बिजनेस स्टैंडर्ड - आम चुनाव, गठबंधन और अर्थव्यवस्था
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आम चुनाव, गठबंधन और अर्थव्यवस्था

नितिन देसाई /  May 17, 2019

असहमति और विविधता को बचाए रखने और सहकारिता वाले संघवाद के संरक्षण के लिए एक व्यापक गठबंधन कहीं बेहतर होगा। यह ऐसी व्यवस्था हो जहां केंद्र और राज्य मिलकर निर्णय लें। बता रहे हैं नितिन देसाई 

 
आम चुनाव अंतिम चरण में पहुंच रहा है। इस दौरान हम देश के इतिहास के सबसे कटु प्रचार अभियानों के साक्षी बने। नीतियों को लेकर न के बराबर बहस देखने को मिली जबकि सरकार के प्रदर्शन का भी कोई बचाव नदारद ही रहा। इसके बजाय परस्पर आरोप-प्रत्यारोप, अतीत की घटनाओं का उल्लेख और यहां तक कि प्रतिपक्ष की देशभक्ति पर सवाल उठाने, उसकी चारित्रिक हत्या करने तक की घटनाएं देखने को मिलीं। अक्सर इसका आधार सोशल मीडिया पर फैली फेक न्यूज बनी।  हममें से जो लोग आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में पैदा हुए वे अक्सर राजनीतिक बहस से नदारद हो रही सभ्यता के लिए अफसोस करते हैं। परंतु इस चुनाव प्रचार अभियान में तो राजनीतिक बहस नए स्तर तक गिर गई। यहां तक कि इसका स्तर हमारे लोकतंत्र के भविष्य के प्रति भी आशंका उत्पन्न कर रहा है। वरिष्ठ नेताओं ने मतदाताओं को वर्गीकृत करते हुए जो वक्तव्य दिए हैं वे अनुचित हैं क्योंकि उनमें प्राय: अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया है जो संविधान का तिरस्कार है। ऐसे तमाम वक्तव्य देश के नागरिकों की समता को चुनौती देते हैं जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है। 
 
इस विभाजनकारी सोच को वैधता मिलना देश की एकता को सबसे बड़ा खतरा है। आज की राजनीतिक बहस में संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए धर्म के आधार पर भेद को बढ़ाया जा रहा है। इसे सत्ताधारी दल के घोषणापत्र में भी महसूस किया जा सकता है जो सांस्कृतिक विरासत के खंड में केवल एक धर्म का जिक्र करता है। भविष्य में यह विभाजन बढ़कर जाति, भाषा या क्षेत्र के स्तर पर हो सकता है।  एक खतरनाक दलील यह भी है कि देश को एक मजबूत केंद्र सरकार की आवश्यकता है जिसका नेता करिश्माई हो और लगभग तानाशाही शैली में शासन कर सकता हो। एक स्वस्थ लोकतंत्र की राजनीतिक प्रक्रिया में संतुलन और एक दूसरे पर नियंत्रण आवश्यक है। 
 
हमारे राजनीतिक ढांचे का सबसे संतुलनकारी आयाम है हमारी संघीय व्यवस्था जहां कई राजनीतिक दल अलग-अलग राज्यों में शासन कर रहे हैं। राज्य सरकारें तमाम धर्म, जाति और सांस्कृतिक समूहों के लोगों को राजनैतिक प्रतिनिधित्व का अवसर देती हैं। ऐसी कोई भी बात जो इस समृद्घ संघवाद को क्षति पहुंचाए, हमारे लोकतंत्र के लिए खतरा है। राज्य सरकारों का नेतृत्व देश की विविधता का परिचायक और केंद्र की तानाशाही प्रवृत्ति को रोकने वाला है।  आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में एकदलीय शासन के अधीन भी सी राजगोपालाचारी, गोविंद वल्लभ पंत, बीसी रॉय, रविशंकर शुक्ला, बीजी खेर और गोपीनाथ बारदोलोई जैसे मुख्यमंत्री पंडित नेहरू के राजनीतिक समकक्ष थे। हमें विविधतापूर्ण नेतृत्व और सहशासन की इस भावना को बचाना होगा। 
 
तानाशाही भरा और विभाजनकारी राजनीतिक एजेंडा न केवल लोकतंत्र और सामाजिक समरसता के लिए बल्कि हमारी आर्थिक संभावनाओं के लिए भी खतरा है। सीमित रोक वाला शक्तिशाली नेता नोटबंदी जैसे मूर्खतापूर्ण कदम उठा सकता है। सत्ताधारी दल के भीतर प्रभावी आंतरिक जांच परख वाली व्यवस्था में ऐसा होना असंभव था।  केंद्र सरकार को यह भी याद रहना चाहिए कि तमाम विकास क्षेत्रों के लिए प्रभावी कार्यकारी दायित्व का निर्वहन राज्यों पर बहुत हद तक निर्भर है और वित्त आयोगों द्वारा सशर्त अनुदान में कमी के साथ वे लगातार आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं। 
 
