बिजनेस स्टैंडर्ड - डेट फंड में प्रतिफल बेहतर
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डेट फंड में प्रतिफल बेहतर

जयदीप घोष और संजय कुमार सिंह /  May 19, 2019

जिन्होंने डेट म्युचुअल फंडों में निवेश किया है, उनकी चिंता का अंदाजा आसानी से लग सकता है। अप्रैल के महीने में फिक्स्ड मैच्योरिरटी योजनाओं (एफएमपी) से 17,644 करोड़ रुपये की शुद्घ रकम बाहर गई और क्रेडिट रिस्क फंडों से 1,253 करोड़ रुपये बाहर निकले। इसी से पता चलता है कि निवेशकों में घबराहट कितनी ज्यादा है। एक प्रमुख वितरक कहते हैं, 'मेरे पास रोज ही फोन आते हैं, जिनमें से कई फोन तो पुराने धनाढ्य निवेशकों के होते हैं। वे सभी डेट फंडों से बाहर निकलना चाहते हैं। मैं उन्हें रोकने की कोशिश करता हूं और समझाता हूं कि डेट फंड से कर के मामले में कितना फायदा है और बेहतर प्रतिफल भी मिलता है। लेकिन ऐसे मौकों पर निवेशकों के लिए सब्र बनाए रखना वाकई बहुत मुश्किल होता है।' इस घबराहट की वजह भी कई हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) की कंपनियां भुगतान में चूक कर गई हैं, एस्सेल और रिलायंस समूह भुगतान में हीलाहवाली कर रहे हैं और एक के बाद एक फंड को डाउनग्रेड किया जा रहा है। ऐसे में डेट फंड प्रबंधक एकदम बदहवास हैं। मगर इससे भी बुरी तस्वीर तो आगे दिख रही है क्योंकि गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये के ऋणपत्र अगले तीन महीने में भुनाए जाने हैं। फंड प्रबंधक तो यही कह रहे हैं कि चिंता करने की कोई बात नहीं है, लेकिन उनकी बात पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा।

 
एफएमपी और क्रेडिट रिस्क फंड पर संकट
 
अप्रैल में एफएमपी का नाम गलत वजहों से ही चर्चा में रहा क्योंकि दो फंड कंपनियों एचडीएफसी तथा कोटक अपने निवेशकों को पूरी बकाया रकम नहीं चुका पाईं। कोटक म्युचुअल फंड के पास जो भी रकम थी, उसने निवेशकों के हवाले कर दी और कहा कि उधार लेने वालों से जैसे ही कर्ज वसूला जाएगा, वैसे ही बाकी रकम निवेशकों को दे दी जाएगी। मगर एचडीएफसी ने अपनी एक एफएमपी योजना का भुगतान एक साल के लिए टाल दिया। इसकी वजह से एफएमपी में निवेशकों का भरोसा और भी कम हो गया है। 
 
क्रेडिट रिस्क फंडों में फंड प्रबंधक अधिक प्रतिफल पाने के फेर में ऐसी प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं, जिनकी रेटिंग कम होती है। पिछले कुछ साल में ऐसे फंडों में काफी निवेश किया गया है क्योंकि अतीत में मिले ऊंचे प्रतिफल को देखकर ग्राहक उन्हें हाथोहाथ ले रहे थे। मगर अब भुगतान में इतनी बार चूक हो चुकी है और रेटिंग इतनी कम कर दी गई है कि कई डेट फंडों के शुद्घ परिसंपत्ति मूल्य (एनएवी) को भी चोट पहुंच रही है। साथ ही निवेशक तगड़े जोखिम वाले इन फंडों से तौबा करते दिख रहे हैं।
 
वृहद अर्थव्यवस्था में सुस्ती
 
क्रेडिट फंडों से जुड़ी बुरी खबरों की बौछार आने की बड़ी वजह यह भी है कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती आ रही है। मिंटवॉक के सह-संस्थापक निखिल बनर्जी कहते हैं, 'बुनियादी ढांचे और विनिर्माण जैसे अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से अच्छा काम नहीं कर रहे हैं। खपत में भी सुस्ती आती दिख रही है क्योंकि एफएमसीजी कंपनियों के बिक्री के आंकड़े बिगड़ते जा रहे हैं।' वह बताते हैं कि जब अर्थव्यवस्था में सुस्ती आती है तो कंपनियों के लिए उधार ली गई रकम लौटाना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे माहौल में उन कपंनियों से अक्सर चूक हो जाती है, जिनका कारोबार बैठ रहा होता है या जिनका कॉर्पोरेट प्रशासन मॉडल खराब होता है।
 
