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बंगाल के मोर्चे पर ममता की भाजपा से कड़ी जंग

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  May 17, 2019

ऐसा लगा कि इस हफ्ते अगर कहीं चुनावी जंग लड़ी गई तो वह पश्चिम बंगाल में ही थी। ममता बनर्जी ने अकेले दम पर आम चुनावों के आखिरी चरण को योद्धाओं की जंग में तब्दील कर दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भी सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन मुश्किल यह है कि ममता को सड़क की राजनीति में नहीं हराया जा सकता है। पहले कांग्रेस और वामदल भी ममता की इस राजनीति का शिकार हो चुके हैं। वह अपने विरोधियों को चकनाचूर करने के लिए अपना दिलोजान लगा देती हैं। ममता अपने परिष्कृत अंदाज और बौद्धिकता के लिए नहीं बल्कि जमीनी संघर्ष के लिए जानी जाती हैं।

 
तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता ने जब कुछ झल्लाहट भरा बरताव किया था तो मंत्रिमंडल की बैठक में एक मंत्री ने चिढ़ते हुए कहा था, 'ममता बनर्जी की आखिर समस्या क्या है?' सवाल थोड़ा अटपटा था लेकिन उनके बंगाली सहयोगी ने इसका जवाब देने के लिए थोड़ा समय लिया। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, उसके शीशे साफ किए और फिर उसे दोबारा पहनने के बाद कहा, 'अगर कोई यह सोचता है कि ममता रवींद्रनाथ ठाकुर से बेहतर कवि हैं, बीथोवन से बेहतर संगीतकार हैं और लियोनार्दो दा विंची से बेहतर चित्रकार हैं तो फिर हर बात में समस्या है।'
 
ममता को तमाम दलों का राजनीतिक तबका ऐसे बिगड़ैल बच्चे की तरह देखता है जिसे बड़े लोगों के बीच अकेले जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन बंगाल की जनता के लिए तो ममता की जिंदगी एक खुली किताब है और वह हमेशा ही उन लोगों में से एक रही हैं। गरीबी को काफी अहमियत देने वाले इस राज्य में ममता अब भी टीन की छत वाले एक साधारण घर में रहती हैं और पास में ही मच्छरों की भरमार वाला नाला भी है। उनका पहनावा भी काफी साधारण हैं। वह हाथ से बनी सूती साड़ी, रबर की चप्पलें और एक साधारण घड़ी पहनती हैं। महंगे मोबाइल फोन और चमचमाती कारें शायद उनके लिए बनी ही नहीं हैं। वह अपने बनाए एक नियम का पालन हमेशा करती हैं- वह कभी भी दूसरों के सामने खाना नहीं खाती हैं। शायद इसकी वजह यह है कि उनके आसपास ऐसे लोग रहते हैं जिन्हें पता ही नहीं होता है कि उनका अगला भोजन कहां से आएगा?
 
ममता का पालन-पोषण मुश्किल हालात में हुआ था। जब वह एक छोटी बच्ची थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया था। अब उनके लिए ये अवाम ही उनका परिवार है। वह इस बात को इतनी शिद्दत से मानती हैं कि अपने परिवार के किसी भी समारोह में शामिल नहीं होती हैं। (ममता के उत्तराधिकारी माने जा रहे उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की कुछ साल पहले दिल्ली में सगाई हुई थी। करीब तीन दिनों तक कार्यक्रम चलते रहे लेकिन ममता ने कोई खास व्यस्तता न होते हुए भी उन कार्यक्रमों से खुद को अलग ही रखा था।)
 
ममता अपनी मां के काफी करीब हुआ करती थीं। जब वह काम के सिलसिले में कालीघाट स्थित अपने घर से निकलती थीं तो उनकी मां उन्हें छोडऩे के लिए घर के दरवाजे तक आती थीं। कार में बैठी ममता अपनी गरदन घुमाकर अपनी मां को तब तक देखती रहती थीं, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो जाती थीं। आम धारणा के उलट ममता अपने भाइयों के उतने करीब नहीं हैं। वह तुनकमिजाज हैं, पसंद-नापसंद को लेकर सख्त राय रखती हैं और बहुत ही कम लोगों पर भरोसा करती हैं।
 
राजनीति में उनके मार्गदर्शक कलकत्ता के महापौर सुब्रत मुखर्जी रहे हैं। मुखर्जी के प्रयासों से ही ममता को 1984 में पहली बार लोकसभा चुनाव लडऩे का मौका मिला था। उस चुनाव में ममता के सामने माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी थे। जादवपुर सीट पर हुई उस चुनावी जंग में ममता ने सोमनाथ को इस कदर मात दी थी कि वह दोबारा उस सीट से चुनाव नहीं लड़े। मुखर्जी निजी बातचीत में उस दिन को कोसते हैं जब उन्होंने ममता को पूरे बंगाल में प्रभाव जमाने की खुली छूट दी थी। सौरभ गांगुली को पद्म पुरस्कार दिए जाने की मांग का प्रस्ताव कलकत्ता निगम में पारित कराने वाले मुखर्जी कहते हैं कि वह तो भारत रत्न के हकदार हैं। उन्होंने एक टीवी साक्षात्कार में कहा था, 'मेरे सिर पर ममता नाच रही हैं, मेरे नियंत्रण में निगम के सफाईकर्मियों की फौज है। मैं अब भी निगम ही चला रहा हूं। क्या इस उपलब्धि के लिए मुझे पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए?'
 
सवाल है कि इस सबके बावजूद ममता ने बंगाल में भाजपा को अपना आधार मजबूत करने का मौका कैसे दे दिया? तृणमूल के समर्थक कहते हैं कि इसके लिए ममता केवल खुद को ही दोष दे सकती हैं। पूरे बंगाल में सरकारी जमीन पर नई मस्जिदें बन गई हैं। बाहरी पर्यटकों को उनके शुभचिंतक यह सलाह देते हैं कि कभी भी सड़क पर किसी मुस्लिम के साथ बहस न करें। अगर ऐसा किया तो पुलिस पहले आपको गिरफ्तार करेगी और फिर पूछताछ करेगी। ममता ने बेतुकेपन की हद तक सकारात्मक कार्यवाही का नियम लागू किया हुआ है। स्वाभाविक तौर पर लोगों के बीच इसका प्रतिवाद हुआ है और जिन हिंदुओं ने कभी खुद को हिंदू मतावलंबी के तौर पर नहीं देखा था, अब वे भी भाजपा के पीछे लामबंद हो रहे हैं। मां दुर्गा की धरती कहे जाने वाले बंगाल में अब भगवान राम ने भी दस्तक दे दी है। 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में एक रैली में कहा था कि तृणमूल कांग्रेस के कई विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। अगर लोकसभा चुनाव में तृणमूल का प्रदर्शन खराब रहता है तो उसके विधायकों के भाजपा के पाले में जाने की संभावना बनेगी। दो साल बाद बंगाल में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं। जाहिर है कि बंगाल अब भाजपा का नया मोर्चा बन चुका है। 
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