलाते हुए तस्वीर खिंचाई और गांधी के गोल चश्मे को स्वच्छ भारत अभियान का लोगो बनाया।
 
प्रज्ञा ठाकुर न तो वोट जुटा सकती हैं और न ही पार्टी की नीतिगत स्थिति में उनका कोई दखल है, उन्होंने प्रधानमंत्री और अपने पार्टी प्रमुख को जबरदस्त झटका दिया है। वे शिकायत भी नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें गुमनामी से खींचकर तो वही लाए हैं। मोदी के साथ संवाददाता सम्मेलन में शाह ने कहा कि कांग्रेस ने भगवा आतंकवाद का जुमला छेड़कर हिंदुओं को बदनाम करने का प्रयास किया और उनकी पार्टी का प्रज्ञा को उतारना कांग्रेस के खिलाफ 'सत्याग्रह' था।  यहां दो बातों पर ध्यान दें। पहली बात, पार्टी अब स्वयं को साध्वी प्रज्ञा से दूर नहीं कर सकती। वजह एकदम साफ है, उसने उन्हें जानबूझकर चुना था ताकि वे अपनी बात प्रमुखता से रख सकें। दूसरा, यह विडंबना ही थी कि अपने राजनीतिक वक्तव्य को स्पष्ट करने के लिए शाह को गांधी की पहचान रहे 'सत्याग्रह' शब्द का इस्तेमाल करना पड़ा। जब आप गांधी के अहिंसा के विचार का इस्तेमाल उनके हत्यारे को देशभक्त करार देने वाले व्यक्ति के बचाव के लिए इस्तेमाल करते हैं तो आप समझ जाइए कि आप कहां खड़े हैं।
 
जीवन होया राजनीति, एक सिद्घांत यह है कि सही वजह होने पर भी कभी गलत काम नहीं करना चाहिए। हमें पता है कि भाजपा दिग्विजय सिंह से हिसाब बराबर करना चाहती थी। 'हिंदू आतंकवाद' को लेकर कांग्रेस में सबसे मुखर वही रहे हैं। उन्होंने तो नई दिल्ली के बटला हाउस में हुई मुठभेड़ और वहां शहीद हुए पुलिस अधिकारी मोहन चंद्र शर्मा की शहादत पर भी सवाल उठा दिए थे। शर्मा को भी हेमंत करकरे की तरह मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। 26/11 को आरएसएस का षडयंत्र बताने वाली एक किताब की रिलीज पर भी उन्होंने ऐसी ही बात कही।
 
भाजपा का मानना था कि उनके सामने हिंदू आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार लोगों में से सबसे कट्टर चेहरे को उतारा जाए। पिछले महीने के आखिर में प्रज्ञा ठाकुर ने हेमंत करकरे की बुराई की और दावा किया कि वह उनके शाप से मरे हैं और उनका परिवार बरबाद हुआ है (याद रहे करकरे के निधन के छह वर्ष बाद 29 सितंबर को उनकी पत्नी का भी निधन हो गया था। यह तारीख मालेगांव धमाकों की बरसी भी है)। उन्होंने बहादुरी बताते हुए कहा कि वह बाबरी मस्जिद के गुंबद पर चढ़ीं और उसे ढहाया। इसके बाद से पार्टी ने नुकसान कम करने की कोशिश की। पहले उनको मौन व्रत पर भेजा गया और भाजपा ने दिग्विजय और कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उन्होंने भी मोहन चंद्र शर्मा का यूं ही अपमान किया था। परंतु गोडसे की तारीफ ने पार्टी के पास छिपने की जगह नहीं छोड़ी है। 
 
सन 1989 से भाजपा की नीति रही है, धीरे-धीरे आक्रामक होना। इसकी शुरुआत लालकृष्ण आडवाणी के अयोध्या आंदोलन के साथ हुई। इर्दगिर्द के चरमपंथी तत्त्वों को निरंतर बढ़ावा दिया जाता रहा। इस बीच कुछ को खारिज भी किया गया, मसलन साध्वी ऋतंभरा, प्रवीण तोगडिय़ा और यहां तक कि विनय कटियार। जबकि उमा भारती और साक्षी महाराज, साध्वी निरंजन ज्योति (रामजादे और हरामजादे वाला बयान) तथा योगी आदित्यनाथ जैसे लोग मुख्यधारा में भी आए। यह नीति तीन दशक तक कारगर रही लेकिन इसका अंत होना ही था। हममें से कुछ लोगों को इसका अंदाजा हो गया था। दादरी में गोरक्षकों द्वारा अखलाक की हत्या के बाद मैंने इसी स्तंभ में ऐसा कह दिया था। प्रज्ञा उस कड़ी का सबसे ताजा और शर्मिंदा करने वाला उदाहरण हैं। इसे गलती भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने खुद हमें बताया कि यह सोच समझकर उठाया गया कदम था, सत्याग्रह था। यह मूर्खतापूर्ण बयान था जिसने उनके इरादे स्पष्ट किए। यह जीत के अतिआत्मविश्वास और राष्ट्रवाद की गलत समझ से उपजा था। 
 
यह मान्यता इस बात से उपजी है कि हिंदुत्व ने ही भारत को एकजुट रखा है। वह हिंदुत्व को आरएसएस की हिंदी प्रदेश की दृष्टि से जोड़कर भी देखती है। एक आस्था, एक कौम, एक भाषा और एक राष्ट्र। भारत ऐसा नहीं है। वह अत्यंत विविधतापूर्ण देश है। मोदी को याद रखना चाहिए कि अगर वह पूर्ण बहुमत पा जाते हैं तो भी दक्षिण के चार राज्य आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में भाजपा को 103 में से शायद दो सीट भी मुश्किल से मिलें। ऐसे तमाम प्रदेशों में इस हिंदूकरण को लेकर विरोध उत्पन्न होगा। हिंदूकरण की यह सोच हमारे पुरखों की सोच से उलट है जिन्होंने राज्यों का एक संघ बनाया और भारत खूबसूरती से एकजुट रहा। यही नहीं वह दशक दर दशक अधिक मजबूत और सुरक्षित होता गया। जबकि वैचारिक आधार पर गठित पड़ोसी देश पाकिस्तान बिखर गया।
 
विविधता को लेकर हमारी सहजता आधुनिक विश्व को हमारा तोहफा है। ऐसे समय में जबकि अलग- अलग संस्कृतियों का साथ रहना मुश्किल है, वहां यह एक बड़ी खूबी है। ऐसे में अगर भारत दुनिया में विविधता का सबसे बड़ा ब्रांड है तो स्विस दार्शनिक कार्ल जंग के शब्दों में महात्मा गांधी इस ब्रांड का सबसे बड़ा प्रतीक हैं। नेहरू को गाली देना, उनसे असहमत होना आसान है। कुछ लोग इंदिरा और राजीव गांधी के हत्यारों को पहले ही नायक मानते हैं। जो चरम हिंदू दक्षिणपंथी महात्मा गांधी को मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति का संस्थापक मानते हैं, उनके लिए भी गांधी को निशाना बनाना आत्मघाती है। मोदी का यह कथन ईमानदार हो सकता है कि वह प्रज्ञा को कभी माफ नहीं करेंगे। उनको यह प्रार्थना भी करनी चाहिए कि गुरुवार को आ रहे चुनाव नतीजों में उनकी जीत न हो। अगर वह जीतीं तो पांच साल तक गांधी के नाम पर शासन चलाने वाले दल को संसद में एक ऐसे सदस्य की मौजूदगी की शर्मिंदगी उठानी होगी जो गांधी के हत्यारे को देशभक्त बताती है।
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