फंड प्रबंधकों की लापरवाही
 
डेट फंडों पर एक के बाद एक चोट पडऩे से यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि फंड प्रबंधकों ने अपना काम ठीक तरीके से किया या नहीं। कई वित्तीय सलाहाकारों को अब लगने लगा है कि फंड प्रबंधक आंख मूंदकर प्रतिफल के पीछे भाग रहे थे और  उन्होंने जोखिम की तरफ ठीक से ध्यान नहीं दिया था।  विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी कंपनी के शेयर में निवेश करते समय इक्विटी फंड प्रबंधक उसके सभी बुनियादी घटकों पर नजर रखता है जैसे उसका स्पष्टï कारोबारी मॉडल है या नहीं और उसमें नकदी का मुक्त प्रवाह होता है या नहीं। किसी भी कंपनी के ऋणपत्रों में निवेश करते समय भी इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। फंड्सइंडिया डॉट कॉम में शोध प्रमुख विद्या बाला समझाती हैं, 'फंड प्रबंधकों ने कई ऐसी कंपनियों के ऋणपत्रों में भी निवेश किया, जो किसी तरह की कारोबारी गतिविधि ही नहीं करती थीं या जिनके पास परिचालन नकदी प्रवाह ही नहीं था।' वह कहती हैं कि प्रवर्तकों के शेयर गिरवी रखे हों तो अतिरिक्त सुरक्षा हासिल हो जाती है फिर भी फंड प्रबंधकों को देख लेना चाहिए कि ऊपर बताए गए दोनों बुनियादी पैमानों पर ये कंपनियां खरी उतरती हैं या नहीं। साथ ही यदि रकम कमजोर कंपनियों में लगाई जा रही है तो डेढ़ गुना गिरवी भी काफी नहीं होती। फंड प्रबंधक यदि ऐसे समूहों में निवेश करते हैं, जिनमें प्रवर्तकों के बहुत अधिक शेयर गिरवी रखे हैं तो भी वे गलती करते हैं। अगर हालात बिगड़ते हैं तो शेयर बेच दिए जाएंगे और उनका भाव एक झटके में जमीन पर आ जाएगा, जिससे गिरवी शेयरों की कुल कीमत भी बहुत कम हो जाएगी। कुछ कंपनियों के मामले में ऐसा ही देखा गया है। फंड प्रबंधक सारा दोष क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के मत्थे भी नहीं मढ़ सकते। बनर्जी कहते हैं, 'म्युचुअल फंडों के पास अपने विश्लेषक होने चाहिए और उन्हें कंपनियों की जांच भी खुद ही करनी चाहिए।' बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) भी कुछ समय पहले कह चुका है कि फंड कंपनियों को खुद ही जांच पड़ताल करनी चाहिए और रेटिंग के भरोसे नहीं बैठना चाहिए।
 
सतर्क रहें, दूर नहीं भागें
 
हाल की घटनाओं से निवेशकों के हौसले को चोट तो पहुंची है, लेकिन उन्हें डेट फंडों से एकदम तौबा नहीं करना चाहिए। एडलवाइस एसेट मैनेजमेंट की मुख्य कार्य अधिकारी राधिका गुप्ता की राय है, 'यदि हाल की घटनाओं को देखकर निवेशक डेट फंड से दूर भागेंगे तो बहुत अफसोस की बात होगी। याद रखिए कि डेट फंड से मिलने वाला प्रतिफल कर चुकाने के बाद भी एफडी के प्रतिफल से ज्यादा हो सकता है।'  वह मानती हैं कि कि डेट योजनाएं चुनने की अपनी प्रक्रिया बेहतर करने पर उद्योग को लगातार काम करना चाहिए। साथ ही कंपनियों को डेट फंडों से मिलने वाले प्रतिफल की बात करके रुक नहीं जाना चाहिए, उनसे जुड़े जोखिम की पूरी जानकारी भी निवेशकों को देनी चाहिए। राधिका कहती हैं कि इक्विटी फंड का प्रदर्शन खराब होने पर इस तरह की हायतौबा नहीं मचती क्योंकि निवेशकों को उनसे जुड़े जोखिमों के बारे में पहले ही अच्छी तरह से समझा दिया जाता है।
 
निवेशकों को भी केवल अतीत में मिला प्रतिफल देखकर क्रेडिट रिस्क वाली श्रेणी में निवेश करने से बचना चाहिए। उसके बजाय उन्हें इन फंडों में संभावित जोखिमों पर भी नजर डालनी चाहिए और देखना चाहिए कि इतना जोखिम उठाने की इच्छा और क्षमता उनमें है या नहीं। जहां तक एफएमपी का सवाल है तो ब्याज दरें लॉक करने के लिए उनमें केवल तब निवेश करें, जब दरें ऊंची हों और उनमें गिरावट आनी तय हो। आज के माहौल में केवल उन एफएमपी का सहारा लीजिए, जो गिल्ट और ट्रिपल-ए-बॉन्ड में निवेश करती हों। 
 
प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के मुख्य वित्तीय योजनाकार विशाल धवन की सलाह है, 'दोहरे इंडेक्सेशन कर लाभ के लिए ही उनमें निवेश न करें क्योंकि आपको ओपन-एंड डेट फंड से भी वही लाभ मिल सकता है।' वह कहते हैं कि ओपन-एंड फंड में एक फायदा और होता है कि उनमें निवेश करने से पहले पोर्टफोलियो की गुणवत्ता देखी जा सकती है। अगर आपको ऐसे ऋणपत्र दिखते हैं, जिनके डिफॉल्ट की आशंका हो तो आप फंड से निकल भी सकते हैं। बाला कहती हैं कि ओपन-एंड डेट फंड में उतार-चढ़ाव आ सकता है लेकिन अगर आपने भाव का दायरा पहले ही तय कर लिया है और उसी पर बने रहते हैं तो आप जोखिम से बच सकते हैं।
 
इस समय खुदरा निवेशकों को अपना ज्यादा से ज्यादा धन बेहद कम अवधि वाले ऐसे फंडों में डालना चाहिए, जो न तो क्रेडिट का जोखिम लेते हैं और न ही अवधि का। उन्हें ऐसे पोर्टफोलियो पर दांव लगाना चाहिए, जिनमें अच्छी खासी विविधता हो ताकि डाउनग्रेड करने पर या डिफॉल्ट होने पर भी उन्हें कम चपत लगे।
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