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नोटबंदी से भाजपा के करीबी उद्योगपतियों का हुआ भला

मेघा मनचंदा /  May 17, 2019

संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में वित्त और संसदीय राज्य मंत्री रहे पवन कुमार बंसल ने मेघा मनचंदा से जीएसटी, नोटबंदी, न्याय योजना और अपने संसदीय क्षेत्र चंडीगढ़ के बारे में बातें कीं।

 
आपने हाल में सरल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था की बात की। आप किस तरह के सरल जीएसटी की बात कर रहे हैं?
 
मैं वित्तीय मामलों का जानकार नहीं हूं और एक आम आदमी की तरह मैं केवल इतना जानता हूं कि इस सरकार ने जो जीएसटी लागू किया है वह 'एक देश, एक कर' नहीं है जैसा कि सरकार दावा कर रही है। यह सच्चाई से कोसों दूर है। कांग्रेस जो जीएसटी लाने का प्रयास कर रही थी वह सरल था और उसमें कर की दरें बहुत कम थीं। इस जीएसटी ने देशभर में हर कारोबार को बरबाद किया है। 
 
क्या आप मानते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी अर्थव्यवस्था के लिए दो तगड़े झटके थे?
 
नोटबंदी तो वास्तव में एक घोटाला था। इससे लोगों का कुछ भी भला नहीं हुआ बल्कि उनका भारी नुकसान हुआ। एक जनसभा में नोटबंदी शब्द का जिक्र किया और एक बुजुर्ग आदमी ने चिल्लाना शुरू कर दिया। उसका कहना था कि उसके पैसे बेकार हो गए हैं। नकदी हमारी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। शुरुआत में सरकार ने कैशलेस अर्थव्यवस्था की बात की, फिर वह कम नकदी की बात करने लगी। भारत को कैशलेस समाज बनाने की बात करना पूरी तरह अव्यावहारिक है। नोटबंदी से केवल बड़े उद्योगपतियों का भला हुआ जो सरकार और भाजपा के करीबी हैं। पंजाब में 20,000 से अधिक सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग बंद हो गए। देश के कुल निर्यात में इन उद्योगों का 40 फीसदी योगदान है। 
 
इन चुनावों में रोजगार कितना बड़ा मुद्दा है?
 
रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है। 2011-12 में बेरोजगारी दर 2.2 फीसदी थी जो 2017-18 में उछलकर 6.1 फीसदी पहुंच गई। 5-6 साल में जनसंख्या में हुई बढ़ोतरी को देखते हुए आप देश में बेरोजगारी की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। 
 
अपनी पार्टी की न्यूनतम आय योजना के बारे में आपका क्या विचार है? 
 
इस योजना का गहराई से अध्ययन किया गया है और डॉ. मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम जैसे लोगों ने इस पर व्यापक चर्चा की है। यह कोई अचानक आया विचार नहीं है बल्कि पूरे सोचविचार के साथ इसकी कल्पना की गई है। 
 
आपके संसदीय क्षेत्र की बात करें तो आपके और भाजपा प्रत्याशी किरण खेर के बीच रेल कनेक्टिविटी को लेकर वाकयुद्घ चल रहा है। खेर मोनोरल के पक्ष में है जबकि आप मेट्रो रेल परियोजना चाहते हैं?
 
जब आप चंडीगढ़ की बात करते हैं तो आपको अपनी सोच केवल शहर तक ही सीमित नहीं रखनी चाहिए। आसपास के शहरों से रोज 1,70,000 वाहन शहर में आते हैं। रोज 30-40 किमी का सफर करने वाले लोगों के लिए मेट्रो समय की जरूरत है। मेट्रो चंडीगढ़ के लिए बेहतर विकल्प है। 
 
लेकिन मेट्रो और मोनोरेल में काफी अंतर है? कुछ अनुमानों के मुताबिक मोनोरेल परियोजना पर 2,500 करोड़ रुपये का खर्च आएगा जबकि मेट्रो बनाने पर 14,000 करोड़ रुपये लगेंगे
 
मेट्रो की लागत पंजाब और हरियाणा को साझा करनी है और दोनों राज्य इस पर सहमत हैं। चंडीगढ़ को केवल शहर में बनने वाले हिस्से का खर्च वहन करना होगा। जब मैं सांसद था तो इस बारे में एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट बनाने का काम दिल्ली मेट्रो रेल निगम को सौंपा गया था। चंडीगढ़ में मेट्रो लाना मेरे लिए सबसे अहम एजेंडा है। आज तक शहर में प्रस्तावित मेट्रो योजना को खत्म नहीं किया गया है और मोनोरेल परियोजना को मंजूरी नहीं दी गई है। हम चंडीगढ़ को विरासत शहर का दर्जा देने की बात कर रहे हैं और मोनोरेल शहर की स्काईलाइन को बरबाद कर देगी।
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