भारतीय अर्थव्यवस्था को सहकारी संघवाद की आवश्यकता है जो केंद्र और राज्यों के साथ मिलकर निर्णय ले। ठीक जीएसटी परिषद के तर्ज पर। केंद्र में क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन सरकार का बनना सहकारी संघवाद का बेहतर उदाहरण है। यह मान्यता सही नहीं है कि गठबंधन सरकारें अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं हैं क्योंकि तीन कमजोर गठबंधन सरकारों के दौरान हमें इसका उलट देखने को मिला है।  अधिनायकवादी वृत्ति वाला केंद्र स्थानीयता को बढ़ावा देगा। इससे आंतरिक प्रवासन कठिन होगा और वृद्घि प्रभावित होगी। दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर की महत्त्वाकांक्षी परियोजना के कारण पश्चिमी राज्यों में बड़े पैमाने पर प्रवासन होने की संभावना है। दक्षिण के राज्य तेजी से ऐसे जनांकीय चरण में पहुंच रहे हैं जहां कामगार आबादी की वृद्घि दर धीमी है। उन्हें अस्थायी और स्थायी दोनों प्रवासन की आवश्यकता पड़ेगी। परंतु इससे भी अधिक यह अलगाववादी भावनाओं की खुराक बनेगा और केंद्र के सत्ताधारी दल के नियंत्रण के बाहर के राज्यों के साथ राजनीतिक बहस की स्थिति और खराब होगी। 
 
आगामी 23 मई को क्या नतीजे आएंगे यह कहा नहीं जा सकता है। हम सभी उन लोगों से बात करते और उन्हें सुनते हैं जिनसे हम सहमत होते हैं। ऐसे में परस्पर विरोधी बातें सुनने को मिलती हैं। इस शोर का बहुत बड़ा हिस्सा शहरी क्षेत्र से उभरता है। परंतु नतीजे छोटे कस्बों और गांवों से तय होंगे। क्या ये खामोश मतदाता कृषि संकट, छोटे कारोबारियों की कठिनाइयों आदि से प्रभावित होंगे या फिर वे जाति या राष्ट्रवाद के नाम पर अपना निर्णय देंगे।  नतीजे चाहे जो भी हों। अगले महीने सत्ता में आने वाली सरकार को कठिन आर्थिक परिस्थितियों का सामना करना होगा। केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। 2018-19 के संशोधित अनुमान से 1.6 लाख करोड़ रुपये कम राजस्व, राजस्व घाटे का 3.4 फीसदी से बढ़कर 3.9 फीसदी हो जाना और कर-जीडीपी अनुपात में गिरावट इसकी बानगी हैं। 
 
बढ़ती तेल कीमतें चालू खाते के घाटे, राजस्व घाटे और मुद्रास्फीति पर दबाव डालेंगी। अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी जंग विश्व अर्थव्यवस्था में धीमापन लाएगी। इस कठिन वृहद आर्थिक हालात में नई सरकार पर चुनावी वादे पूरे करने, सब्सिडी और बुनियादी व्यय बढ़ाने आदि का दबाव होगा। इससे वृहद आर्थिक हालात और बुरे हो सकते हैं।  चुनाव परिणाम में वास्तविक अंतर राजनीतिक क्षेत्र में महसूस होगा। अनुमान तो यही है कि आने वाले दिनों में हमें मौजूदा की तुलना में कहीं अधिक बड़ा गठबंधन देखने को मिलेगा। इसका नेतृत्व मौजूदा सत्ताधारी दल के हाथ में रह सकता है। अगर उसका प्रदर्शन बहुत ही कमजोर रहा हो तो हालात बदल भी सकते हैं। चाहे जो भी हो, विविधता को लेकर उत्पन्न हुआ जोखिम कम होगा। कहीं अधिक लचीले राजनेता विभाजनकारी नारेबाजी और व्यक्तिगत स्तर पर तैयार चुनावी नीतियों से दूरी बनाएंगे। यह स्वागतयोग्य होगा। परंतु एक गठबंधन सरकार का यह भी अर्थ होगा कि किसी भी वक्त चुनाव होने का खतरा भी मंडराता रहेगा। लोकतंत्र और असहमति को बचाए रखने की यह कीमत हमें चुकानी पड़ सकती है। हमें इस सवाल के जवाब के लिए प्रतीक्षा करनी होगी कि देश के मतदाता अगले कुछ वर्ष तक कैसा हिंदुस्तान चाहते हैं। 
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