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लोकलुभावनवाद

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  May 17, 2019

चुनाव से उपजी आपाधापी के समाप्त होने के बाद देश की नई सरकार को आर्थिक मंदी का सामना करना होगा। उसके सामने वृद्घि दर को दोबारा 6.5 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी पहुंचाने जैसे स्वाभाविक मुद्दे भर नहीं होंगे।  पहली बात तो यह कि हम स्वत: पुरानी वृद्घि दर तक नहीं पहुंच सकते और दूसरा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों की विश्वसनीयता संकट में है। इसके बजाय उन वास्तविक आंकड़ों पर ध्यान देना होगा जिनके साथ छेड़छाड़ करना संभव नहीं है। ये आंकड़े परेशान करने वाली कहानी बयान करते हैं। बीते पांच वर्ष के दौरान अधिकांश वक्त वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्यात स्थिर रहा। यह घरेलू विनिर्माण की नाकामी को दर्शाता है। 

 
इसके कारण अर्थव्यवस्था में आंतरिक बातों पर ध्यान देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कर राजस्व की स्थिति अच्छी थी लेकिन अब उसमें गिरावट देखने को मिली है। वस्तु एवं सेवा कर का संग्रह खासतौर पर यह बताता है कि कारोबार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कई क्षेत्रों के खपत के आंकड़ों में भी गिरावट आई है। इसका असर कारोबारी बिक्री और मुनाफे पर भी पड़ा है। बैलेंस शीट पर तनाव बरकरार है क्योंकि कर्ज का स्तर काफी ज्यादा है। तमाम उद्यमी अभी भी कर्ज का स्तर कम करने के प्रयास में लगे हैं। कुछ हार मानकर विदेशी निवेशकों के हाथ बिकवाली करने में लगे हैं। प्रमुख क्षेत्रों मसलन स्टील, सीमेंट और बिजली आदि के उत्पादन के आंकड़े भी कोई सकारात्मक संकेत नहीं देते। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी द्वारा प्रस्तुत कॉर्पोरेट परियोजनाएं अभी भी काफी निचले स्तर पर हैं और परियोजनाओं को किया जाने वाला सरकारी वित्त पोषण थम गया है। राजस्व में कमी के चलते अतीत में हुए काम का भुगतान भी नहीं हुआ है। बाह्य खाता सहज स्तर पर है क्योंकि पूंजी की आवक बनी हुई है, परंतु चालू खाते का घाटा बहुत अधिक है। 
 
वित्तीय क्षेत्र की दिक्कतें बरकरार हैं। ऋण की स्थिति में सुधार हुआ है लेकिन बैंक अभी भी संकट में हैं। सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज के लिए बीती तिमाही में 52,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया जो इससे पहले के आंकड़े से दोगुना है। ऋणदाताओं की अगली कड़ी यानी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के सामने नकदी का संकट है क्योंकि उनकी बैलेंस शीट में क्या कुछ छिपा है इसे लेकर भरोसा कम हो चुका है। ऐसी बहुपक्षीय मंदी से जूझ रही कोई भी सरकार क्या करती है? वह मौद्रिक और राजकोषीय उपायों के जरिये आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देती है। परंतु भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती अब तक बाजार की वास्तविक दरों में नजर नहीं आ रहा। जहां तक राजकोषीय नीति की बात है घाटा इतना अधिक है कि किसी तरह की कर रियायत की पेशकश नहीं की जा सकती है, बशर्ते कि सरकार राजकोषीय अनुशासन को पूरी तरह न त्याग दे। अगर वह ऐसा करती है तो उच्च सरकारी उधारी से मौद्रिक नीति के लिए अलग समस्या खड़ी हो जाएगी। एक तीसरा उपाय भी है, और वह यह कि रुपये का अवमूल्यन करके विदेशों में भारतीय उत्पाद को सस्ता और प्रतिस्पर्धी बना दिया जाए। ऐसे में भारत वैश्विक कारोबारियों के लिए एक आकर्षक स्रोत बन जाएगा। परंतु कोई भी सरकार इस राह पर चलना नहीं चाहती। असली खतरा यह है कि अतीत के सुधारों ने जो गति प्रदान की है वह कहीं गायब न हो जाए। यही कारण है कि हमें ऐसे ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है जो व्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएं। 
 
बीते 15 वर्ष में ऐसे बहुत कम सुधार देखने को मिले हैं। यही कारण है कि श्रम, भूमि और पूंजी बाजार जैसे कारक बाजारों में सुधार नहीं हुआ। इसका तात्पर्य यह हुआ कि प्रमुख कानूनों में बदलाव किया गया और सरकारी कंपनियों को बजट अवरोधों का सामना करना पड़ा। मिसाल के तौर पर एयर इंडिया को कोई बेल आउट नहीं देना। यह राजनीतिक तौर पर लगभग असंभव है क्योंकि इसका नुकसान कामगारों और किसानों को होगा जो पहले ही परेशान हैं। तथ्य हमें एक और निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं: देश को धीमी वृद्घि के लिए तैयार रहना चाहिए। यह बात पहले ही स्पष्ट हो चुकी है लेकिन जीडीपी और रोजगार के आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ करके इसे लगातार दबाया जाता रहा। अर्थव्यवस्था मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के आखिरी दौर में ही 7 फीसदी के स्तर से नीचे आ गई थी और आज तो सरकारी आंकड़े भी इसे 7 फीसदी से कम बता रहे हैं। चूंकि यह गति युवाओं को रोजगार दिलाने के लिहाज से पर्याप्त नहीं है इसलिए इसका राजनीतिक और सामाजिक असर होना लाजिमी है। एक कमजोर अर्थव्यवस्था में यह लोकलुभावनवाद के उभार के रूप में नजर आता है। 
Keyword: india, economy, GDP, election,,
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